Mysterious Story of Garbh Sanskar: सनातन परंपरा में जिन 16 संस्कारों को जरूरी माना गया है, उसमें सबसे पहले गर्भ संस्कार आता है, जिसका उद्देश्य मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से पवित्र होकर एक गुणी और स्वस्थ संतान को पाना है. हिंदू मान्यता के अनुसार इस संस्कार के जरिए न सिर्फ गर्भ की सुरक्षा होती है बल्कि एक सुयोग्य संतान का जन्म होता है. जिस गर्भाधान संस्कार के शुभ प्रभाव से कोख में पल रहे बच्चे का पूर्ण विकास और दिव्य गुणों से युक्त संस्कारी संतान का जन्म होता है, उसी पर फोकस करते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने प्रदेश के विश्वविद्यालयों में ‘गर्भ संस्कार' की पढ़ाई कराने और सरकारी अस्पतालों में ‘गर्भ संस्कार कक्ष' बनवाने की बात कही है. उन्होंने इस योजना का ऐलान जिस अभिमन्यु और अष्टावक्र का उदाहरण देते हुए दिया है, आइए उसकी कथा को विस्तार से जानते हैं.
अभिमन्यु की कथा
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत की कथा तब तक अधूरी है, जब तक कि उसमें अभिमन्यु का जिक्र न हो. अभिमन्यु महाभारत के नायक अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे. जिनके गर्भ संस्कार की कहानी महाभारत के सबसे रोचक और महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक है जो यह दर्शाता है कि सनातन परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक जुड़ा हर संस्कार किस तरह चरित्र निर्माण के साथ मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक विकास में सहायक है.
महाभारत की कथा के अनुसार एक बार अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह नामक विशेष युद्ध संरचना को भेदने की विधि बता रहे थे. मान्यता है कि अर्जुन द्वारा सुभद्रा को चक्रव्यूह के बारे में बताई जाने वाली महत्वपूर्ण बातों को अभिमन्यु ने गर्भ में रहते हुए सुन रहे थे.
इस कथा के अनुसार जब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद उससे बाहर निकलने का तरीका बता रहे थे, तभी उन्हें नींद आ गई. जिसके कारण अभिमन्यु चक्रव्यूह को भेदने की प्रकिया को नही जान सके. इस तरह सुभद्रा के गर्भ में उन्हें चक्रव्यूह में प्रवेश करने का ज्ञान तो प्राप्त हुआ लेकिन उसे भेदने का पूर्ण ज्ञान न हो पाया. कालांतर में महाभारत के युद्ध के समय उनका यही अधूरा ज्ञान उनकी मृत्यु का कारण बना.
अष्टावक्र की कहानी
जिस तरह महाभारतकाल में अभिमन्यु को गर्भ के दौरान दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, कुछ वैसी ही कथा अष्टावक्र की भी मिलती है. अष्टावक्र प्रकांड विद्वान कहोड़ और सुजाता की संतान थे. मान्यता है कि जब अष्टावक्र अपनी माता सुजाता की कोख में थे तो उनकी मां सुजाता ने सोचा कि उनकी होने वाली संतान महाज्ञानी हो. इसके लिए उन्होंने अपने पति कहोड़ द्वारा शिष्यों को दी जाने वाली शिक्षा को सुनना प्रारंभ कर दिया.
मान्यता है कि अष्टावक्र ने गर्भ में रहते हुए कुछ ही दिनों वेद और शास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर लिया और एक दिन जब उनके पिता कहोड़ वेद का पाठ कर रहे थे, तभी अष्टावक्र माता के गर्भ से बोल पड़े कि पिताजी आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं. इतना सुनते ही कहोड़ क्रोधित हो गए और उन्होंने इसे अपना अपमान समझते हुए अष्टावक्र से कहा कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है, इसलिये तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जायेगा. इसके बाद अष्टावक्र ने आठ जगह से टेढ़े अंगों के साथ जन्म लिया, लेकिन बावजूद इसके वह दिव्य ज्ञान से संपन्न थे.
मान्यता है कि एक बार बन्दी ऋषि ने उनके पिता को शास्त्रार्थ में हराकर नदी में डुबो दिया था. जब यह बात अष्टावक्र को पता चली तो वे सीधे राजा जनक की सभा में पहुंच गये और उन्होंने शास्त्रार्थ करके न सिर्फ बंदी ऋषि को हराकर अपने पिता को मुक्त कराया बल्कि ब्राह्मणों को भी वापस किया. इससे प्रसन्न होकर उनके पिता ने उन्हें श्राप से मुक्त होने के लिए समंगा नदी में स्नान करने को कहा. मान्यता है कि उस घटना के बाद उनका टेढ़ापन दूर हो गया और उन्होंने बाद में राजा जनक को जो उपदेश दिया वह आज 'अष्टावक्र गीता' के नाम जाना जाता है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)














