दावोस में जो होता है उसका मेरी जिंदगी से क्या लेना देना? आम आदमी के लिए दावोस के मायने

दुनिया के सबसे ताकतवर मंच दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का आपकी रोजमर्रा की जिंदगी से क्या रिश्ता है?

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  • दावोस में अगर अंतरराष्ट्रीय मंदी पर नीति बनती है, तो उसका असर आम आदमी की नौकरी, महंगाई और ईएमआई पर पड़ता है.
  • अगर जलवायु नीति पर सहमति बनती है, तो वह आपके बिजली बिल, पेट्रोल-डीजल (ईंधनों) की कीमत को प्रभावित करती है.
  • अगर टेक्नोलॉजी और एआई पर सहमति बनती है, तो भविष्य की नौकरियों और शिक्षा व्यवस्था बदलती है.
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हर साल जनवरी में स्विट्जरलैंड के छोटे से पहाड़ी शहर दावोस में दुनिया के सबसे ताकतवर नेता, बड़े उद्योगपति, सेंट्रल बैंकों के प्रमुख और नीति-निर्माता इकट्ठा होते हैं. इस मंच को कहा जाता है वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम. टीवी स्क्रीन पर बर्फ से ढकी सड़कों के बीच सूट-बूट में चलते नेताओं की तस्वीरें देखकर आम आदमी के मन में अक्सर एक सवाल उठता है कि 'दावोस में जो होता है, उसका मेरी जिंदगी से क्या लेना-देना?' तो असलियत यह है कि दावोस में होने वाली चर्चाएं और फैसले धीरे-धीरे आपकी नौकरी, आपकी जेब, आपके बच्चों की पढ़ाई, आपकी बिजली-पानी की कीमत और यहां तक कि आपके भविष्य की सुरक्षा तक को प्रभावित करते हैं. चलिए इसी की पड़ताल करते हैं.

दावोस क्या है, क्यों है दुनिया के ताकतवर नेताओं का सबसे बड़ा मंच और भारत के लिए क्यों अहम है यह सम्मेलन?

हर साल जनवरी में बर्फ से ढके स्विट्जरलैंड के छोटे से शहर दावोस (Davos) के मौसम में केवल ठंड नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और भविष्य की दिशा तय करने वाली चर्चाओं की गर्मी होती है. यही वजह है कि दावोस के बारे में कहा जाता है कि 'यहां दुनिया का भविष्य अनौपचारिक रूप से तय होता है.' हालांकि आम जनमानस पर इस मंच में हुई बातचीत का असर क्या होता है इसे जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि दावोस आखिर है क्या? वहां कौन लोग जाते हैं? वहां लिए गए फैसले क्या सच में हमारी जिंदगी पर असर डालते हैं? और भारत के लिए यह मंच इतना अहम क्यों बन चुका है?

यहां हम आपको दावोस की पूरी कहानी, उसकी अहमियत और भारत की भूमिका विस्तार से समझाने की कोशिश करेंगे ताकि जब भी भविष्य में आप दावोस से जुड़ी कोई खबर पढ़ें, तो उसका अर्थ और आपके जीवन में उसका असर दोनों समझ सकें.

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भारत के लिए दावोस क्यों इतना महत्वपूर्ण है?

भारत पिछले एक दशक में दावोस का सबसे सक्रिय और प्रभावशाली प्रतिभागी बन गया है. इसकी वजहें साफ हैं. पहला, भारत निवेश आकर्षित करने का सबसे बड़ा मंच बन गया है. दावोस भारत के लिए ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रोड शो जैसा बन चुका है. यहां स्वयं भारत के प्रधानमंत्री और अन्य बड़े लीडर्स, उद्योगपति आदि दुनिया की कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित करते हैं. बीते वर्षों के दौरान भारत को दावोस के मंच से मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, रिन्यूएबल एनर्जी, डिजिटल और स्टार्टअप सेक्टर में हजारों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिले हैं.

