मेडिकल साइंस का चमत्कार, AI की मदद से हुई घुटनों की सर्जरी, 4 घंटे में ही चलने लगे 74 साल के बुजुर्ग

दिल्ली के अस्पताल में 74 वर्षीय बुजुर्ग की एआई आधारित घुटनों की सर्जरी हुई. इस सर्जरी के चार घंटे बाद ही बुजुर्ग ने चलना शुरू कर दिया. यह सर्जरी नॉर्मल से काफी अलग और एडवांस थी.

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  • दिल्ली के एक अस्पताल में 74 वर्षीय बुजुर्ग की AI आधारित डबल नी-सर्जरी सफलता पूर्वक की गई है
  • मरीज पिछले तीन सालों से घुटनों के दर्द से पीड़ित था और एडवांस आर्थराइटिस की पुष्टि हुई थी
  • डॉक्टरों ने AI-असिस्टेड नेविगेशन तकनीक से घुटनों की सटीक अलाइनमेंट और इम्प्लांट की सही पोजिशनिंग सुनिश्चित की
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दिल्ली-एनसीआर के एक अस्पताल में मेडिकल साइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का गजब संगम देखने को मिला है. यहां 74 साल के एक बुजुर्ग की AI आधारित 'डबल नी-सर्जरी' की गई, जिसके महज 4 घंटे बाद ही मरीज ने वॉकर की मदद से चलना शुरू कर दिया.

3 साल का दर्द और खराब होते घुटने

यह मरीज पिछले तीन सालों से घुटनों के गंभीर दर्द से जूझ रहा था, जिसकी वजह से उनका चलना-फिरना और रोजमर्रा के काम करना लगभग बंद हो गया था. लंबे समय तक चले इलाज के बावजूद उनकी हालत बिगड़ती जा रही थी और रेडियोलॉजिकल जांच में एडवांस आर्थराइटिस की पुष्टि हुई थी. बुजुर्ग की एक्टिव लाइफस्टाइल को ध्यान में रखते हुए डॉक्टरों की टीम ने AI-असिस्टेड नेविगेशन के जरिए उनके दोनों घुटनों की सर्जरी करने का फैसला किया.

कैसे मुमकिन हुआ यह चमत्कार?

दिल्ली के सर्वोदय अस्पताल में इस जटिल सर्जरी को ऑर्थोपेडिक्स एंड जॉइंट रिप्लेसमेंट के हेड और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अंचित उप्पल की टीम ने अंजाम दिया. डॉक्टरों ने 'इंटेलीजॉइंट एआई-असिस्टेड नेविगेशन' तकनीक का इस्तेमाल किया. डॉ. उप्पल के मुताबिक, 'AI की मदद से घुटने के जॉइंट्स की सटीक अलाइनमेंट और इम्प्लांट की सही पोजिशनिंग संभव हो पाती है, जो पुरानी और पारंपरिक तकनीकों की कमियों को दूर करती है.'

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आम सर्जरी से कैसे अलग और है AI तकनीक?

अस्पताल के अनुसार, जॉइंट रिप्लेसमेंट में एडवांस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के कई बड़े फायदे सामने आए हैं. पारंपरिक नी-रिप्लेसमेंट सर्जरी के मुकाबले इस तकनीक से मरीज तेजी से रिकवर होता है. इस केस में मात्र 4 घंटे में मोबिलिटी आ गई. यह तकनीक स्वस्थ हड्डियों और मुलायम टिश्यू को नुकसान पहुंचने से बचाती है. सर्जरी के दौरान खून बहने का खतरा भी काफी कम हो जाता है.

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