- अमेरिका आर्कटिक में बढ़ती रूस-चीन चुनौती के बीच अपनी कमजोर आइसब्रेकर क्षमता मजबूत कर रहा है.
- फिनलैंड दुनिया का आइसब्रेकर लीडर है, इसलिए अमेरिका वहां से 11 हाई-टेक आइसब्रेकर खरीद रहा है.
- आर्कटिक रूट भविष्य में एशिया-यूरोप व्यापार का गेम-चेंजर बन सकता है.
आर्कटिक अब सिर्फ बर्फ और पोलर बियर का इलाका नहीं रहा. यह 21वीं सदी की भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का नया रणक्षेत्र बन चुका है. जलवायु परिवर्तन के कारण जैसे-जैसे बर्फ पिघल रहा है, वैसे-वैसे नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, तेल--गैस और दुर्लभ खनिजों तक पहुंच आसान हो रही है और महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज होती जा रही है. इन सब के बीच अमेरिका का फिनलैंड से 11 नए अत्याधुनिक आइसब्रेकर जहाज खरीदने का फैसला सामने आया है. यह सौदा सिर्फ तकनीकी जरूरत नहीं, बल्कि आर्कटिक को लेकर बदलती वैश्विक रणनीति का बड़ा संकेत है. अमेरिका यह सौदा क्यों कर रहा है? क्या इसमें भी ग्रीनलैंड का कोई किरदार है? ये आइसब्रेकर कैसे होंगे? और आखिर आर्कटिक कैसे दुनिया के व्यापार नक्शे को बदल सकता है?
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आर्कटिक बन गया दुनिया का नया गेम-चेंजर
पिछले तीन दशकों में आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ की परत करीब 40 प्रतिशत तक घट चुकी है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2035–2040 के आसपास गर्मियों में आर्कटिक महासागर करीब-करीब बर्फ-मुक्त हो सकता है. इसका मतलब है कि ऐसे समुद्री रास्ते खुल जाएंगे, जो पहले साल के ज्यादातर समय बंद रहते थे.
आर्कटिक के तीन बड़े समुद्री मार्गः पहला- नॉर्दर्न सी रूट - रूस के साइबेरियाई तट के साथ; दूसरा- नॉर्थवेस्ट पैसेज - कनाडा के आर्कटिक द्वीपों के बीच; और तीसरा - ट्रांस-पोलर रूट - सीधे उत्तरी ध्रुव के ऊपर से एशिया-यूरोप मार्ग को जोड़ता है.
इन मार्गों से शंघाई से रॉटरडैम (नीदरलैंड) की दूरी 20000 किलोमीटर से घटकर करीब 12800 किलोमीटर रह जाती है. समय 10 से 15 दिन तक कम हो सकता है. तो स्पष्ट है कि ईंधन की लागत और कार्बन उत्सर्जन दोनों में कमी आएगी. यही वजह है कि आर्कटिक अब भविष्य के वैश्विक व्यापार का नया हाईवे बनता दिख रहा है.
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अमेरिका को अचानक आइसब्रेकर क्यों चाहिए?
आइसब्रेकर ऐसे विशेष जहाज होते हैं जो मोटी बर्फ की चादर को तोड़कर समुद्र में रास्ता बना सकते हैं. आर्कटिक क्षेत्र में जहाजरानी, सैन्य गश्त, वैज्ञानिक रिसर्च और आपात बचाव अभियानों के लिए ये बेहद जरूरी होते हैं. लेकिन अमेरिका की समस्या यह है कि उसके पास फिलहाल सिर्फ दो ऑपरेशनल भारी आइसब्रेकर हैं- पोलस स्टार और हीले. इनमें पोलर स्टार करीब 50 साल पुराना है और अक्सर खराब रहता है, मरम्मत के कारण ऑपरेशन से बाहर रहता है. वहीं रूस के पास 40 से अधिक आइसब्रेकर हैं, जिनमें कई परमाणु ऊर्जा से चलने वाले हैं. चीन ने खुद को ‘नियर-आर्कटिक स्टेट' घोषित करते हुए तेजी से आइसब्रेकर फ्लीट बढ़ाई है. यानी आर्कटिक की दौड़ में अमेरिका पीछे छूटता नजर आ रहा था. यही कारण है कि उसने तेजी से अपनी क्षमता बढ़ाने का फैसला किया है और फिनलैंड से 11 आइसब्रेकर खरीदने की डील की है.
