ग्राउंड रिपोर्ट: क्या एक बार फिर हिट होगी 'मियां मुसलमान' और बदरुद्दीन अजमल की जोड़ी

2024 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल एक बार फिर चुनाव मैदान में हैं. इस बार उन्हें AJP और AGP से कड़ी चुनौती मिली रही है.उनका वोट बैंक भी बिखरा हुआ है. बिन्नाकांडी की जमीनी हकीकत जानने के लिए पढ़िए यह ग्राउंड रिपोर्ट.

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होजोई/गुवाहाटी:

असम के बिन्नाकांडी के बीचों-बीच कई एकड़ में फैली एक भव्य हवेली है. इसके ऊंचे काले गेट की 24 घंटे सुरक्षा होती है. यह होजाई जिले के बिन्नाकांडी में अजमल परिवार का किला है. यह इत्र कारोबारी अजमल की विरासत का प्रतीक है, जो 2023 के परिसीमन के बाद राजनीतिक का एक नया केंद्र बना है. असम नौ अप्रैल को विधानसभा की 126 सीटों के लिए होने वाले चुनाव की ओर बढ़ रहा है. '

इस बार कैसा है बिन्नाकांडी का मुकाबला

बिन्नाकांडी पहले जमुनामुख विधानसभा क्षेत्र में आता था. बिन्नाकांडी में 2.6 लाख से अधिक मतदाता हैं. उनमें से अधिकांश अल्पसंख्यक हैं. इस सीट पर सोमवार को मुकाबला उस समय कांटे का हो गया, जब ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल, असम जातीय परिषद के रेजाउल करीम चौधरी (जमुनामुख के पूर्व विधायक के बेटे) और असम गण परिषद के साहाबुद्दीन मजूमदार ने नामांकन दाखिल किया. अल्पसंख्यक बहुल बिन्नाकांडी में यह एक वंशवादी टकराव है, अजमल बनाम उभरते प्रतिद्वंद्वी. 

74 साल के अजमल 2024 लोकसभा चुनाव में धुबरी में मिली करारी हार के बाद राज्य में वापसी की कोशिशें कर रहे हैं. धुबरी में उन्हें कांग्रेस के रकीबुल हुसैन ने 10 लाख से अधिक वोटों के विशाल अंतर से हराया था. वहां अजमल को 20 फीसदी वोट भी नहीं मिले थे. ठप पड़ा विकास और बदलाव की मांग जैसे मुद्दे हाबी रहे. साल 2009, 2014 और 2019 में धुबरी से लोकसभा चुनाव जीतने वाले अजमल ने 2006 में विधानसभा चुनाव में कदम रखा था. उन्होंने जमुनामुख और साउथ सलमारा सीट पर जीत दर्ज की थी. इस क्षेत्र में सत्ता उनके, उनके भाई सिराजुद्दीन अजमल (पूर्व विधायक) और बेटे अब्दुर रहीम अजमल (पूर्व विधायक) के बीच ही घूमती रही है.

कैसा है अजमल का करिश्मा

अजमल की नामांकन रैली में भारी भीड़ उमड़ी. लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी राजनीति और नेतृत्व को लेकर राय बंटी हुई है. समर्थक उन्हें मसीहाई परोपकार का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें पहचान की राजनीति करने वाला नेता बताते हैं. नामांकन से पहले उनके कार्यालय जाते समय समर्थकों की भीड़ उमड़ पड़ी. उनके समर्थकों में से कुछ उनके पैर छूने झुके, तो कुछ उनसे दुआ की गुजारिश करते दिखे. सड़कों पर गाड़ियों की लंबी लाइनें लगी थीं, जबकि बाइक सवार भीड़ में रास्ता बनाते हुए सिर्फ उनकी एक झलक पाने को की कोशिश करते दिखे.

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कभी असम की चुनावी गणित में निर्णायक मानी जाने वाली AIUDF अब अपनी प्रासंगिकता, बिखराव और अस्तित्व को लेकर सवालों का सामना कर रही है. इस पार्टी को लंबे समय से राज्य में 'मियां' के नाम से मशहूर बंगाली-भाषी मुसलमानों का राजनीतिक आधार माना जाता रहा है. इन मियां मुसलमानों की संख्या असम की आबादी का 30 फीसदी से अधिक है. 

