- नासा आर्टेमिस 2 मिशन के जरिए पांच दशक बाद इंसानों को फिर से चंद्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहा है
- ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला नासा के एक्सिओम-4 मिशन की ट्रेनिंग के दौरान आर्टेमिस 2 के क्रू मेंबर से मिले थे
- शुभांशु ने क्रिस्टीना कोच संग सेल्फी की कहानी बताई, जो चांद पर जाने वाली पहली महिला एस्ट्रॉनोट बनने जा रही हैं
नासा पांच दशक के अंतराल के बाद आर्टेमिस 2 मिशन के जरिए इंसानों को फिर से चंद्रमा की तरफ भेजने की तैयारी कर रहा है. एक भारतीय के रूप में ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला इस ऐतिहासिक पल को एक अनोखे नजरिए से देखते है. शुभांशु नासा के मिशन से जुड़े इकलौते भारतीय अंतरिक्ष यात्री हैं. उन्होंने एनडीटीवी से खास बातचीत में बताया कि किस तरह उन्हें अमेरिका में अंतरिक्ष यात्री के रूप में ट्रेनिंग के दौरान आर्टेमिस 2 के क्रू मेंबर्स को करीब से जानने का मौका मिला था. कैसे एक जिम के बाहर उनका सामना उस महिला से हुआ, जो अब इतिहास रचने जा रही हैं- क्रिस्टीना कोच. कैसे वो उनके फैन बन गए.
शुभांशु शुक्ला नासा के सहयोग से एक्सिओम-4 मिशन के दौरान पिछले साल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन गए थे. इस मिशन ने उन्हें निचली कक्षा में रहने और नासा के इकोसिस्टम का हिस्सा बनने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया था. आज एक गगनयात्री के रूप में और भारतीय वायुसेना के अधिकारी के तौर पर शुभांशु भारत के उभरते ह्यूमन स्पेस प्रोग्राम और अमेरिका की परिपक्व अंतरिक्ष संस्कृति के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं.
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने ह्यूस्टन में ट्रेनिंग के दौरान क्रिस्टीना कोच के साथ सेल्फी ली थी. Photo Credit: Photo Credit: Group Captain Shubhanshu Shukla
नासा की ट्रेनिंग में क्या होता है, बताया
शुभांशु ने बताया कि ह्यूस्टन में साल भर की ट्रेनिंग के दौरान उन्हें नासा के उन दिग्गजों अंतरिक्ष यात्रियों के साथ वक्त बिताने का मौका मिला था, जो आर्टेमिस जैसे फ्यूचर मिशन की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि वहां माहौल बहुत ही तकनीकी, गहन और डिमांडिंग होता है. उन्होंने बताया कि ट्रेनिंग में आप हर समय बिजी रहते हैं. आपको आराम से बैठकर यह सोचने का मौका नहीं मिलता कि आप कितना महान काम करने जा रहे हैं. आपका पूरा फोकस सिस्टम, प्रोसिजर और आगे क्या करना है, बस उसी पर होता है.
असाधारण क्षमता वाले साधारण इंसान
उन्होंने कहा कि कंधों पर बड़ी-बड़ी जिम्मेदारी उठाने वाले अंतरिक्ष यात्री भी बहुत सामान्य जैसे लगते हैं. आपको लगता ही नहीं कि आप ऐसे किसी इंसान से बात कर रहे हैं, जो अभूतपूर्व काम करने जा रहा है. वो आपके, हमारे जैसे ही इंसान हैं. हमारी तरह वो भी हंसते हैं, परेशान होते हैं. लेकिन इस सादगी भरे स्वभाव के पीछे एक गहन व्यक्तित्व छिपा होता है. एक मकसद, एक साहस, जिससे तुलना बहुत कठिन है. यही गुण उन्हें वो सब करने में सक्षम बनाता है, जो वे करते हैं.
