- बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में लगभग 92 फीसदी मतदान हुआ, जो पिछले चुनाव की तुलना में करीब 9 फीसदी अधिक है
- SIR के तहत वोटर सूची में 12 फीसदी की कटौती हुई, जिससे मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी का प्रभाव माना जा रहा है
- वोट बढ़ोतरी सत्ता परिवर्तन का सीधा संकेत नहीं, क्योंकि इतिहास में अधिक मतदान के बावजूद सरकारें बनी और बदली हैं
पश्चिम बंगाल में छप्परफाड़ वोटिंग हुई है.पहली बार ऐसा मतदान हुआ कि इतिहास रच दिया गया है, लेकिन अब बंगाल में चर्चा जोरों से हो रही है कि बंपर वोटिंग के क्या मायने हैं. किसकी सरकार बनेगी, क्या ममता हार जाएगी या जीत जाएगी? क्या बीजेपी के लिए पहली बार पश्चिम बंगाल का दरवाजा खुलेगा? ये तमाम सवाल है जिसका जवाब देश जानना चाहता है. लेकिन क्या ये इतना आसान है? बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 का पहला चरण खत्म हो गया है. राज्य के 16 जिलों में 152 सीटों पर मतदान हुआ और इस मतदान से प्रदेश से लेकर देश में खलबली मच गई है. आखिरकार करीब 92 फीसदी वोटिंग कैसे हो गई, जबकि इन्हीं सीटों पर पिछली बार 82.64 फीसदी मतदान हुआ था.
2021 में 152 सीटों पर टीएमसी को 92 सीटें, बीजेपी को 59 सीटें और अन्य को 1 सीट मिली थी. अब प्रदेश में चुनाव एसआईआर में वोटरों के नामों की कटौती, रेवड़ी राजनीति, घुसपैठ, ममता सरकार के 15 साल के कामकाज, ममता के कामों का लेखा-जोखा, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के बुरे हाल जैसे मुद्दों पर हो रहे हैं. लेकिन प्रदेश में इतनी बंपर वोटिंग यानी 91.78 फीसदी हो गई है. यह उछाल बताता है कि मतदाता इस बार अधिक उत्साहित और सक्रिय हैं. चुनाव सिर्फ प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनभागीदारी का उत्सव बन गया है. वहीं टीएमसी और बीजेपी दावा कर रही हैं कि उनकी जीत पक्की है.
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एसआईआर की वजह से हुई बढ़ोतरी?
अमूमन यही माना जाता है कि ज्यादा मतदान अक्सर सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कम्बेंसी) का संकेत देता है. जब जनता मौजूदा सरकार से असंतुष्ट होती है, तो बदलाव के लिए बड़ी संख्या में मतदान करती है. करीब 9 फीसदी ज्यादा मतदान का मतलब सरकार की विदाई माना जा रहा है, लेकिन इसमें किंतु-परंतु भी जुड़े हुए हैं. कहा जा रहा है कि एसआईआर में नामों की कटौती की वजह से वोट प्रतिशत बढ़ गया. प्रदेश में वोटर लिस्ट से नाम कटने, पुनरीक्षण और नए पंजीकरण को लेकर बहस हुई.
राजनीतिक दलों ने दावा किया कि बड़ी संख्या में वोटर सूची में बदलाव हुए हैं. एसआईआर में करीब 91 लाख वोटरों के नाम कट गए, यानी वोटरों में लगभग 12 फीसदी की कटौती हो गई. ये ऐसे वोटर माने जाते थे जो मृतक थे, पलायन कर गए थे या दूसरी जगह शिफ्ट हो गए थे. हालांकि इन्हें मौका दिया गया था कि ट्रिब्यूनलों में अपने दावे पेश कर सकें, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बने ट्रिब्यूनलों ने पश्चिम बंगाल में सिर्फ 139 लोगों के वोट देने के अधिकार बहाल किए हैं. ये लोग उन 27 लाख से ज्यादा नामों में से मात्र 0.005% हैं, जिन्हें पहले चरण में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत न्यायिक जांच के दौरान वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था.
क्या रहा है ज्यादा मतदान का इतिहास?
