बिहार का चेहरा क्यों हैं नीतीश कुमार, जनता के मन में कितना समाए हैं

एग्जिट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि बिहार में एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व एनडीए की सरकार बनने जा रही है. रंजन ऋतुराज बता रहे हैं कि आखिर बिहार में हर हाल में नीतीश कुमार ही चेहरा क्यों हैं.

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पटना:

सिर्फ एग्जिट पोल के आंकड़े ही नहीं बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव पर नजर रखने वाले राजनीतिक पत्रकारों और विश्लेषकों का भी मानना है कि इस बार एक बार फिर नीतीश कुमार ही विजेता होने चाहिए. आखिर ऐसा क्यों है? उम्र के इस पड़ाव पर भी बिहार में नीतीश कुमार क्यों अहमियत रखते हैं? 20 सालों के लंबे शासन के बाद भी नीतीश कुमार सबसे मजबूत विकल्प क्यों हैं? तमाम आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद नीतीश कुमार ही चेहरा क्यों हैं? आखिरकार किस हद तक नीतीश कुमार बिहार की जनता के मन में समाए हुए हैं? 

नीतीश कुमार की राजनीति

नीतीश कुमार की व्यक्तिगत राजनीति को देखें तो उनपर हमलावर प्रशांत किशोर तक उन्हें एक व्यक्तिगत भ्रष्टाचार मुक्त नेता मानते हैं .दूसरी प्रमुख बात है उनकी सामान्य प्रशासन पर पकड़. तीसरी सबसे प्रमुख बात नीतीश पर महिला वोटरों का विश्वास.यह तीन ऐसे फैक्टर हैं, जिसका काट पक्ष और विपक्ष में अभी तक तैयार नहीं हुआ है. स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि बीजेपी को अपने कार्यालय में भी नीतीश कुमार के चेहरे वाले पोस्टर लगाने पड़े.

नीतीश कुमार के पास हर धर्म और जाति के वोट हैं. इस चुनाव में हर वर्ग में उनके लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर देखा गया. माना जाता है कि मुस्लिम समाज एनडीए को वोट नहीं देता है फिर भी कई जगहों पर मुस्लिम महिलाओं का वोट नीतीश को मिला है. यह प्रतिशत बहुत कम हो सकता है, लेकिन मिला है. नीतीश कुमार का असल जादू 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में देखा गया था, जब यादव समाज ने भी उन्हें वोट दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि लालू यादव की पार्टी महज 22 सीटों पर सिमट गई थी. यह उनका व्यक्तिगत करिश्मा ही था. यह नीतीश कुमार का विकास ही था. यह नीतीश कुमार का सफल प्रशासन और उनकी जबरदस्त स्वीकृति ही थी जिसपर सवार होकर भी बीजेपी राज्य में अपना कोई नेता नहीं बना सकी. 

नीतीश कुमार ने 2014 का लोकसभा चुनाव एनडीए से अलग होकर लड़ा था, लेकिन जेडीयू केवल दो सीटें ही जीत पाया था. इसके बाद नीतीश लालू के साथ चले गए थे.

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नीतीश बीजेपी के साथ जाते हैं तो सत्ता का सुख बीजेपी भोगती है.नीतीश तेजस्वी के साथ जाते हैं तो सत्ता का सुख तेजस्वी भोगते हैं. नीतीश रूठते हैं तो हस्तिनापुर में हड़कंप मच जाता है. नीतीश पैदल तेजस्वी के घर जाते हैं तो वहां दिवाली मनाई जाती है.

जब नीतीश कुमार अकेले गए थे चुनाव में

इसके साथ यह भी एक सच है कि जब 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार अकेले जाते हैं तो केवल दो सीटें जीत पाते हैं. लेकिन उस चुनाव में लोगों ने मोदी को चुना था. इस शर्त के साथ की 2015 में वो सभी वोटर वापस नीतीश के साथ फिर लौट आएंगे. लेकिन नीतीश कुमार धैर्य खो बैठे और भय में वापस लालू कैंप चले गए. नीतीश कुमार का वापस लालू कैम्प में जाना तेजस्वी के लिए वरदान साबित हुआ. यह एक ऐसा वरदान साबित हुआ कि आज तेजस्वी अकेले एक हेलीकॉप्टर में हैं, तो उनके पीछे एनडीए ने 30 हेलीकॉप्टर लगा रखे हैं. 

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खैर, अब 14 नवंबर को पता चलेगा कि मीडिया हाउस के एग्जिट और हम जैसों के आकलन सच में नीतीश को विजेता बनाते हैं या फिर तस्वीर कुछ अलग नजर आती है. लेकिन किसी भी सूरत में फिलहाल कागज पर नीतीश कुमार ही हैं. इसमें तो कोई दो राय नहीं होनी चाहिए. लेकिन लोकतंत्र में जनता ही भाग्य विधाता है. 

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