एक्साइज में कटौती के बाद भी तेल कंपनियों की मुश्किलें कम नहीं, 1 लीटर पेट्रोल-डीजल पर पड़ रहा इतना बोझ

एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर कटौती के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल पर अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से दबाव बना हुआ है.

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अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाया दबाव
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  • सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी में दस रुपये की कटौती का निर्णय लिया है
  • एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद भी तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है
  • अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण तेल कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है.
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सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाने का फैसला किया है. लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक एक्साइज ड्यूटी में बड़ी कटौती के बाद भी सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 14 रुपये और डीजल पर करीब 20 रुपये प्रति लीटर का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है.

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अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाया दबाव

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी के मुताबिक, "सरकार ने इस आसमान छूती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के समय तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे (पेट्रोल के लिए लगभग 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल के लिए 30 रुपये प्रति लीटर) को कम करने के लिए टैक्सेशन रेवेन्यू छोड़ने का फैसला किया है." मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध और पिछले 28 दिनों में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण, 24 मार्च, 2026 तक कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत बढ़कर 123.15 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गई है.

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कच्चे तेल में रिकॉर्ड उछाल, खुदरा कीमतें बढ़ाने की मजबूरी

पेट्रोलियम मंत्रालय की Petroleum Planning & Analysis Cell (PPAC) द्वारा ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक फरवरी, 2026 में कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत 69.01 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी. यानी मार्च, 2026 में अब तक कच्चे तेल की औसत कीमत में 54.14 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी हो चुकी है, यानि 78.45% की वृद्धि. इसकी वजह से सरकारी टीम कंपनियों पर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें बढ़ाने का दबाव बढ़ता जा रहा था.

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