क्या ज्यादा मतदान वर्तमान सरकार के लिए खतरे की घंटी है? 2011 में ममता बनर्जी लेफ्ट को हराकर सत्ता में आई थीं. उस समय सबसे ज्यादा 84.33 फीसदी मतदान हुआ था, लेकिन 2016 और 2021 में मतदान गिरकर क्रमशः 82.16 फीसदी और 81.56 फीसदी हो गया था. तब भी ममता बनर्जी ही सत्ता में आई थीं. 1977 से लेकर 2011 तक बंगाल में लेफ्ट का शासन रहा. 1977 में मतदान गिरकर करीब 56 फीसदी हो गया था, जबकि 1972 में कांग्रेस आई थी तो करीब 61 फीसदी मतदान हुआ था. इमरजेंसी और जेपी आंदोलन के बाद भी बंगाल में मतदान नहीं बढ़ा जबकि देश के अन्य हिस्सों में मतदान बढ़ गये थे , लेकिन कम मतदान पर ही पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार पहली बार आई थी. गौर करने की बात ये भी है कि 1977 से 1982 में करीब 20 फीसदी ज्यादा मतदान हुए लेकिन सरकार लेफ्ट रही है, इस बार तो ममता राज में सर्फ 9 फीसदी मतदान ज्यादा हुए. सिर्फ ज्यादा मतदान ही पैमाना नहीं होता है.
यह भी उल्लेखनीय है कि 1977 से 1982 के बीच मतदान करीब 20 फीसदी बढ़ा, लेकिन इसके बावजूद सरकार लेफ्ट की ही रही. इतना बड़ा उछाल कम ही देखा गया है. इससे स्पष्ट है कि मतदान और जीत-हार का कोई सीधा फॉर्मूला नहीं होता.
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मतदान और जीत का क्या है रिश्ता?
राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं है और जो होता है, वो दिखता नहीं है. इसी तरह चुनाव में ज्यादा या कम मतदान होना भी एक अनसुलझी पहेली है. 2014 के लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व मतदान हुआ था, ऐसा चुनावी इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. मतदान में 8 फीसदी प्वाइंट की बढ़ोतरी हुई और यह आंकड़ा 58 फीसदी से बढ़कर 66 फीसदी पहुंच गया था.2014 के चुनाव को देखें तो यह फॉर्मूला फिट बैठता है कि ज्यादा वोटिंग की वजह से मनमोहन सिंह की सरकार चली गई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा था. चुनाव सिर्फ अंकगणित ही नहीं, बल्कि केमिस्ट्री भी है. केमिस्ट्री समझे बिना नंबर के जंजाल में फंसने का खतरा रहता है.
यही फॉर्मूला मान लें, तो 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ज्यादा मतदान होने के बावजूद कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई और पहली बार पार्टी ने जीत के इतिहास में नया मुकाम हासिल किया. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए लोकसभा चुनाव में करीब 7 फीसदी ज्यादा मतदान हुआ. पहली बार कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 415 सीटें हासिल कीं. अब आंख मूंदकर अंकगणित की भाषा समझेंगे, तो केमिस्ट्री का स्वाद चखने से वंचित रह सकते हैं. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लोगों में कांग्रेस के प्रति जबर्दस्त सहानुभूति थी. कम मतदान होना यह नहीं दर्शाता कि सरकार के प्रति गुस्सा नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मतदान काफी गिर जाए और सरकार की चांदी हो जाए.
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1971 में कम मतदान के बाद भी बनी जनता पार्टी की सरकार
1971 के लोकसभा चुनाव में 1967 के मुकाबले 6 फीसदी कम मतदान हुआ था, लेकिन कांग्रेस की सीटें 283 से बढ़कर 352 हो गई थीं. एक तरफ कांग्रेस में खटपट चल रही थी, तो दूसरी तरफ भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, जिसमें पाकिस्तान से टूटकर बांग्लादेश बना. उस समय इंदिरा गांधी एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में उभरीं. लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में मतदान में 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और 1977 में इंदिरा गांधी हार गईं और जनता पार्टी की शानदार जीत हुई. 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये और आपातकाल अहम मुद्दे थे.
