भारत सरकार ने हांगकांग में नीलाम होने जा रहे बुद्ध के अवशेषों की वापसी में बड़ी कामयाबी हासिल की है. सरकार ने बुद्ध के 830 करोड़ की नीलामी रुकवाई है. भारत ने भगवान बुद्ध के 2500 साल पुराने दुर्लभ आभूषणों और अवशेषों की नीलामी को रुकवाकर उन्हें वापस लाने में सफलता पाई है. ये अवशेष 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा कपिलवस्तु (गोरखपुर जिले के पास) के स्तूप से खोजे गए थे. पेप्पे के परपोते ने इन बेशकीमती अवशेषों को हांगकांग के सोथबी (Sotheby's) नीलामी घर में 10 लाख डॉलर (लगभग 830 करोड़ रुपये) के बेस प्राइस पर नीलामी के लिए रखा था. 127 सालों के बाद ये बौद्ध अवशेष वापस भारत आए हैं.
127 सालों के बाद अवशेष वापस आए
संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने बताया कि यह भारत का पहला 'पब्लिक-प्राइवेट रिपेट्रिएशन' (सार्वजनिक-निजी स्वदेश वापसी) मिशन है. इन अवशेषों को फिलहाल नई दिल्ली में चल रही प्रदर्शनी 'द लाइट एंड द लोटस, रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन' में जनता दर्शन के लिए रखा गया है.भारत ने असाधारण कदम उठाते हुए दुर्लभ गहनों की नीलामी को रोक दिया है. इसमें 2500 साल पुराने अवशेष भी हैं और भगवान बुद्ध की विरासत में गहराई से जुड़े हुए हैं.
पिपरहवा अवशेष
गौतम बुद्ध की इस विरासत को पिपरहवा अवशेष कहा जाता है, ये एक दुर्लभ संग्रह है. ये उनकी सांस्कृतिक धरोहरों को संजोने और सहेजने का बड़ा प्रयास है. 127 साल बाद पहली बार प्रदर्शनी में औपनिवेशिक काल के दौरान ब्रिटेन ले जाए गए बुद्ध के अवशेषों के एक हिस्से को भगवान बुद्ध के पिपरहवा अस्थि अवशेषों, नक्काशीदार पत्थरों, अवशेष रत्नों, अवशेष पात्रों के साथ फिर से मिलाया गया है. 127 साल बाद इन रत्नों की की वापसी न केवल देश के भीतर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासतों को मजबूत करती है. साथ ही दुनिया भर के लोगों को बुद्ध के अमर ज्ञान से भी जोड़ती है. पिपरहवा यूपी में सिद्धार्थनगर जिले में है.
Buddha Relics
इस मिशन ने भारत में पहली बार प्राचीन वस्तुओं की पब्लिक-प्राइवेट वापसी की पहचान की है. भारत सरकार नई दिल्ली के संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने पवित्र बुद्ध अवशेष 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा कपिलवस्तु के प्राचीन स्तूप में खोजे गए थे. उनके परपोते ने 2025 में उन्हें 10 मिलियन डॉलर की शुरुआती कीमत पर नीलामी के लिए रखा था.
इन्हें अंतरराष्ट्रीय नीलामी घर सोथबीज़ हांगकांग में नीलाम किया जाना था. अगर नीलामी हो जाती तो शुरुआती बौद्ध सभ्यता से भारत का ठोस जुड़ाव हमेशा के लिए बिखर जाता. सबसे बड़ा डर था कि चीन इन्हें खरीद लेगा.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज, नोएडा की एसोसिएट प्रोफेसर और नेशनल म्यूजियम की एक्सपर्ट डॉ. सविता कुमारी ने कहा, ये गहने 2500 साल पुराने हैं. सिर्फ उनकी उम्र ही उन्हें बौद्ध दुनिया से जुड़ी सबसे पुरानी जानी-मानी धार्मिक चीजों में शामिल करती है. शुरुआती एशियाई सभ्यता के विद्वानों के लिए, यह एक युग बदलने वाली खोज थी. नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली की डिप्टी क्यूरेटर डॉ. अबीरा भट्टाचार्य ने कहा, इन गहनों को भारत के लिए महत्वपूर्ण अवशेष, एक ऐसी सभ्यता की यादों के निशान बताया जो भूगोल और राजनीतिक सीमाओं से परे है. उनके आकलन से यह भावना झलकती है कि ये चीज़ें न सिर्फ़ पुरातात्विक सबूत के तौर पर काम करती हैं, बल्कि आध्यात्मिक और दार्शनिक कसौटी भी हैं.














