Chaitra Navratri 2026: राजस्थान का चमत्कारी शीतला माता मंदिर, जहां राक्षस को माता से पहले लगाया जाता है भोग

Chaitra Navratri 2026: राजस्थान के पाली जिले में मां शीतला माता का प्राचीन मंदिर बना है, जिसे 800 से अधिक साल पुराना बताया जाता है. मंदिर को लेकर कई चमत्कारी बातें कही जाती हैं. यहां राक्षस को माता से पहले भोग लगाया जाता है.

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राजस्थान का चमत्कारी शीतला माता मंदिर
file photo

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि के आगमन के साथ ही देवी मंदिरों में रौनक बढ़ जाती है. देशभर के देवी मंदिरों में सजावट का काम शुरू हो गया है और कुछ खास जगहों पर मेले की तैयारी चल रही है. ऐसा ही एक मंदिर राजस्थान में मौजूद है, जहां मां आज भी एक अहंकारी राक्षस को शांत कर रही हैं और भोग भी मां से पहले राक्षस को लगता है. जी हां, राजस्थान के पाली में स्थित मां शीतला माता मंदिर में आज भी राक्षस को माता से पहले भोग लगाया जाता है. यह मंदिर चर्म रोगों से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है.

चमत्कारी ओखली की अद्भुत कहानी

राजस्थान के पाली जिले के भाटुण्द गांव में मां शीतला माता का प्राचीन मंदिर बना है, जिसे 800 से अधिक साल पुराना बताया जाता है. मंदिर को लेकर कई चमत्कारी बातें कही जाती हैं. मंदिर के गर्भगृह में मां शीतला की चार भुजी प्रतिमा मौजूद है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि प्रतिमा के सामने एक चमत्कारी ओखली बनी है, जो कई लीटर पानी डालने के बाद भी नहीं भरती है. ओखली की गहराई 1 मीटर है, लेकिन फिर भी कई लीटर पानी अपने अंदर समा जाता है.

राक्षस को क्यों लगाया जाता है भोग?

मंदिर के पुजारी के मुताबिक, जब तक ओखली में दूध की छींटे नहीं पड़ती, तब तक राक्षस का पेट नहीं भरता है और न ही ओखली. स्थानीय लोक कथाओं की मानें, तो जब कभी भी गांव में किसी की शादी होती थी, तब बाबरा नाम का राक्षस दूल्हे को मार देता था. राक्षस के अत्याचार से बचने के लिए गांव के एक ब्राह्मण ने तपस्या करके माता को प्रसन्न किया. माता ने एक ब्राह्मण को आशीर्वाद देकर अपनी बेटी की शादी कराने का आदेश दिया और कहा कि शादी करो, मैं वहां आकर राक्षस का वध करूंगी.

मां शीतला के कहने पर ब्राह्मण ने ऐसा ही किया और तय समय पर मां ने बाबरा राक्षस का वध कर दिया. मरने से पहले राक्षस ने मां के चरणों में गिरकर माफी मांगी तब मां ने बाबरा को माफ किया और साल में दो बार उसे पानी पिलाने और भोग लगाने का आदेश दिया, जिसके फलस्वरूप शीतला सप्तमी एवं ज्येष्ठ पूर्णिमा को मेला भरता है और गांव की सारी औरतें घड़ों में पानी भरकर ओखली में डालती है, जिससे राक्षस शांत रहे.

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चैत्र के महीने में नवरात्रि से पहले ही मेला का शुभारंभ हो जाता है, जो कई दिनों तक चलता है. इस मौके पर मंदिर में लाखों की संख्या में भक्त मंदिर की कठिन सीढ़ियों को चढ़कर मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
 

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