राजस्थान के कोटा में बीते एक महीने में एक ही अस्पताल में 100 नवजात की मौत

राजस्थान के कोटा में बच्चों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है. जेके लोन अस्पताल में पिछले 48 घंटे में नौ और नवजात बच्चों की मौत हो गई है. इसके साथ ही एक महीने के अंदर अब तक कुल सौ बच्चे दम तोड़ चुके हैं.

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कोटा के अस्पताल में बीते एक महीने में 100 बच्चों की मौत.
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  • राजस्थान के कोटा में दम तोड़ते नवजात बच्चे
  • बीते 48 घंटों में 9 और बच्चों की मौत
  • एक महीने में 100 नवजात तोड़ चुके हैं दम
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जयपुर:

राजस्थान के कोटा में बच्चों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है. जेके लोन अस्पताल में पिछले 48 घंटे में नौ और नवजात बच्चों की मौत हो गई है. इसके साथ ही एक महीने के अंदर अब तक कुल सौ बच्चे दम तोड़ चुके हैं. उधर, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि 'कोटा के अस्पताल में शिशुओं की मृत्यु दर में सुधार हुआ है जो पिछली भाजपा सरकार ने उसी अस्पताल में दर्ज हुई थी. उन्होंने कहा कि बीते सालों के मुकाबले इस बार कम मौतें हुईं हैं. हम आगे भी इसे कम करने का प्रयास करेंगे.' उधर, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राज्य कांग्रेस प्रमुख अविनाश पांडे से इस घटना को लेकर चर्चा की. उन्होंने बताया कि सोनिया गांधी बच्चों की मौत से 'परेशान हैं और इसका कारण जानना चाहती हैं.' राज्य सरकार ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि अस्पताल में नवजात शिशुओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ इनक्यूबेटर ठीक से काम करने की स्थिति में नहीं थे.

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जान गंवाने वाले सभी बच्चों को गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में भर्ती कराया गया था. तीन सदस्यीय जांच टीम का नेतृत्व करने वाले चिकित्सा शिक्षा सचिव वैभव गालरिया ने कहा कि ज्यादातर बच्चों को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

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राजस्थान की राजधानी जयपुर से कोटा का अस्पताल लगभग 250 किलोमीटर दूर है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आज ट्वीट किया, 'कोटा के जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत के बारे में सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस साल 963 बच्चों की मौत हुई है, जबकि साल 2015 में 1260 बच्चों ने जान गंवाई थी. वहीं, 2016 में यह आंकड़ा 1193 था, जब राज्य में बीजेपी का शासन था. वहीं, 2018 में 1005 बच्चों की जान गई है.

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उधर, मामले में सोनिया गांधी ने भी राजस्थान सरकार से जानकारी मांगी है. दूसरी तरफ केंद्र सरकार की टीम ने भी पाया की कोटा के अस्पताल में उपकरणों की कमी और नर्सिंग स्टाफ की भी कमी थी. मामले को लेकर राजनीति गरमा रही है लेकिन सच तो यह है कि मातृ और शिशु मृत्यु दर को जब तक नहीं सुधारा जायेगा तब तक मामले का हल नहीं निकल सकता है.

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