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अमेरिका ने फिनलैंड को ही क्यों चुना?
फिनलैंड को दुनिया का आइसब्रेकर कैपिटल कहा जाता है. क्यों? क्योंकि, फिनलैंड की शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री ने अब तक दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत आइसब्रेकर डिजाइन किए हैं या उन्हें बनाया है. इस देश की बाल्टिक सागर स्थित शिपयार्ड्स सालों से अत्यधिक ठंडे और बर्फीले इलाकों के लिए जहाज बनाने में माहिर हैं. फिनलैंड ने रूस, कनाडा, स्वीडन और अमेरिका जैसे देशों के लिए हाई-एंड आइसब्रेकर बनाए हैं. अमेरिका के लिए अपने देश में आइसब्रेकर बनाना महंगा और समय लेने वाला साबित हो रहा था. इसलिए उसने फिनलैंड से डिजाइन, तकनीक ट्रांसफर और सीधे जहाज खरीदने का रास्ता चुना.
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इन आइसब्रेकर की खासियत क्या होगी?
अमेरिका जिन 11 आइसब्रेकरों को फिनलैंड से खरीदने जा रहा है, वे केवल बर्फ तोड़ने वाले नहीं होंगे, बल्कि मल्टी-मिशन प्लेटफॉर्म होंगे. बताया जा रहा है कि इनके बर्फ तोड़ने की क्षमता बहुत अधिक होगी. ये 2.5 से 3 मीटर मोटी ठोस बर्फ को तोड़कर लगातार आगे बढ़ने में सक्षम होंगे. पानी में इनकी स्पीड 16-18 नॉटिकल माइल तक हो सकती है और बगैर रीफ्यूल किए ये 20 हजार समुद्री मील तक जा सकते हैं. ये लगातार 80 से 90 दिनों तक बगैर किसी मेंटेनेस के समुद्र में रहने की क्षमता से लैस होंगे और इनके पास 120 से 150 लोगों को ले जाने की क्षमता होगी. साथ ही इनमें अपग्रेडेड रडार और सेटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम लगे होंगे. ये ड्रोन लॉन्च करने और रिकवरी सिस्टम से भी लैस होंगे. इन पर हेलिकॉप्टर डेक और हैंगर होंगे. इन पर जलवायु, समुद्र विज्ञान, भूगर्भीय रिसर्च के लिए साइंटिफिक लैब्स भी होंगे. आपात बचाव और तेल रिसाव नियंत्रण उपकरण और भारी क्रेन और टोइंग सिस्टम से भी ये लैस होंगे.
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सैन्य उपयोग के लिए तैयार
हालांकि ये जहाज औपचारिक रूप से कोस्ट गार्ड के लिए होंगे, लेकिन इनमें हथियार मॉड्यूल लगाने की क्षमता, मिसाइल डिफेंस सिस्टम इंटीग्रेशन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सपोर्ट जैसी सुविधाएं भविष्य में जोड़ी जा सकेंगी. यानी जरूरत पड़ने पर ये जहाज आर्कटिक में सैन्य अभियानों में भी इस्तेमाल किए जा सकेंगे.
ग्रीनलैंड के ग्लेशियर जो मुख्य भू-भाग से सटे हुए हैं वो पिघलकर समुद्र में मिल रहे हैं
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ग्रीनलैंड का इससे क्या संबंध है?