करीब दो दशकों तक AIUDF ने निचले असम के धुबरी, बरपेटा, गोलपाड़ा, जमुनामुख, होजाई, नगांव और बराक घाटी के मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत वोट बैंक बनाकर अपनी ताकत कायम रखी.अब दो दशक बाद अजमल की विधानसभा राजनीति में वापसी काफी अहम मानी जा रही है. उनके समर्थकों के लिए वे आज भी एक मसीहा हैं- आस्था-चिकित्सक और समाजसेवी. वहीं उनके आलोचक उन्हें जमीनी हकीकत से दूर हो चुके और पहचान की राजनीति करने वाले नेता का प्रतीक बताते हैं.

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अजमल के विरोधियों का आत्मविश्वास

वहीं दूसरी ओर, रेजाउल चौधरी भी आत्मविश्वास से भरे हैं. वो मानते हैं कि AIUDF के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी उनके पक्ष में जाएगी. उनका आरोप है कि क्षेत्र में लंबे समय से विकास नहीं हुआ है. वो कहते हैं,''AIUDF 20 साल से यहां है. उसने  इस क्षेत्र को बर्बाद कर दिया है. वे दुबई में रहते हैं और यहां दूसरे लोगों से काम कराते हैं. सड़कें खराब हैं और उनकी राजनीति पूरी तरह सांप्रदायिक है. वे सिर्फ चुनाव के समय आते हैं और गरीबों में पैसा बांटते हैं. अगर मैं जीतता हूं, तो युवाओं के रोजगार और उनके भविष्य पर ध्यान दूंगा. यहां व्यापक भ्रष्टाचार है. अजमल शायद ही गांवों में आते हैं.'' 

वहीं अजमल आशावादी बने हुए हैं. उनका दावा है कि इस बार AIUDF 25 से अधिक सीटें जीतेगी.धुबरी में अपनी हार पर उनका कहना है कि वो मतदाताओं में जागरूकता की कमी के कारण हारे, जो महागठबंधन की चर्चाओं और कांग्रेस नेताओं के वादों से प्रभावित हो गए थे. 

कैसें हैं बिन्नाकांडी के जमीनी हालात

20 साल के मतदाता हाजी ज़मान कहते हैं, ''एक नए मतदाता के रूप में मेरा मानना है कि जो भी जीते, उसे विकास और शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए. पिछले नेताओं की गलतियां दोहराई नहीं जानी चाहिए. अजमल साहब को समाज के सुधार के लिए काम करना चाहिए. उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थान खोले हैं, लेकिन वे सबके लिए सुलभ नहीं हैं, यह ज्यादा व्यवसाय जैसा लगता है.'' इद्रीस अली नाम के एक दूसरे मतदाता का कहना था,''जो भी सरकार आए, उसे विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए. हमने अलग-अलग पार्टियों को वोट दिया, लेकिन वे वापस आकर हमारी समस्याएं नहीं देखते हैं, सड़क जैसी बुनियादी समस्याएं आज भी जस की तस हैं.'' इनके अलावा कई लोगों ने अजमल और उनके परिवार पर जमीन स्तर से कटे होने का आरोप लगाया.

बिन्नाकांडी के अधिकतर लोगों का कहना है कि बदरुद्दीन अजमल के तीन बार सांसद रहने के बाद भी इलाके का वैसा विकास नहीं हुआ, जैसा होना चाहिए था.

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मुरतासिम अली ने कहा,''हम नई सरकार चाहते हैं. यह सरकार हमें निराश कर चुकी है. वे लोगों से नहीं मिलते और अक्सर दुबई में रहते हैं.'' वहीं गौतम सिल का कहना था, ''हम चाहते हैं कि नेता सीधे हमसे जुड़ें, सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं के जरिए नहीं.'' हालांकि, अजमल के समर्थकों की भी कमी नहीं है. मोइनुद्दीन ने कहा,''अजमल एक अच्छे नेता हैं. धुबरी में उनकी हार दुर्भाग्यपूर्ण थी. बिन्नाकांडी में सभी उन्हें पसंद करते हैं. उनके भाई ने जमुनामुख में काफी काम किया है, हमें उम्मीद है कि वे यहां भी अच्छा काम करेंगे.'' वहीं हुसैन अहमद ने कहा,''वे हमारे नेता हैं और हमेशा रहेंगे.''

