- भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय जनसंघ से की थी
- 1984 की हार के बाद बीजेपी ने गांधीवादी समाजवाद को छोड़कर प्रखर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को अपनाया
- 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने बीजेपी को एक कैडर आधारित से मास-बेस्ड पार्टी में बदल दिया
भारतीय जनता पार्टी आज अपनी स्थापना का 47वां साल मना रही है.आज ही के दिन 1980 में बीजेपी की स्थापना हुई थी. हालांकि इससे पहले वह भारतीय जनसंघ के नाम से राजनीति में अपनी पैठ बना चुकी थी. आज बीजेपी की पहचान विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर है.देश के अधिकांश भू-भाग पर उसका शासन है.केंद्र में लगातार तीसरी बार उसकी सरकार बनी है. कभी द्विध्रुवीय राजनीति का केंद्र बनी बीजेपी आज एकछत्र राज कर रही है. विपक्ष हाशिए पर है और बीजेपी का ऐसा दबदबा है जो उसके इतिहास में कभी नहीं रहा. हालांकि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए पार्टी ने कड़ा संघर्ष किया. एक समय अन्य राजनीतिक दल उसके पास आने से भी कतराते थे. आज हालात बदल चुके हैं.आइए नजर डालते हैं 46 वर्षों की इस यात्रा में उन महत्वपूर्ण दस घटनाओं पर जिन्होंने बीजेपी का कायाकल्प कर दिया-
1.1980: जनसंघ से बीजेपी तक
भारतीय जनता पार्टी, भारतीय जनसंघ का अवतार है जिसकी स्थापना 21 अक्तूबर 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वैचारिक रूप से प्रभावित इस राजनीतिक दल ने जल्दी ही स्वयं को एक प्रमुख राजनीतिक दल के रूप में स्थापित कर लिया था.पहले ही चुनाव 1952 में इसने तीन लोक सभा सीटें जीतीं.1967 में 35 सीटें जीतीं. कई राज्यों में अन्य विपक्षी दलों के साथ मिल कर संयुक्त विरोधी दल (संविद) सरकारें बनाई गईं. बाद में आपातकाल के दौरान 1975-76 में अन्य विपक्षी दलों की ही तरह भारतीय जनसंघ का विलय भी जनता पार्टी में कर दिया गया था, लेकिन दोहरी सदस्यता (आरएसएस और जनता पार्टी दोनों की सदस्यता) के मुद्दे पर जनता पार्टी से अलग होकर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने 6 अप्रैल 1980 को बीजेपी की नींव रखी. वाजपेयी जी का वह प्रसिद्ध वाक्य, "अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा," पार्टी के लिए बीज मंत्र बन गया.
2. 1984 की हार और 'गांधीवादी समाजवाद' का त्याग
1984 के चुनाव में बीजेपी को केवल 2 सीटें मिलीं. इस करारी हार ने पार्टी को अपनी विचारधारा पर पुनर्विचार करने को मजबूर किया यहां से पार्टी ने 'गांधीवादी समाजवाद' की नरम राह छोड़कर 'प्रखर हिंदुत्व' और 'राष्ट्रवाद' की ओर रुख किया. बीजेपी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवतावाद पर चलने का निर्णय किया. साथ ही पार्टी में अटल-आडवाणी युग की मजबूत शुरुआत हुई.लाल कृष्ण आडवाणी को पहली बार बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया.
3.1989: पालमपुर प्रस्ताव और राम मंदिर आंदोलन
हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में बीजेपी ने औपचारिक रूप से राम जन्मभूमि आंदोलन का समर्थन करने का प्रस्ताव पास किया. इसने बीजेपी को पहली बार एक स्पष्ट और आक्रामक पहचान दी. 1989 में वह 2 सीट से सीधे 86 सीटों पर पहुंच गई.
4. 1990: सोमनाथ से अयोध्या 'रथ यात्रा'
लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने भारतीय राजनीति की धुरी बदल दी. इस यात्रा ने बीजेपी को एक "कैडर-बेस्ड" पार्टी से "मास-बेस्ड" पार्टी में बदल दिया और हिंदुत्व को मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. बीजेपी के अपने बूते राज्यों में सरकारें बनीं. आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. यह उनके उदारवादी चेहरे के सहारे अधिक जनसमर्थन पाने की रणनीति थी. यह रणनीति कामयाब रही और बीजेपी ने सफलता की सीढ़ियां चढ़नी शुरू कर दीं.