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है जो भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है और आर्कटिक महासागर के प्रवेश द्वार पर मौजूद है. यहां दुर्लभ खनिजों, यूरेनियम, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और तेल-गैस भंडार मौजूद हैं. 2019 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को “खरीदने” की इच्छा जताई थी, जिसे डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया था. तब से अमेरिका वहां अपनी सैन्य और रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने में जुटा है. ग्रीनलैंड में पहले से ही अमेरिका का बड़ा एयरबेस थुले एयर बेस (अब पिटुफिक स्पेस बेस) मौजूद है, जो मिसाइल डिफेंस और स्पेस सर्विलांस के लिए अहम है.
अब सवाल यह है कि क्या फिनलैंड से आइसब्रेकर खरीदना सीधे ग्रीनलैंड विवाद से जुड़ा है? इसका जवाब है ‘नहीं' लेकिन रणनीतिक रूप से ‘हां'.
यह सौदा औपचारिक रूप से ग्रीनलैंड से जुड़ा नहीं है, लेकिन आइसब्रेकर अमेरिका को ग्रीनलैंड के आसपास के समुद्री इलाकों में सालभर ऑपरेशन की क्षमता देंगे. वहां बढ़ती चीनी और रूसी गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलेगी. खनिज और ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच आसान होगी. आपात स्थिति में सैन्य और नागरिक अभियानों का समर्थन संभव होगा. यानी ग्रीनलैंड इस पूरी रणनीति का मौन केंद्र बना हुआ है.
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आर्कटिक में अमेरिका की रणनीति क्या है?
अमेरिका की आर्कटिक नीति तीन स्तंभों पर टिकी है. इनमें पहला स्तंभ है- सुरक्षा और सैन्य प्रभुत्व. रूस ने आर्कटिक में नए सैन्य बेस बनाए हैं. परमाणु-संचालित आइसब्रेकर फ्लीट तैयार की है. एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल टेस्ट साइट्स विकसित की हैं. तो चीन ने खुद को ‘नियर-आर्कटिक स्टेट' घोषित किया है. उसने रूस के साथ आर्कटिक ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश बढ़ाया है. उसने भी आइसब्रेकर और रिसर्च शिप्स तैनात किए हैं. तो अमेरिका के लिए यह सीधे तौर पर सामरिक खतरा है लिहाज वो आर्कटिक में अपनी मौजूदगी को बढ़ाने के लिए कोस्ट गार्ड और नेवी दोनों की क्षमताओं में विस्तार कर रहा है. इसके लिए उसने सबसे अहम कदम आइसब्रेकर की खरीद के साथ उठाए हैं.
अमेरिका की आर्कटिक नीति का दूसरा स्तंभ है- आर्थिक अवसरों पर नियंत्रण बनाना. अनुमान है कि आर्कटिक में दुनिया के 13% अनछुए तेल भंडार, 30% अनछुए प्राकृतिक गैस भंडार हैं, तो कोबाल्ट, निकेल, लिथियम, ग्रेफाइट, रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे स्ट्रैटेजिक मिनरल की भी प्रचुर मौजूदगी है. इनका इस्तेमाल ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी स्टोरेज और रक्षा उद्योग में बेहद जरूरी हैं. आइसब्रेकर के बिना इन क्षेत्रों तक सालभर पहुंच असंभव है. इसलिए अमेरिका इन्हें अपनी ऊर्जा और औद्योगिक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा मान रहा है.
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अमेरिका की आर्कटिक नीति का तीसरा स्तंभ है- वैज्ञानिक और पर्यावरणीय नेतृत्व. जैसा कि ऊपर बताया गया है कि आर्कटिक जलवायु परिवर्तन का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है. यहां की बर्फ तेजी से पिघल रहा है जिससे समुद्र में जल स्तर बढ़ रहा है. ग्लोबल वार्मिंग पहले से अधिक तेज हो गई है. यहां का तापमान पहले की तुलना में औसतन 7 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ गया है. अमेरिका अपने नए आइसब्रेकरों को क्लाइमेट रिसर्च प्लेटफॉर्म, समुद्र विज्ञान लैब्स, पर्यावरण निगरानी स्टेशन के रूप में भी इस्तेमाल करेगा. इससे उसे जलवायु परिवर्तन के मामले में नैरेटिव की लड़ाई में भी बढ़त हासिल होगी.
