Krishna Vamana Dwadashi 2026: कृष्ण वामन द्वादशी कब है? जानिए व्रत नियम, कथा और शुभ मुहूर्त

Krishna Vamana Dwadashi 2026: चैत्र शुक्ल पक्ष की वामन द्वादशी के लगभग पंद्रह दिन बाद जो द्वादशी तिथि आती है, उसे कृष्ण वामन द्वादशी कहा जाता है. इस दिन भक्त भगवान वामन की पूजा‑आराधना करते हैं.

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कृष्ण वामन द्वादशी 2026
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Krishna Vamana Dwadashi 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल पक्ष की वामन द्वादशी के लगभग पंद्रह दिन बाद जो द्वादशी तिथि आती है, उसे कृष्ण वामन द्वादशी कहा जाता है. इस दिन भक्त भगवान वामन की पूजा‑आराधना करते हैं. हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान वामन को भगवान विष्णु का एक अवतार माना गया है. कृष्ण वामन द्वादशी के दिन भगवान विष्णु के भक्त पूरा विश्वास और श्रद्धा से व्रत रखते हैं. द्वादशी तिथि भगवान विष्णु को बहुत प्रिय मानी जाती है. इसलिए इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को धन, सुख‑समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं. इस व्रत को करने की विधि वही होती है, जो चैत्र शुक्ल द्वादशी की वामन द्वादशी के व्रत में बताई गई है.

कब है कृष्ण वामन द्वादशी

  • कृष्ण वामन द्वादशी- 14 अप्रैल 2026, मंगलवार
  • द्वादशी तिथि प्रारम्भ - 13 अप्रैल 2026 को रात्रि 09:38 बजे से
  • द्वादशी तिथि समाप्त - 14 अप्रैल 2026 को रात्रि 08:42 बजे
कृष्ण वामन द्वादशी 2026 व्रत विधि

सुबह की पूजा- जल्दी उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें. घर के मंदिर में भगवान विष्णु (वामन रूप) की स्थापना करें.

पूजा सामग्री- दही, चावल, फल, फूल, तुलसी के पत्ते, धूप और दीपक अर्पित करें. विशेष रूप से वामन अवतार को दही-चावल का भोग लगाया जाता है.

मंत्र- 'ॐ वामनाय नमः' या 'ॐ वासुदेवाय नमः' का जाप करें.

व्रत पारण- अगर, पूरे दिन का व्रत रखा है, तो शाम को पूजा के बाद भोग में चढ़ाई गई वस्तुएं (दही-चावल) खाकर पारण करें.

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वामन द्वादशी की कथा महान और दानवीर राजा महाबली से जुड़ी हुई है. राजा बलि ने अपनी शक्ति और भक्ति से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था, लेकिन उनका बढ़ता हुआ अहंकार ब्रह्मांड के संतुलन को बिगाड़ रहा था. धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और एक साधारण ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे. वामन ने उनसे केवल तीन पग भूमि मांगी. पहले पग में उन्होंने पूरी पृथ्वी को नाप लिया. दूसरे पग में आकाश (स्वर्ग) को नाप लिया और तीसरे पग के लिए स्थान न बचने पर राजा बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया. उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और पाताल लोक में स्थान प्रदान किया.

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