5. 1996: पहली बार सत्ता का स्वाद (13 दिन की सरकार)
1996 में बीजेपी पहली बार लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी.हालांकि अटल जी की सरकार सिर्फ 13 दिन चली. बीजेपी नए सहयोगी दलों का विश्वास जीतने में नाकाम रही, लेकिन उसने देश को यह संदेश दे दिया कि कांग्रेस का विकल्प तैयार हो चुका है.
6. 1998-2004: सुशासन और गठबंधन (NDA का जन्म)
विपक्षी दलों की गठबंधन सरकारों की नाकामी के बाद देश की जनता ने एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी पर भरोसा जताया. बीजेपी ने 24 से भी अधिक सहयोगी दलों को साथ लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एनडीए बनाया. बीजेपी ने गठबंधन की राजनीति (NDA) को सफलतापूर्वक चलाया. पोखरण परमाणु परीक्षण और स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी योजनाओं ने पार्टी की छवि 'सिर्फ हिंदूवादी' से बदलकर 'विकासोन्मुख और मजबूत' पार्टी की बना दी. कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को शिकस्त देकर बीजेपी ने राष्ट्रवाद को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया.
7. 2005: वैचारिक नेतृत्व का परिवर्तन
हालांकि इंडिया शाइनिंग का नारा नहीं चला और 2004 की हार ने बीजेपी के भीतर भूचाल ला दिया. पार्टी अंदरूनी कलह से जूझने लगी. खराब सेहत के चलते वाजपेयी सक्रिय नहीं रहे. लालकृष्ण आडवाणी के 'जिन्ना पर बयान' के बाद पार्टी के भीतर बड़ा मंथन हुआ. धीरे-धीरे पार्टी का नियंत्रण पूरी तरह से आरएसएस (RSS) के साथ तालमेल बिठाने वाले नए नेतृत्व की ओर बढ़ने लगा, जिसने भविष्य के लिए जमीन तैयार की. 2009 में लगातार दूसरी हार ने नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया और नए नेतृत्व की मांग जोर पकड़ने लगी.
8. 2013: नरेंद्र मोदी का उदय (गोवा अधिवेशन)
जून 2013 के गोवा अधिवेशन में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया. यह बीजेपी के इतिहास का सबसे बड़ा यू-टर्न था.पार्टी ने 'सामूहिक नेतृत्व' से हटकर फिर एक 'मजबूत चेहरे' के इर्द-गिर्द चुनाव लड़ने का फैसला किया.
9. 2014: पूर्ण बहुमत और राष्ट्रीय विस्तार
30 साल बाद किसी पार्टी ने अकेले दम पर बहुमत हासिल किया. अमित शाह के संगठन कौशल और मोदी के करिश्मे ने बीजेपी को उत्तर भारत की पार्टी के टैग से मुक्त कर दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत तक पहुंचा दिया.
10. 2019: 'प्रो-इंकम्बेंसी' और वैचारिक जीत
2019 में दोबारा बड़ी जीत हासिल करना यह बताता था कि बीजेपी का आधार अब सिर्फ मंदिर या हिंदुत्व नहीं, बल्कि 'लाभार्थी वर्ग' और 'राष्ट्रवाद' का एक नया कॉकटेल है. इसके बाद धारा 370 हटाना, माओवाद का खात्मा और राम मंदिर निर्माण जैसे कोर एजेंडों का पूरा होना पार्टी के कायाकल्प की परिणति है. 2024 में बीजेपी की सीटें कम हुईं लेकिन लगातार तीसरी बार सत्ता में आना एक ऐतिहासिक उपलब्धि रही.इस जीत ने नरेंद्र मोदी का नाम देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं की सूची में शीर्ष पर स्थापित कर दिया.बीजेपी ने इन 46 सालों में 'विपक्ष की भूमिका' से 'सत्ता के केंद्र' तक का जो सफर तय किया है, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अभूतपूर्व सफलता मानी जाती है.
बीजेपी को 46 साल पूरे, 47वें स्थापना दिवस पर 10 अहम बिंदु
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