यह भारत की अंतरराष्ट्री इमेज को गढ़ने का मंच बन गया है.  दावोस में भारत खुद को केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ा लोकतंत्र ही नहीं बल्कि विश्वसनीय लोकतंत्र और डिजिटल पावरहाउस के रूप में पेश करता है जो वैश्विक विकास में अहम भागीदारी निभा रहा है. भारत स्वयं को केवल उपभोक्ता बाजार के रूप में नहीं बल्कि एक वैश्विक समाधान देने वाले देश के रूप में भी पेश करता है.

इस मंच के माध्यम के भारत  के शीर्ष नेता अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों, अफ्रीकी और एशियाई देशों के टॉप लीडर्स से द्विपक्षीय वार्ता करते हैं. जहां अमूमन व्यापार, रक्षा, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर बातचीत होती है. बीते वर्षों के दौरान भारत इस मंच से अपने यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, फिनटेक और एआई इनोवेशन को दुनिया के सामने पेश कर चुका है. दावोस में भारत ने यह भी बताया है कि कैसे डिजिटल पेमेंट, आधार, यूपीआई, डिजिटल गवर्नेंस जैसे मॉडल दुनिया के लिए उदाहरण बन सकते हैं.

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वैश्विक संकट में दावोस का किरदार

दावोस का इतिहास बताता है कि 2008 की वैश्विक मंदी के बाद यह वैश्विक आर्थिक सुधार का मंच बना तो कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग और वैक्सीन नीति पर चर्चाएं यहीं तेज हुईं फिर जब रूस और यूक्रेन आपस में भिड़े तो वैश्विक ऊर्जा संकट और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दे यहीं केंद्र में आए. यानी दावोस हर बड़े वैश्विक संकट के बाद वैचारिक और रणनीतिक रीसेट पॉइंट बनता रहा है.

दावोस केवल आज की समस्याओं पर चर्चा नहीं करता, बल्कि भविष्य की दुनिया की रूपरेखा तैयार करता है. जैसे- AI और ऑटोमेशन से नौकरियां कैसे बदलेंगी, जलवायु परिवर्तन के बीच अर्थव्यवस्थाएं कैसे ढलेंगी, डिजिटल गवर्नेंस का भविष्य क्या होगा और भविष्य में वैश्विक शक्ति संतुलन कैसे बदलेगा. इन सवालों पर नीति निर्माताओं और कंपनियों को दिशा देने का काम दावोस में होता है.

दावोस और आम आदमी

अगर दावोस में निवेश बढ़ाने की बात होती है तो इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ता है, यानी नौकरियां बढ़ती हैं. अगर जलवायु पर कोई नीति बनती है, तो वो आपके रोजमर्रा के जीवन पर सीधे असर डालती है. जैसे आपके बिजली, पेट्रोल की कीमतें प्रभावित होती हैं. अगर कोई टेक नीति बनती है, तो इससे आम-आदमी की नौकरी, शिक्षा और उनके कौशल में इसका सकारात्मक परिवर्तन दिखता है.

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भारत वैसे भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है. देश के नीति निर्माता इसे वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की कोशिश में लगे हैं. साथ ही यह डिजिटल और टेक्नोलॉजी में नेतृत्व की भूमिका में के साथ ग्लोबल साउथ की आवाज बनने की स्थिति में है. दावोस भारत को यह मौका देता है कि वह निवेश का सबसे भरोसेमंद सेंटर बने. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण में अपनी भागीदारी बढ़ाए और दुनिया के सामने विकास के नए मॉडल रखे.

तो दावोस को लेकर आम आदमी को यह जरूर याद रखना चाहिए कि वहां की चर्चा का असर आपकी नौकरी, महंगाई और भविष्य पर पड़ सकता है. भारत वहां केवल प्रतिनिधि नहीं, बल्कि निवेश और नीति के मामले में एक हद तक अगुवाई कर रहा है. यहां जो बातें होती हैं, वे धीरे-धीरे नीतियों, निवेश फैसलों और वैश्विक सहयोग में बदलती हैं और अंततः आम आदमी की जिंदगी तक पहुंचती हैं. तो जब अगली बार ऐसी कोई खबर पढ़ें कि 'भारत ने दावोस में ये कहा...' तो उसे समझने की पूरी कोशिश करें, क्योंकि यह केवल भारत का बयान नहीं बल्कि आपके आने वाले वर्षों की दिशा के संकेत हैं.

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