Newborn Organ Donation: गुजरात के सूरत से एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जहां एक परिवार ने अपने जीवन के सबसे बड़े दुख को समाज के लिए उम्मीद और दूसरों के लिए एक प्रेरणा में बदलते हुए इतिहास रच दिया है. सूरत में रहने वाले राजस्थान मूल के एक परिवार ने जन्म के 144 घंटे बाद ब्रेन डेड घोषित किए गए अपने नवजात के अंगों को दान करने का फैसला कर दूसरों के जीवन में रोशनी भर दी है.
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नवजात के जन्म के 144 घंटे बाद सवर्णकार परिवार के घर पसरा मातम
रिपोर्ट के मुताबिक सूरत के कतारगाम इलाके में रहने वाले सवर्णकार परिवार के लिए 16 मार्च 2026 का दिन खुशियों के साथ शुरू हुआ था, लेकिन कुछ ही पलों में यह खुशी गहरे दुख में बदल गई. मूल रूप से राजस्थान के उदयपुर से जुड़े परिवार में जन्मा नवजात पार्थ जन्म के तुरंत बाद कोई प्रतिक्रिया नहीं कर रहा था. पूरा परिवार नवजात की जिंदगी बचाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उपचार के बाद भी बात नहीं बनी.
प्रेरणादायी मां
22 मार्च, 2026 को डाक्टरों ने नवजात को अंततः ब्रेन डेड घोषित किया
बताया जाता है कि डॉक्टरों की टीम ने कई दिनों तक लगातार प्रयास किए, लेकिन नवजात ने जब कोई प्रतिक्रिया नहीं की, तो हारकर आखिरकार 22 मार्च को डाक्टरों ने बच्चे को ब्रेन डेड घोषित कर दिया. यह खबर परिवार के लिए बेहद दर्दनाक थी, क्योंकि जिस बच्चे के आगमन से घर में खुशियां आई थीं, वही बच्चा उनसे दूर हो गया, लेकिन गहरे दुख के बीच परिवार ने जो फैसला लिया, वो अब मिसाल बन चुका है.
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नर्सिंग से जुड़ी मां ने नवजात के अंगों को दान करने का फैसला किया
नवजात बच्चे की मां, जो खुद नर्सिंग स्टाफ से जुड़ी हैं, उन्होंने अपने पति और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ विचार-विमर्श कर अपने नवजात के अंगदान का साहसिक फैसला लिया. ऑर्गन डोनेशन फाउंडेशन की टीम जीवनदीप को सूचना दी गई और पूरी प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया गया और डॉक्टरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संस्थाओं का अहम सहयोग रहा.
अंगदान के बाद नवजात के किडनी ले जाते हुए कर्मी
सवर्णकार परिवार के साहसिक फैसले ने जलाई चार जिंदगियों में उम्मीद
सवर्णकार परिवार ने चार दिनों तक चले उपचार के बाद जब नवजात को ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया तो अपने जिगर के टुकड़े को खोने का असहनीय दर्द सहते हुए एक साहिसक निर्णय लिया और नवजात के अंगदान करने का फैसला लिया. परिवार के इस फैसले ने चार जिंदगियों में उम्मीद की नई रोशनी जला दी. यह घटना समाज के लिए एक गहरी सीख है कि जीवन के बाद भी किसी का अस्तित्व दूसरों की सांसों में जिंदा रह सकता है.
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बच्चे के अंगों को समय पर पहुंचाने के लिए तैयार किया गया ग्रीन कॉरिडोर
गौरतलब है अंगों को समय पर पहुंचाने के लिए सूरत से अहमदाबाद तक ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया गया, जिसमें गुजरात पुलिस ने बेहद अहम भूमिका निभाई. पूरे रास्ते को खाली कर एम्बुलेंस को प्राथमिकता दी गई, जिससे अंगों को निर्धारित समय में सुरक्षित रूप से अस्पताल तक पहुंचाया जा सका. यह पूरी प्रक्रिया में सवर्णकार परिवार के साहसिक फैसले और मेडिकल सिस्टम की तत्परता महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई.














