Caste Discrimination Cases: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के यूजीसी बिल 2026 को लेकर देशभर में बहस और विरोध देखने को मिल रहा है. इस बिल के तहत यूजीसी ने एक नया नियम बनाया है, जिसे प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन कहा गया है. इस नियम का मकसद कॉलेज और यूनिवर्सिटी में होने वाले जातिगत भेदभाव पर रोक लगाना है. नए नियम के मुताबिक अब हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक इक्विटी कमेटी बनाई जाएगी. ये कमेटी SC, ST और OBC छात्रों से जुड़ी जातिगत टिप्पणियों और भेदभाव की शिकायतों पर सुनवाई करेगी. हालांकि इस नियम को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध भी हो रहा है. इसी बीच सवाल ये भी उठ रहा है कि अगर पहले ऐसे नियम होते, तो क्या कुछ जिंदगियां बच सकती थीं.
रोहित वेमुला
कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जातिगत भेदभाव का सबसे बड़ा और दर्दनाक मामला रोहित वेमुला का माना जाता है. रोहित हैदराबाद यूनिवर्सिटी में पीएचडी के छात्र थे. वो अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े हुए थे और कैंपस में दलित छात्रों के हक की बात करते थे. आरोप है कि एक छात्र नेता की शिकायत के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने रोहित के साथ भेदभाव किया. उन्हें कैंपस से बाहर कर दिया गया और लगातार मानसिक दबाव में रखा गया. इसी तनाव के चलते 17 जनवरी 2016 को रोहित ने आत्महत्या कर ली. उनकी मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था.
पायल तड़वी
रोहित के बाद साल 2019 में एक और दिल तोड़ने वाला मामला सामने आया. मुंबई के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाली डॉक्टर पायल तड़वी ने आत्महत्या कर ली. पायल ST कैटेगरी से थीं और उन पर तीन सीनियर महिला डॉक्टरों पर जातिगत टिप्पणियां किए जाने का आरोप लगा. परिवार का कहना था कि लगातार अपमान और मानसिक दबाव की वजह से पायल टूट चुकी थीं. 22 जनवरी 2019 को पायल ने अपने हॉस्टल में फांसी लगाकर जान दे दी. इस मामले में तीनों डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें जमानत मिल गई.
दर्शन सोलंकी
आईआईटी बॉम्बे में पढ़ाई कर रहे छात्र दर्शन सोलंकी की मौत ने भी कई सवाल खड़े किए. दर्शन केमिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे. 12 फरवरी 2023 को उन्होंने हॉस्टल की सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. परिवार का आरोप था कि दर्शन कॉलेज कैंपस में जातिगत भेदभाव से परेशान थे. हालांकि जांच कमेटी ने इसे पढ़ाई के दबाव से जोड़ा. परिवार ने इस रिपोर्ट पर सवाल उठाए, क्योंकि जांच कमेटी में उसी कॉलेज के अधिकारी शामिल थे.
आयुष आश्ना और अनिल कुमार
दिल्ली आईआईटी के दो SC छात्र आयुष आश्ना और अनिल कुमार का मामला भी सामने आया. दोनों छात्रों ने कॉलेज में जातिगत भेदभाव झेलने की बात कही. परिवार ने एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. मार्च 2025 में इस केस से जुड़े एक अहम फैसले में कोर्ट ने कॉलेज और यूनिवर्सिटी में मेंटल हेल्थ और भेदभाव के मामलों की जांच के लिए नेशनल टास्क फोर्स बनाने का आदेश दिया.
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