गुजरात के निकाय चुनावों में बीजेपी ने बड़े स्तर पर जीत का दावा किया हो, लेकिन आदिवासी बहुल नर्मदा जिले में आम आदमी पार्टी ने जो प्रदर्शन किया है, उसने पूरी राजनीतिक तस्वीर को नया मोड़ दे दिया है. यह सिर्फ सीटों की जीत नहीं, बल्कि एक सोच की जीत है, वो सोच जो हाशिए पर खड़े लोगों को केंद्र में लाती है. जिला पंचायत की 22 में से 15 सीटों पर कब्जा और 6 में से 4 तालुका पंचायतों में जीत इस बात का संकेत है कि बदलाव की लहर अब गुजरात के अंदरूनी इलाकों तक पहुंच चुकी है.
“स्टेच्यू ऑफ यूनिटी” वाले इलाके की जनता ने स्थानीय स्तर पर अलग फैसला देकर यह दिखा दिया कि वो क्या चाहते हैं. इस पूरे बदलाव के केंद्र में आम आदमी पार्टी का मजबूत संगठन और जमीनी पकड़ दिखाई देती है. पार्टी ने कहा कि अरविंद केजरीवाल की राजनीति का मॉडल- ईमानदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसेवा अब दिल्ली और पंजाब से निकलकर गुजरात के गांवों तक अपनी पकड़ बना रहा है. सीमित संसाधनों के बावजूद पार्टी ने जिस तरह से अपने कैडर को खड़ा किया, वह पारंपरिक दलों के लिए एक बड़ा सबक है.
नर्मदा में इस सफलता के पीछे विधायक चैतर वसावा का जनसंपर्क और संघर्ष भी एक अहम वजह है. आदिवासी अधिकारों, जमीन और जंगल के मुद्दों पर लगातार आवाज उठाने वाले वसावा ने जनता के बीच भरोसा बनाया है. यह जीत ऐसे समय पर आई है जब आम आदमी पार्टी कई चुनौतियों का सामना कर रही है. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी लगातार विस्तार कर रही है और खासकर आदिवासी इलाकों में उसकी पैठ तेजी से बढ़ रही है.
बीजेपी और कांग्रेस के बीच आम आदमी पार्टी एक तीसरी, मजबूत और विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभर रही है, जो सिर्फ वादों की नहीं, बल्कि काम की राजनीति करती है. नर्मदा का संदेश साफ है अब गुजरात में मुकाबला बदल चुका है. आने वाले समय में गुजरात की राजनीति में आम आदमी पार्टी एक निर्णायक भूमिका निभाती नजर आएगी.














