Thaipusam kyu aur kahan manaya jata hai: थाईपुसम एक हिंदू पर्व है जो हर साल जनवरी और फरवरी के बीच तमिल महीने थाई के दौरान दक्षिण भारत में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है. यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय जिन्हें दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन के नाम से पूजा जाता है, उनकी पूजा के लिए समर्पित है. दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन को स्कंद, सुब्रह्मण्य, सन्मुख आदि नामों से भी उनके भक्त पूजते हैं. आइए इस पर्व को मनाए जाने के पीछे की कथा और इसका धार्मिक महत्व विस्तार से जानते हैं.
थाईपुसम क्यों मनाया जाता है?
थाईपुसम को बुराई पर अच्छाई के पर्व के रूप में जाना जाता है. हिंदू मान्यता के अनुसार पौराणिक काल में एक 'सूरपद्मन' नामक एक शक्तिशाली असुर था. जिसने अपने तप बल से तमाम तरह की शक्ति हासिल करके तीनों लोक में कोहराम मचा रखा था. सूरपद्मन से परेशान होकर देवी-देवताओं ने अपनी व्यथा भगवान शिव के सामने रखी. इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की संतान के रूप में भगवान मुरुगन का जन्म हुआ.
मान्यता है कि सूरपद्मन के आतंक को समाप्त करने के लिए माता पार्वती ने सूरपद्मन का वध करने के लिए अपने पुत्र मुरुगन को एक दिव्य अस्त्र प्रदान किया, जिसे 'वेल' या फिर कहें भाला कहते हैं. मान्यता है कि इसके बाद भगवान मुरुगन ने उसी वेल से सूरपद्मन का वध किया था. मान्यता है कि जिस दिन माता पार्वती ने अपने पुत्र मुरुगन को भाला भेंट किया और उन्होंने उससे राक्षस सूरपद्मन का वध किया था, उसे आज उनके भक्त थाईपुसम के रूप में मनाते हैं.
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कहां मनाया जाता है थाईपुसम का पर्व?
थाईपुसम का पर्व मुख्य रूप से दक्षिण भारत में तमिल समुदाय द्वारा मनाया जाता है. इसके अलावा जिन देशों में तमिल समुदाय रहते हैं, जैसे - मॉरीशस, सिंगापुर और मलेशिया आदि देशों में भी इसे मनाया जाता है. थाईपुसम को थाईपूसम, थापुसम, थाईपूयम तथा थाईप्पूयम आदि नामों से भी जाना जाता है. यह पर्व माघ मास की पूर्णिमा को प्रारंभ होकर दस दिनों तक चलता है.
कैसे मनाते थाईपुसम का पर्व?
थाईपुसम के पर्व पर भगवान मुरुगन के भक्त उन्हें विशेष रूप से पीले या नारंगी रंग के पुष्प चढ़ाते हैं और इसी पीले रंग के वस्त्र धारण करते हैं. इस दिन तमिल समुदाय से जुड़े लोग एक अर्ध-वृत्ताकार लकड़ी का कांवड़ बनाकर उसमें फल, फूल, दूध, जल आदि रखकर अपने कंधे पर लेकर मंदिर नंगे पांव जाते हैं. इस लकड़ी की कांवड को भगवान मुरुगन के मंदिर की ओर कंधे पर ले जाते समय श्रद्धालु जब नृत्य करते हैं तो वह रस्म कावड़ी अट्टम (Kavadi Attam) कहलाती है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)