जनता पार्टी में अंदरूनी विवाद और उठापटक की वजह से सरकार गिर गई. 1989 में बोफोर्स तोप घोटाला अहम मुद्दा था. इस पर कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी पार्टियों की लामबंदी थी. इसके बावजूद 1984 के मुकाबले 1989 में डेढ़ फीसदी वोटिंग कम हुई, लेकिन बोफोर्स के मुद्दे पर वी.पी. सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी. मतलब, कम वोटिंग होने पर भी सरकार के प्रति गुस्सा हो सकता है. 1989 से लेकर 2014 तक मतदान में मामूली उतार-चढ़ाव होते रहे, लेकिन किसी भी पार्टी को अपने बलबूते पर बहुमत नहीं मिला. इससे साफ है कि कम या ज्यादा मतदान सीधे तौर पर सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं देता.
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रेवड़ी राजनीति का प्रभाव
अब रेवड़ी राजनीति ने मतदाताओं को आकर्षित किया है, लेकिन अब वोटर केवल तात्कालिक लाभ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास और शासन की गुणवत्ता पर भी ध्यान दे रहा है. आधुनिक राजनीति में कई बार भारी वोटिंग का मतलब सरकार के प्रति अटूट भरोसा भी होता है. अगर जनता को लगता है कि सरकार की योजनाएं (जैसे लक्ष्मी भंडार या मुफ्त राशन) उनके जीवन को बदल रही हैं, तो वे उस सरकार को बचाने के लिए भी बड़ी संख्या में मतदान करते हैं. टीएमसी इसी उम्मीद में है कि उसकी कल्याणकारी योजनाओं ने महिलाओं और गरीबों को बूथ तक खींचा है.
वहीं महिलाओं के लिए बीजेपी ने 3000 रुपये देने की घोषणा की है, जबकि ममता सरकार लक्ष्मी भंडार योजना के तहत 1500 से 1700 रुपये दे रही है. ममता सरकार बेरोजगारी भत्ता 1500 रुपये प्रतिमाह दे रही है, जबकि बीजेपी ने 3000 रुपये देने का ऐलान किया है. बंगाल में 9 फीसदी ज्यादा वोटिंग ने यह जरूर दिखाया है कि जनता ने घर बैठने के बजाय लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेना बेहतर समझा. चुनाव आसान नहीं होगा. दोनों दल अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं. बंगाल में सिर्फ वोटिंग प्रतिशत ही नहीं, बल्कि बूथ मैनेजमेंट, स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण और ग्रामीण-शहरी वोटिंग पैटर्न भी अहम भूमिका निभाते हैं.
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बीजेपी क्या सेंध लगा पाएगी?
बीजेपी इस बार पूरा जोर लगा रही है और पहली बार बंगाल में सरकार बनाने की कोशिश कर रही है. वह एंटी-इन्कम्बेंसी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, घुसपैठ और एनआरसी जैसे मुद्दे उठा रही है. साथ ही केन्द्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की बात भी कर रही है. ममता के शासनकाल में कानून-व्यवस्था भी खराब हुई है, रोजगार बड़ी समस्या बना हुआ है और उद्योग-धंधे, यानी बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं. पार्टी हिंदू कार्ड भी खुल कर खेल रही है तो दूसरी तरफ निशाने पर मुस्लिम वोटर और घुसपैठिया भी है. बीजेपी को लगता है कि इस बार वह जीत सकती है, लेकिन बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो बीजेपी के लिए चुनौती बनी हुई है. बीजेपी को जीत के लिए 65-70 फीसदी हिंदू वोटों की जरूरत होगी. वहीं लेफ्ट और कांग्रेस कितनी सेंध लगाती हैं, यह भी देखने वाली बात होगी. इसके अलावा मुस्लिम वोटरों में हूमायूं कबीर और ओवैसी की पार्टी कितना असर डालती है, यह भी अहम रहेगा.
पीएम मोदी ने वादा किया है कि 4 मई को जीत के बाद बंगाल में ‘झालमुड़ी' और मिठाइयां बांटी जाएंगी, वहीं ममता बनर्जी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. लेकिन किसी भी पार्टी को ज्यादा मतदान से खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अभी पिक्चर बाकी है.
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