- असम में मुस्लिम समुदाय की करीब 35 %आबादी है जिसमें असमिया और बांग्ला भाषी मुस्लिम शामिल हैं
- बांग्ला भाषी मुस्लिम मुख्यतः निचले असम और बराक घाटी में रहते हैं
- कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में चुनावी मुकाबला है
असम विधानसभा चुनाव में मुस्लिमों को लेकर सियासत गर्म है. “मियाँ मुस्लिम” के मुद्दे पर बीजेपी की सियासी बयानबाज़ी से मुस्लिम समुदाय असहज महसूस करता है. यही वजह है कि चुनावी मुद्दे को लेकर पूछने पर राज्य की करीब पैंतीस प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम समुदाय के लोग सुरक्षा और सद्भाव को ज़्यादा तरजीह देते हैं.असम में मुख्य रूप से दो तरह के मुस्लिम हैं. एक हैं, असमिया भाषी जिन्हें खिलौंजिया (मूल निवासी) मुस्लिम कहते हैं. ये मुख्य रूप से ऊपरी असम के इलाक़ों जैसे जोरहाट, शिवसागर, गोलाघाट, लखीमपुर जैसे ज़िलों में रहते हैं. इनकी आबादी क़रीब दस फ़ीसदी है. कुछ सीटों को छोड़कर जीत-हार में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं है.
असम के निचले, मध्य इलाक़ों जैसे नौगांव, धुबरी, बरपेटा और बराक घाटी में बांग्ला बोलने वाले मुस्लिम रहते हैं. आज़ादी के समय से ही इन इलाक़ों में मुस्लिमों की बड़ी आबादी रहती आई है. कुछ जिलों की सीमा बांग्लादेश से मिलती है. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के आसपास बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर इन इलाकों में आ कर बस गए. खिलौंजिया और बांग्ला बोलने वाले मुस्लिमों में भाषा के अलावा सांस्कृतिक भिन्नताएं भी हैं.असम विधानसभा की कुल 126 में से करीब 25 सीटें मुस्लिम बहुल हैं. ये सभी सीटें बांग्ला भाषी मुस्लिमों के इलाके में आती हैं. जाहिर है असमिया की तुलना में बांग्लाभाषी मुसलमान राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा ताक़तवर हैं.
लेकिन “मियाँ मुस्लिम” के नाम पर राज्य में सियासत बेरोकटोक जारी है. घुसपैठिए बाहर नहीं होते और कटघरे में पूरे समुदाय को खड़ा कर दिया जाता है. वोटों के ध्रुवीकरण के इस खेल में मुस्लिम समुदाय के पास फ़िलहाल सत्ता की नहीं केवल विपक्ष की चाभी बची है. देखना होगा कि असम विधानसभा में वो किसे मिलती है?
निचले असम और बराक घाटी में आने वाली इन सीटों पर कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के बीच सीधा मुकाबला है. बीते विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच गठबंधन था. लेकिन बाद में कांग्रेस ने अजमल से दूरी बना ली और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रकीबुल हुसैन ने धुबरी सीट पर अजमल को दस लाख के अंतर से हरा दिया.
वैसे, बताने की जरूरत नहीं है कि मुस्लिम वोटर सरकार बदलना चाहता है.कामरूप जिले की समरिया सीट के गोरोइमारी में स्थानीय निवासी हुमायूँ कबीर बताते हैं. हम इस चुनाव में किसी भी तरह की सांप्रदायिकता नहीं चाहते. हम सब भाई हैं और हम इसी तरह रहना चाहते हैं. हम 'मिया मुस्लिम' नहीं, भारतीय मुस्लिम हैं. उन्होंने ख़ास तौर पर उल्लेख किया कि पहले की तुलना में दंगे और अपराध कम हो गए हैं. सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिल रहा है. लेकिन यह शिकायत भी की, "बंगाली मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है, लोगों को बेदखल किया जा रहा है, घर हटाए जा रहे हैं.
ऊपरी असम के इलाक़ों में बसे असमिया मुस्लिम भी सांप्रदायिक माहौल को लेकर सवाल खड़े करते हैं. जोरहाट के टियोक में कमरखटोवाल गांव के इक़बाल हुसैन ने कहा कि हिंदू-मुस्लिम से पहले हम असमिया हैं. चुनाव में हिंदू-मुस्लिम की नहीं विकास की बात होनी चाहिए.वहीं, नजरुल जिलानी ने नाराज़गी जताते हुए सवाल उठाया कि बीजेपी ने एक भी खिलौंजिया मुस्लिम को टिकट क्यों नहीं दिया? उन्होंने कहा कि किसी की भी सरकार आए हमें विकास चाहिए, भेदभाव नहीं. सबसे ज़्यादा शांति जरूरी है. उन्होंने आईना दिखाने के अंदाज़ में कहा, “नौकरियां देने में हिंदू–मुस्लिम नहीं देखा तो अब चुनाव में हिंदू–मुस्लिम की बात क्यों की जा रही है?सियासी अहमियत में कमी इन्हें कचोटती है. इनके पास कांग्रेस गठबंधन के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
हालात के कारण बड़े पैमाने पर हुए पलायन या रणनीतिक घुसपैठ के ख़िलाफ़ असम में आंदोलन हुए. 1971 के बाद बसे मुस्लिमों को असम में “मियाँ मुस्लिम” कहा जाता है.इन पर आरोप लगता है कि ये बांग्लादेश से आए घुसपैठिए हैं. इनकी भाषा बांग्ला ही है लेकिन बोलने का तरीका पहले से रह रहे बांग्ला बोलने वाले मुस्लिमों से अलग है. ये आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन संख्या के हिसाब से प्रभावशाली हैं. बीते पाँच दशक से इन्हें हटाने और संरक्षित करने को लेकर असम में राजनीति होती रही है.चुनावी रैली में पीएम मोदी हों या सीएम सरमा, कांग्रेस पर घुसपैठियों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते हैं. जवाब में असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने एनडीटीवी से कहा कि कांग्रेस सरकार ने बीजेपी के मुक़ाबले ज़्यादा घुसपैठियों को बाहर निकाला.
घुसपैठियों की पहचान के लिए करीब ग्यारह साल पहले कांग्रेस की सरकार के दौरान असम में एनआरसी शुरू हुई जो बीजेपी सरकार के समय पूरी तो हो गई लेकिन विवाद के कारण उसका निष्कर्ष अभी भी लंबित है. लेकिन “मियाँ मुस्लिम” के नाम पर राज्य में सियासत बेरोकटोक जारी है. घुसपैठिए बाहर नहीं होते और कटघरे में पूरे समुदाय को खड़ा कर दिया जाता है. वोटों के ध्रुवीकरण के इस खेल में मुस्लिम समुदाय के पास फ़िलहाल सत्ता की नहीं केवल विपक्ष की चाभी बची है. देखना होगा कि असम विधानसभा में वो किसे मिलती है.
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