देश में माता-पिता को बेसहारा छोड़कर विदेश में बसे भारतीयों का रद्द हो पासपोर्ट, BJP सांसद की मांग कितनी वाजिब?

बीजेपी सांसद राधा मोहन दास अग्रवाल ने मांग की है कि विदेश में रह रहे ऐसे भारतीयों के पासपोर्ट रद्द कर देने चाहिए, जो भारत में रह रहे अपने मां-बाप की देखभाल नहीं करते हैं.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • राज्यसभा सदस्य डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल ने विदेश में रह रहे भारतीयों के पासपोर्ट रद्द करने की मांग की है
  • पिछले साल भारत में अकेले रह रहे बुजुर्गों की देखभाल न करने के पांच सौ से अधिक दुखद मामले सामने आए थे
  • अग्रवाल ने विदेश में रहने वाले भारतीयों से मां-बाप की देखभाल के लिए आय का एक निश्चित हिस्सा देने की अपील की है
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।
नई दिल्ली:

बीजेपी के राज्य सभा सदस्य डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल ने मांग की है कि विदेश में रह रहे ऐसे भारतीयों के पासपोर्ट रद्द कर देने चाहिए, जो भारत में रह रहे अपने मां-बाप की देखभाल नहीं करते हैं. उन्होंने कहा कि इस तरह के पांच सौ से अधिक मामले पिछले साल सामने आए थे. इनमें भारत में रह-रहे उन माता-पिता का अंत बहुत दुखद हुआ था, जिनके बेटा-बेटी विदेश में रह रहे थे.राज्य सभा में बुधवार को डॉक्टर अग्रवाल ने कहा कि सरकार ऐसी व्यवस्था करे कि विदेश में रह रहे भारतीय अपने मां-बाप की देखभाल के लिए अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा दें और हफ्ते में कम से कम एक बार टेलीफोन पर उनका हालचाल लें.   

विदेश में रहते हैं कितने भारतीय

उन्होंने कहा है कि देश के करीब साढ़े तीन करोड़ लोग भारत से बाहर दूसरे देशों में रहते हैं. उनका कहना था कि ऐसे अधिकांश लोगों के मां-बाप या सास-ससुर  भारत में ही रहते हैं. उन्होंने कहा कि भारत से बाहर रह रहे लोग केवल अपनी योग्यता के आधार पर ही वहां नहीं पहुंचे हैं. उनका कहना था कि इसके पीछे उनके मां-बाप का त्याग और तपस्या भी है.उन्होंने कहा का इन लोगों के मां-बाप ने अपना पेट काटकर और अपना सुख त्याग कर उन्हें इस लायक बनाया है. उन्होंने कहा कि कभी-कभी तो मां-बाप अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए अपनी जमीन-जायजाद भी बेच देते हैं. उन्होंने कहा कि उनकी सफलता के पीछे सरकारों की सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य की योजनाओं का भी हाथ है. 

उन्होंने कहा कि ये लोग जब विदेश जाते हैं तो शुरू-शुरू में अपने मां-बाप की चिंता करते हैं. उनके वहां जब बच्चे होते हैं तो वे अपने मां-बाप या सास-ससुर को बच्चों की देखभाल के लिए अपने पास बुला लेते हैं. इसके पीछे की वजह यह होती है कि वहां बच्चों की देखभाल करने वाले लोगों की फीस काफी अधिक होती है. उन्होंने कहा कि समय बीतने के साथ-साथ इन लोगों को लगाव अपने मां-बाप या सास-ससुर के साथ घटता चला जाता है. 

मां-बाप और बुजुर्गों की देखभाल करने वाला कानून

डॉक्टर अग्रवाल ने अपनी बातों के समर्थन में दिल्ली और इंदौर में हाल में हुई घटनाओं की जिक्र किया. जिसमें अकले रह रहे मां-बाप की मौत हो गई. लेकिन उनकी संतान लौटकर नहीं आई. उन्होंने बताया कि देश में हर साल इस तरह की करीब पांच सौ मामले सामने आते हैं, जिसमें अकेले रह रहे मां-बाप की मौत बहुत पीड़ादायक होती है. उन्होंने कहा कि सरकार ने मेटेंनेंस एंड वेलफेयर ऑफ दी पैरेंट्स एंड सिनियर सिटीजन एक्ट 2007 बनाया था. उन्होंने कहा कि यह कानून एक तरह से दंतहीन था. उन्होंने कहा कि इसमें प्रावधान था कि अगर मां-बाप अदालत में जाकर अपील करेंगे तो उनको सुविधा मिलेगी.

उन्होंने विदेश मंत्री से अपील की कि विदेश जाने वाले लोगों से एक हलफनामा लिया जाए कि विदेश जाने के बाद वो अपनी आय का एक हिस्सा निश्चित तौर पर मां-बाप को देंगे. मां-बाप की देखरेख के लिए केयरटेकर की नियुक्ति करेंगे और उनके लिए जीवन बीमा की व्यवस्था करेंगे.इसके अलावा वो हफ्ते में एक बार अपने मां-बाप से टेलीफोन पर बात जरूर करेंगे. उन्होंने कहा कि इस बात के भी प्रावधान किए जाने चाहिए कि मां-बाप से एक प्रमाण पत्र लिया जाए कि उनकी संतान अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रमाण पत्र नहीं देने वाले बुजुर्गों की संतान का पासपोर्ट निरस्त कर उन्हें वापस भारत बुला लेना चाहिए.

ये भी पढ़ें: अजित पवार के जाने के बाद आज होने वाला NCP का विलय अटका, सुप्रिया सुले के बयान के मायने समझिए

Advertisement
Featured Video Of The Day
Sambhal Bulldozer Action: यूपी में सरकारी जमीन पर बने मदरसे पर बड़ा एक्शन | UP News | CM Yogi