- केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क दस रुपए प्रति लीटर घटाने का फैसला लिया है
- पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी तीन रुपए प्रति लीटर कर दी गई है और डीजल को प्रभावी रूप से इस टैक्स से छूट दी गई है
- तेल कंपनियों को बढ़ी लागत से राहत मिलेगी और कीमतें स्थिर रहने की संभावना बनी रहेगी
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और तेल कंपनियों पर बढ़ते दबाव के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर 10 रुपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) घटाने का फैसला लिया है. इस कदम से जहां आम लोगों को थोड़ी राहत मिलेगी, वहीं सरकार के राजस्व पर भी असर पड़ सकता है. नई दरों के अनुसार पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर 3 रुपए प्रति लीटर कर दी गई है, जबकि डीजल को प्रभावी रूप से इस टैक्स से छूट दे दी गई है. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, जिससे तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की लागत बढ़ गई है.
टैक्स कट से तेल कंपनियों को राहत, कीमतें फिलहाल स्थिर
टैक्स में यह कटौती ओएमसी को बढ़ी हुई लागत से कुछ राहत देगी और उन्हें बिना तुरंत कीमत बढ़ाए संतुलन (ब्रेक-ईवन) के करीब काम करने में मदद करेगी. इससे आम उपभोक्ताओं को भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी से बचाव मिलेगा. हालांकि इस फैसले के साथ ही फ्यूल टैक्स पर एक बार फिर ध्यान गया है, जो सरकार की आय का बड़ा हिस्सा होता है. पेट्रोल और डीजल पर केंद्र का एक्साइज ड्यूटी और राज्यों का वैट (वीएटी), दोनों सरकारों के लिए बड़ी कमाई का स्रोत हैं.
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फ्यूल टैक्स से सरकारों की बड़ी कमाई
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में पेट्रोलियम सेक्टर से कुल 7.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा टैक्स रेवेन्यू मिला था. इसमें केंद्र को एक्साइज ड्यूटी से करीब 2.7 से 3 लाख करोड़ रुपए और राज्यों को वैट के जरिए 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की आय हुई. कोविड-19 महामारी के दौरान जब कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तब सरकारों ने टैक्स बढ़ाकर अपनी आय मजबूत की थी। बाद में महंगाई को नियंत्रित करने के लिए टैक्स में कटौती की गई, जिससे राजस्व में कमी आई.
एक्साइज और वैट: कीमतों में टैक्स का बड़ा योगदान
एक्साइज ड्यूटी केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल के प्रत्येक लीटर पर लगाया जाने वाला एक निश्चित टैक्स होता है. इसके अलावा सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस जैसे अन्य शुल्क भी लगाए जाते हैं, जिनकी पूरी राशि केंद्र के पास ही रहती है. वहीं राज्य अपने-अपने हिसाब से वैट या सेल्स टैक्स लगाते हैं. दिल्ली जैसे शहरों में पेट्रोल की कीमत में लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा केंद्रीय टैक्स का होता है, जबकि डीजल में यह करीब 37 प्रतिशत होता है। इसके अलावा राज्यों का टैक्स भी कीमत में अहम भूमिका निभाता है.
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सेस‑सरचार्ज पर राज्यों की चिंता
एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि केंद्र के एक्साइज ढांचे में सेस और सरचार्ज का हिस्सा बढ़ गया है, जो राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता. इस कारण टैक्स से मिलने वाली अतिरिक्त आय का बड़ा हिस्सा केंद्र के पास ही रहता है, जिसे लेकर राज्य अक्सर चिंता जताते हैं. फ्यूल टैक्स सरकार की आय का अहम हिस्सा है. केंद्र के कुल टैक्स राजस्व में इसकी हिस्सेदारी करीब 18-19 प्रतिशत है, जबकि राज्यों के अपने टैक्स कलेक्शन में यह 25-35 प्रतिशत तक योगदान देता है.
टैक्स कट का भारी वित्तीय असर
हालांकि टैक्स घटाने का वित्तीय असर भी बड़ा होता है. बाजार के अनुमानों के मुताबिक, एक्साइज ड्यूटी में प्रति लीटर 1 रुपए की कटौती से सरकार को सालाना 14,000 से 16,000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है. इस हिसाब से 10 रुपए की कटौती से करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान हो सकता है. फ्यूल टैक्स का सीधा असर आम लोगों के बजट पर भी पड़ता है. इससे ट्रांसपोर्ट लागत और रोजमर्रा की चीजों की कीमतें प्रभावित होती हैं. ज्यादा टैक्स से महंगाई बढ़ती है, जबकि टैक्स घटने से कुछ राहत मिलती है.
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनी चुनौती
सरकार के इस फैसले के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि इससे बढ़ती कीमतों के असर से उपभोक्ताओं को बचाने में मदद मिलेगी. इस बीच, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अब भी ऊंची बनी हुई हैं और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है, जो आगे भी बाजार पर असर डाल सकता है.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)