जिम के बाहर क्रिस्टीना कोच से मुलाकात
शुभांशु ने उस पल को याद किया, जब उनकी मुलाकात क्रिस्टीना कोच से हुई, जो आर्टेमिस 2 मिशन के जरिए चंद्रमा की तरफ यात्रा करने वाली पहली महिला बनने वाली हैं. शुभांशु ने बताया कि उनकी मुलाकात किसी मंच या कार्यक्रम में नहीं हुई थी, बल्कि एस्ट्रॉनोट्स जिम में हुई थी. मैं जिम जा रहा था और वह भी अंदर जा रही थीं. एक प्रोफेशनल टेस्ट पायलट और अंतरिक्ष यात्री होने के बावजूद, शुभांशु को वह पल एक फैन बॉय मोमेंट की तरह महसूस हुआ. वह इतने प्रभावित हुए कि क्रिस्टीना से सेल्फी के लिए पूछ लिया. आमतौर पर वह ऐसा नहीं करते, लेकिन उस वक्त मैंने उनसे रिक्वेस्ट की और उन्होंने भी तुरंत हां कर दी.
शुभांशु ने बताया कि वह तस्वीर आज भी मैंने एक खुशनुमा यादगार की तरह संजोकर रखी है. शुभांशु क्रिस्टीना को एक जीता जागता लेजेंड मानते हैं. उनके लिए यह महज एक तस्वीर नहीं है, बल्कि एक ऐसी अनोखा पल है जिससे इतिहास रचने जा रही एक महिला से एक अंतरिक्ष यात्री की अनोखी यादें जुड़ी हैं. उन्हें एस्ट्रोनॉट विक्टर ग्लोवर से मिलने का भी मौका मिला था.
चांद की तरफ जा रहीं पहली महिला यात्री
शुभांशु शुक्ला क्रिस्टीना को लेजेंड क्यों मानते हैं? क्रिस्टीना चांद की तरफ जाने वाली पहली महिला अंतरिक्ष यात्री बनने जा रही हैं. यह सिर्फ रिकॉर्ड की बात नहीं है. उनका मिशन आर्टेमिस 2 इंसानों को पृथ्वी से लगभग 3,84,000 किलोमीटर दूर ले जाएगा, जो निचली कक्षा से बहुत ज्यादा दूर है. शुक्ला ने कहा कि लो अर्थ ऑर्बिट में जाना ही अपने आप में बहुत मुश्किल काम है. अब कल्पना कीजिए कि आप लगभग चार लाख किलोमीटर दूर जा रहे हैं, जहां वो पूरी तरह से खुद अपने भरोसे रहेंगे. आर्टेमिस 2 मिशन पूरी पृथ्वी की उम्मीदों का मिशन है. पूरी दुनिया इन 4 यात्रियों के लिए दुआ कर रही है.
एस्ट्रोनॉट किसी देश नहीं, धरती के प्रतिनिधि
शुभांशु ने कहा कि ये दूरी ही सबकुछ बदलकर रख देती है. कोई एस्ट्रॉनोट जब धरती से ऊपर जाता है, तब वह किसी खास देश नहीं बल्कि धरती का एंबेसडर बन जाता है. उस वक्त कोई सीमाएं नहीं होतीं. आप किसी देश के नहीं, मानवता के प्रतिनिधि होते हैं. अगर आप ये सोचना शुरू कर देंगे कि आप कितना बड़ा काम करने जा रहे हैं तो उम्मीदों का दबाव आपको तोड़ देगा. अगर कोई मुझसे ये पूछे कि इतने दशक के बाद किसी भारतीय का इस तरह अंतरिक्ष में जाने का क्या मतलब है, तो सच बताऊं मेरे पास इसका जबाव नहीं होगा, क्योंकि मैं उस तरह सोचता ही नहीं.
पूरी दुनिया की उम्मीदें आर्टेमिस 2 के साथ
शुभांशु शुक्ला ने कहा कि आर्टेमिस 2 से भले ही चार अंतरिक्ष यात्री चांद की तरफ यात्रा पर जा रहे हैं, लेकिन वो अपने साथ पूरी दुनिया की दुआएं और उम्मीदें लेकर जा रहे हैं. इस ग्रह का हर व्यक्ति उन पर गर्व करता है और जब वे कामयाबी हासिल करके लौटेंगे तो सीना गर्व से और चौड़ा हो जाएगा. भारत के गगनयान मिशन की बढ़ते कदमों के बीच शुभांशु शुक्ला के ये अनुभव बताते हैं कि अंतरिक्ष यात्री केवल सुपरहीरो नहीं बल्कि असाधारण इच्छाशक्ति वाले साधारण लोग होते हैं. और वो भी किसी के फैन हो सकते हैं.
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