नेपाल में शुक्रवार, 28 फरवरी तड़के सुबह रिक्टर स्केल पर 5.5 तीव्रता का भूकंप आया. इसका असर बिहार में भी महसूस किया गया. साथ ही पाकिस्तान में भी शुक्रवार सुबह रिक्टर पैमाने पर 4.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसमें भूकंप की गहराई 10 किमी थी.
तिब्बत की बात करें तो पिछले तीन दिनों के अंदर 5 बार भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं. पिछले एक महीने में जहां नेपाल में आए भूकंपों की संख्या 5 रही है वहीं तिब्बत में यह आंकड़ा 40 है. इस साल की शुरुआत में ही तिब्बत उस समय दहला जब रिक्टर स्केल पर 7.1 का भूकंप आया. इसमें कम से कम 126 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. एक बात तो साफ है कि भारत के पड़ोस में बसे ये दोनों क्षेत्र हमेशा से भूकंप को लेकर संवेदनशील रहे हैं. सवाल है कि आखिर क्यों? चलिए हम आपको बताते है. शुरुआत इस बात को आसान भाषा में समझने से करते हैं कि आखिर भूकंप क्यों आते हैं.
Q: भूकंप क्यों आता है?
पहले हम धरती की बनावट को समझते हैं. इसकी बाहरी सतह (जिसमें क्रस्ट और ऊपरी मेंटल आते हैं) 15 बड़ी और छोटी प्लेटों से बनी हुई है. ऐसा नहीं है कि ये प्लेट स्थिर हैं. बल्कि ये बहुत धीरे इधर-उधर घूमती हैं. जब ये प्लेट एक दूसरे के सापेक्ष (आमने-सामने) में मूव करते हुए एक-दूसरे से रगड़ खाती हैं, तब भूकंप आता है.
नेपाल में 5.5 रिक्टर स्केल का भूकंप आया है (फोटो- राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र)
यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे की साइट के अनुसार धरती के नीचे मौजूद ये प्लेट हमेशा धीरे-धीरे चलती हैं. घर्षण यानी फ्रिक्शन के कारण वे अपने किनारों पर अटक जाती हैं. इस कारण जब किनारे पर पड़ रहा तनाव फ्रिक्शन के फोर्स से ज्यादा हो जाता है, तो एनर्जी रिलीज होती है. जब यह एनर्जी लहर के रूप में धरती की परत से होकर गुजरती है तो हमें कंपन महसूस होता है. इसी कंपन को भूकंप आना कहते हैं और इसको रिक्टर स्केल पर नापते हैं.
Q: तिब्बत और नेपाल में हर समय भूकंप का खतरा क्यों रहता है?
तिब्बत, नेपाल के साथ-साथ भारत के उत्तर और उत्तर-पूर्व में मौजूद कई सीमावर्ती इलाकों में बार-बार भूकंप आने की वजह उनकी लोकेशन ही है. यह पूरा हिस्सा हिमालय जोन में आता है. हिमालय जोन में बड़े और जानलेवा भूकंपों का इतिहास रहा है. हिमालय दुनिया के सबसे भूवैज्ञानिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों यानी जियोलॉजिकल रूप से एक्टिव जोन में से एक बना हुआ है. यानी यहां की घरती के नीचे मौजूद प्लेट कुछ ज्यादा ही एक्टिव हैं, ज्यादा ही मूव करते हैं.
आगे समय के साथ, यूरेशियन प्लेट नीचे की ओर खिसक गई. यानी यह भारतीय प्लेट के नीचे आ गई. यह प्रक्रिया अब भी जारी है. हिमालय जोन में बार-बार जो भूकंप आती हैं, वो मुख्य रूप से भारतीय और यूरेशिया प्लेटों के आपस में टकराव के कारण आती हैं. दोनों हर साल 40-50 मिमी की रेलेटिव स्पीड (एक-दूसरे की तुलना में) एक दूसरे के उपर मूव कर रही हैं. एक तरफ भारतीय प्लेट हिमालय के नीचे दब रही है, वहीं यूरेशियन प्लेट पामीर पर्वतों के नीचे दब रही है. एक स्टडी के अनुसार यूरेशियन प्लेट से टकराने वाली भारतीय प्लेट तिब्बत के नीचे धीरे-धीरे टूट रही है. यह "स्लैब टियर" एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें भारतीय प्लेट की ऊपरी परत अपनी निचली परत से अलग हो जाती है, जिससे क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूकंपीय गतिविधि पैदा होती है. इस वजह से दोनों प्लेटों के जोड़ पर स्थिति पूरा क्षेत्र भूकंप को लेकर संवेदनशील है.