रूस बनाम अमेरिका: आर्कटिक पर नई शीत युद्ध
आर्कटिक में रूस की पैठ पहले से मौजूद है. आर्कटिक तटरेखा की सबसे बड़ा हिस्सा रूस के पास ही है. 40 आइसब्रेकर हैं तो उनमें कम से कम 6 परमाणु संचालित हैं. उसकी रणनीति है कि नॉर्दर्न सी रूट का वो व्यावसायिक इस्तेमाल करे. रूस चाहता है कि भविष्य में एशिया और यूरोप के बीच व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आर्कटिक में उसके नियंत्रण वाले मार्गों से गुजरे ताकि ट्रांजिट फीस, लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा के निर्यात से उसे भारी कमाई हो. अमेरिका इसे खुद के लिए एक स्ट्रैटेजिक चुनौती मानता है और यहां अपनी मौजूदगी भी बड़े पैमाने पर स्थापित करना चाहता है. फिनलैंड से आइसब्रेकर खरीदना इस क्षेत्र में संतुलन बनाने की कोशिश का हिस्सा है.
चीन का आइसब्रेकर Xuelong 2
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आर्कटिक में चीन से अमेरिका को क्या डर है?
अमेरिका को यह भी डर है कि चीन भविष्य में आर्कटिक के रूट्स पर अपनी पकड़ बढ़ाएगा. चीन भले ही आर्कटिक देश नहीं है, पर उसने खुद को नियर-आर्कटिक स्टेट घोषित कर रखा है. उसके पास खुद के बनाए आइसब्रेकर Xuelong और Xuelong 2 हैं. रूस के साथ आर्कटिक एलएनजी प्रोजेक्ट्स में चीन ने अरबों डॉलर निवेश किए हैं. चीन ने आर्कटिक शिपिंग रूट्स को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से जोड़ने की योजना बनाई है. अमेरिका को डर है कि चीन आर्कटिक में आर्थिक घुसपैठ के जरिए रणनीतिक प्रभाव बढ़ाएगा. उसे डर है कि चीन वहां भविष्य में अपनी सैन्य उपस्थिति भी बना सकता है. इसलिए अमेरिका का फिनलैंड से किया गया सौदा चीन के लिए भी एक स्ट्रैटेजिक मैसेज है.
फिनलैंड 2023 में नेटो का 31वां सदस्य बना
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फिनलैंड के लिए यह सौदा कितना बड़ा है?
फिनलैंड के लिए यह सौदा उसकी शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री के लिए अब तक का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय रक्षा अनुबंध हो सकता है जिससे हजारों नौकरियां पैदा होंगी. यह सौदा फिनलैंड को आइसब्रेकर टेक्नोलॉजी लीडर के रूप में उसे और मजबूत बनाएगा. यूक्रेन के साथ युद्ध के बीद फिनलैंड 2023 में नेटो का 31वां सदस्य बना था. रूस के साथ उसके रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं. 1939-40 में तब के सोवियत संघ ने फिनलैंड पर आक्रमण कर उसके कारेलिया प्रांत पर कब्जा जमा लिया था. इससे फिनलैंड को अपनी 10 फीसद जमीन गंवानी पड़ी थी. आज फिनलैंड की रूस से सटी 1340 किलोमीटर की सीमा है और यह सौदा अमेरिका या यूं कहें कि पश्चिमी देशों के साथ उसके गठबंधन की मजबूती के संकेत देता है.
जिस तरह 20वीं सदी में समुद्री रास्तों और तेल क्षेत्रों पर नियंत्रण ने वैश्विक राजनीति तय की थी, कुछ उसी तरह 21वीं सदी में आर्कटिक के संसाधन और इससे निकलने वाले नए मार्ग महाशक्तियों की दिशा तय कर सकते हैं. अमेरिका का फिनलैंड से आइसब्रेकर खरीदना उसी भविष्य की तैयारी में पहला बड़ा कदम माना जा सकता है.














