100 साल पहले दिल्ली विधानसभा में क्या हुआ था ? जिसके लिए विधानसभा में रखा गया मौन

विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह ऐतिहासिक पुराना सचिवालय केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह भारत के संसदीय इतिहास का जन्मस्थल है. 27 जनवरी 1913 को इसी चैम्बर में पहली बार केंद्रीय विधायी परिषद की बैठक हुई थी.

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  • दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में स्पीकर ने 1918 के युद्ध सम्मेलन के ऐतिहासिक महत्व को याद किया.
  • उस युद्ध सम्मेलन में महात्मा गांधी समेत लगभग 120 प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध पर चर्चा की.
  • 13 लाख भारतीय सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया और 74 हजार से अधिक ने विदेशी धरती पर अपने प्राण न्यौछावर किए.
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नई दिल्ली:

दिल्ली विधानसभा ने मशहूर पार्श्व गायिका आशा भोसले और प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए 75,000 भारतीय सैनिकों को मंगलवार को श्रद्धांजलि अर्पित की. विधानसभा के विशेष सत्र में श्रद्धांजलि देते हुए अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि 108 साल पहले, 28 अप्रैल, 1918 को ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड द्वारा इसी विधानसभा हॉल में युद्ध सम्मेलन का आयोजन किया गया था.

स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि आज से ठीक 108 वर्ष पूर्व, 28 अप्रैल 1918 को इसी चैम्बर में- जहां आज हम सब दिल्ली की जनता के प्रतिनिधि के रूप में बैठे हैं- तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड द्वारा 27, 28 और 29 अप्रैल 1918 को एक ऐतिहासिक युद्ध सम्मेलन का आयोजन किया गया था. इस सम्मेलन में देशभर से लगभग 120 प्रतिनिधि शामिल हुए थे, जिनमें रियासतों के शासक, प्रांतों के प्रतिनिधि और राष्ट्रीय नेता मौजूद थे. इस दौरान प्रथम विश्वयुद्ध में भारत की भूमिका पर प्रतिनिधियों को जानकारी दी गई थी.

विजेंद्र गुप्ता ने बताया कि इस सम्मेलन का महत्व केवल भारतीय सैनिकों की भर्ती के आह्वान तक सीमित नहीं था, बल्कि इसलिए भी था क्योंकि महात्मा गांधी स्वयं इस सम्मेलन में उपस्थित थे. उन्होंने इस विश्वास के साथ साम्राज्य के प्रति भारत के पूर्ण सहयोग का समर्थन किया था कि युद्ध में भारत की निष्ठा का पुरस्कार आजादी के रूप में मिलेगा. इतिहास गवाह है कि यह विश्वास छला गया. लगभग 13 लाख भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से मोर्चा संभाला. फ्लैंडर्स के खूनी मैदानों से लेकर गैलीपोली और मेसोपोटामिया तक. इनमें से 74 हजार से अधिक भारतीय सैनिकों ने विदेशी धरती पर अपने प्राण न्यौछावर किए. लेकिन इस बलिदान के बदले भारत को इसी सदन से रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग नरसंहार जैसे दमनकारी निर्णय मिले.

'महान नेताओं ने इन्हीं दीवारों के बीच अपनी ओजस्वी वाणी से देश को दिशा दी'

विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह सदन वर्ष 1912 में निर्मित हुआ था. ई. मोंटेग्यू थॉमस द्वारा संरचित यह ऐतिहासिक पुराना सचिवालय केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह भारत के संसदीय इतिहास का जन्मस्थल है. 27 जनवरी 1913 को इसी चैम्बर में पहली बार केंद्रीय विधायी परिषद की बैठक हुई थी. गोपाल कृष्ण गोखले, विपिन चंद्र पाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और विट्ठलभाई पटेल जैसे महान नेताओं ने इन्हीं दीवारों के बीच अपनी ओजस्वी वाणी से देश को दिशा दी. अतः यह हमारा कर्तव्य है कि हम उन लगभग 75 हजार अनाम भारतीय सैनिकों को स्मरण करें, जिन्होंने दूसरों की लड़ाई में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और जिन्हें इतिहास ने लंबे समय तक भुलाए रखा. एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हम आज उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

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साथ ही, यह भी स्मरण करना आवश्यक है कि इस सदन की विरासत कितनी गहरी और गौरवशाली है. जिन दीवारों ने कभी साम्राज्यवादी वायसराय की वाणी सुनी थी, वही दीवारें आज स्वतंत्र भारत की जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की आवाज सुन रही हैं. यही परिवर्तन, यही यात्रा, हमारे स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धि है.

30 अप्रैल 2026, गुरुवार को अपराह्न 3:30 बजे दिल्ली विधानसभा परिसर में युद्ध सम्मेलन की 108वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा. इस कार्यक्रम में जनरल वी. के. सिंह, माननीय राज्यपाल मिजोरम, मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता होंगे.

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