अजमल का बिखरता हुआ वोट बैंक 

असम की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 34 फीसदी है और निचले असम के कई क्षेत्रों में वे निर्णायक मतदाता हैं. अपने चरम पर AIUDF 126 सदस्यीय विधानसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. उसने 2011 में 18 सीटें, 2016 में 13 और 2021 में लगभग 16 सीटें जीती थीं. संसदीय राजनीति में भी अजमल ने 2009 से 2024 तक धुबरी सीट पर मजबूत पकड़ बनाए रखी. लेकिन 2024 का चुनाव एक बड़ा झटका साबित हुआ, जब कांग्रेस के रकीबुल हुसैन ने उन्हें 10 लाख से अधिक वोटों से हराया. कांग्रेस को करीब 60 प्रतिशत वोट मिले, जबकि अजमल का वोट शेयर 20 प्रतिशत से नीचे गिर गया. इस हार ने न सिर्फ उन्हें संसद से बाहर कर दिया, बल्कि AIUDF की चुनावी ताकत की धारणा को भी कमजोर कर दिया. पूरे असम में पार्टी का वोट शेयर घटकर करीब तीन फीसदी रह गया और वह एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी.

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यह बदलाव व्यापक राजनीतिक पुनर्बदलाव का हिस्सा है. साल 2021 में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाली AIUDF से अब कांग्रेस ने दूरी बना ली है. दोनों ने 2026 के लिए कोई गठबंधन नहीं किया है. इससे विपक्षी वोट बैंक बंट गया है. कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार हैं. AIUDF के भीतर संगठनात्मक चुनौतियां भी सामने आई हैं- आंतरिक मतभेद, विधायकों का निलंबन और नेताओं के अन्य पार्टियों (जैसे बीजेपी की सहयोगी एजीपी) की ओर जाने की अटकलें हैं. 

इस  विधानसभा चुनाव में AIUDF 27 सीटों पर चुनाव मैदान में है. इनमें से अधिकांश अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र हैं. पार्टी का दावा है कि उसका मजबूत समर्थन आधार अभी भी मौजूद है, लेकिन अब चुनावी गणित अधिक जटिल हो चुका है. कांग्रेस और AIUDF के बीच वोटों का बंटवारा बीजेपी के पक्ष में परिणाम बदल सकता है.

बिन्नाकांडी में बदरुद्दीन अजमल को चुनौती देने वालों में असम जातीय परिषद के रेजाउल करीम चौधरी भी शामिल हैं, जिनके पिता इस सीट से विधायक रह चुके हैं.

AIUDF की सबसे बड़ी चुनौती क्या है

AIUDF को पहले मिली सफलता वोटों के ध्रुवीकरण पर आधारित थी, जबकि अब चुनौती उनके बिखराव से निपटने की है. जहां पहले यह पार्टी अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का मुख्य मंच थी, अब उसे उसी वोट बैंक के लिए कांग्रेस से सीधी टक्कर मिल रही है, जबकि बीजेपी भी 2016 के बाद से मजबूत हुई है. इस बदलते परिदृश्य में 2026 का चुनाव AIUDF और अजमल के लिए निर्णायक है. अब सवाल यह नहीं है कि पार्टी अपना प्रभाव बढ़ा सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि वह जो बचा है, उसे बचा पाएगी भी या नहीं. यह चुनाव तय करेगा कि क्या अजमल का व्यक्तिगत प्रभाव उनकी पार्टी की गिरती स्थिति को संभाल सकता है, क्या बिखरे समर्थन को फिर से जोड़ा जा सकता है और क्या कभी असम की राजनीति को प्रभावित करने वाली यह ताकत बदलते राजनीतिक माहौल में अपनी जगह बना पाएगी.

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