Putrada Ekadashi: पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण कितने बजे करें? जानिए पूजा विधि और सही समय

पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान सुख, संतान की खुशहाली और परिवार की समृद्धि की कामना से रखा जाता है. पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु 24 अगस्त यानी सोमवार को सुबह 05:58 बजे से सुबह 08:39 बजे के बीच या दोपहर 01:41 बजे से शाम 04:16 बजे के बीच पारण कर सकते हैं.

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पुत्रदा एकादशी व्रत पारण
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Putrada Ekadashi: सावन महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी मनाई जाती है. सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत 23 अगस्त को रखा गया था. अब व्रत रखने वाले श्रद्धालु व्रत का पारण 24 अगस्त को करेंगे. धार्मिक मान्यता के अनुसार, पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है. इस दिन भगवान विष्णु के साथ भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है. पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान सुख, संतान की खुशहाली और परिवार की समृद्धि की कामना से रखा जाता है. चलिए आपको बताते हैं पुत्रदा एकादशी पारण का समय और पूजा विधि.

पूजा विधि और पारण के नियम

स्नान और ध्यान- पारण के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें.

भगवान विष्णु की पूजा- घर के मंदिर में भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें, उन्हें धूप, दीप, फल और पुष्प अर्पित करें.

दान-पुण्य- पारण से पहले अपनी क्षमता के अनुसार अन्न या धन का दान अवश्य करें.

व्रत खोलना- भगवान को भोग लगाने के बाद सात्विक भोजन या फलाहार ग्रहण करके अपना व्रत खोलें.

सावन पुत्रदा एकादशी पारण का समय

पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु 24 अगस्त यानी सोमवार को सुबह 05:58 बजे से सुबह 08:39 बजे के बीच या दोपहर 01:41 बजे से शाम 04:16 बजे के बीच पारण कर सकते हैं.

पुत्रदा एकादशी का महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार, पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है. मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें भगवान नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है. संतान की कामना करने वाले दंपतियों के लिए भी यह एकादशी अत्यंत शुभ मानी जाती है.

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पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, महिष्मति पुरी के राजा महिजीत को कोई संतान नहीं थी, जिससे वे बहुत दुखी रहते थे. तब लोमहर्षक ऋषि ने उन्हें सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी. राजा ने विधि-विधान से यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से उन्हें प्रतापी पुत्र की प्राप्ति हुई. तभी से संतान प्राप्ति और उसकी उन्नति के लिए यह व्रत रखा जाता है.

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