Apara Ekadashi 2026: पूरे साल में आने वाली 24 एकादशियों में अपरा एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर अपरा एकादशी मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है. इस साल आज यानी 13 मई को अपरा एकादशी मनाई जा रही है. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर और सच्चे मन से श्रीहरि की उपासना करने से जीवन के दुख‑कष्ट दूर होते हैं और सुख‑समृद्धि की प्राप्ति होती है. इस दिन कुछ आसान उपाय करना बेहद फलदायी माना गया है. इन सरल कामों से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मानसिक शांति, जीवन की परेशानियों से राहत मिलती है.
यह भी पढ़ें: Apara Ekadashi 2026: 13 मई को रखा जाएगा अपरा एकादशी का व्रत, पूजा के दौरान पढ़ें ये कथा, मिलेगा पूर्ण लाभ
अपरा एकादशी पर करें ये आसान काम
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और उनकी विशेष कृपा पाने के लिए विष्णु चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है. मान्यता है कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा भाव से इस चालीसा का पाठ करता है उसके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि होती है. साथ ही आर्थिक कष्टों को दूर करने के लिए भी विष्णु चालीसा का पाठ करना शुभ होता है.
यहां पढ़ें विष्णु चालीसा
विष्णु चालीसा
दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय,
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय।।
नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी।।
सुंदर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत।।
शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे।।
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन।।
पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण।।
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा।।
आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रत्नन को निकलाया।।
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया।।
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया।।
वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया।।
असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई।।
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी।।
देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी।।
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे।।
हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे।।
चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन।।
शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण।
करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण।।
करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई।।
दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई।
पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ।।
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै।।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.














