बच्चा पैदा होने पर पेरेंट्स को मिलती है 16 महीने की छुट्टी, इस देश में है नौकरी करने वालों की मौज

Maternity Leave: पितृत्व अवकाश के मामले में स्वीडन के नियम सबसे बेहतर माने जाते हैं. यहां बच्चे के जन्म के बाद माता-पिता को मिलकर 480 दिन यानी करीब 16 महीने की पेड छुट्टी मिलती है. इस दौरान करीब 390 दिनों तक सैलरी का बड़ा हिस्सा दिया जाता है.

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Maternity Leave

Maternity Leave: किसी भी दंपत्ति के लिए माता-पिता बनना एक खूबसूरत, लेकिन उतनी ही जिम्मेदारी भरा बदलाव होता है. अब यह सोच भी बदल रही है कि बच्चे की देखभाल सिर्फ मां की जिम्मेदारी है. आज हर पिता भी चाहता है कि वह अपने बच्चे के शुरुआती दिनों में उसके साथ रहे, उसे बढ़ते हुए देखे और उस सफर का हिस्सा बने. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस सोच को और मजबूती दी है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि पितृत्व अवकाश (paternity leave) को लेकर स्पष्ट कानून बनाने पर विचार किया जाना चाहिए. यानी आने वाले समय में भारत में भी पिता को बच्चे के जन्म के बाद छुट्टी मिलने का रास्ता खुल सकता है. लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि ऐसा सिस्टम अभी सिर्फ ख्वाबों में ही होता है, तो दुनिया में कुछ देश ऐसा है जहां यह पहले से हकीकत है.

इस देश में 16 महीने की छुट्टी 

इस मामले में स्वीडन के नियम सबसे बेहतर माने जाते हैं. यहां बच्चे के जन्म के बाद माता-पिता को मिलकर 480 दिन यानी करीब 16 महीने की पेड छुट्टी मिलती है. इस दौरान करीब 390 दिनों तक सैलरी का बड़ा हिस्सा दिया जाता है. सबसे खास बात यह है कि यह छुट्टी मां और पिता दोनों के बीच बांटी जाती है और कुछ दिन ऐसे होते हैं जो पिता के लिए भी रिजर्व रहते हैं, ताकि उनकी भागीदारी तय हो सके. यही वजह है कि वहां पिता का बच्चे की परवरिश में सक्रिय होना एक नॉर्मल बात है, कोई एक्स्ट्रा जिम्मेदारी नहीं.

इन देशों में भी बेहतर व्यवस्था 

स्वीडन की तरह कुछ और देश में इस मॉडल को अपना चुके हैं. नॉर्वे में पेरेंट्स को लगभग एक साल तक सैलरी के साथ छुट्टी मिलती है. एस्टोनिया में यह अवधि 80 हफ्तों से भी ज्यादा हो सकती है. स्पेन में मां और पिता दोनों को बराबर 16-16 हफ्ते की पेड छुट्टी मिलती है, जबकि फिनलैंड में जरूरत पड़ने पर बच्चे के शुरुआती सालों तक घर पर रहने का ऑप्शन भी दिया जाता है.

क्या भारत में कभी होगा ऐसा 

कोई ताज्जुब नहीं कि जिन देशों में पैरेंटल लीव मजबूत है, वहां बच्चों की शुरुआती देखभाल बेहतर होती है और महिलाओं की नौकरी में भागीदारी भी ज्यादा रहती है. भारत में फिलहाल मातृत्व अवकाश का कानून तो है, लेकिन पितृत्व अवकाश को लेकर स्पष्ट राष्ट्रीय कानून नहीं है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी को एक बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. अगर आने वाले समय में भारत भी इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह सिर्फ नौकरी करने वाले माता-पिता के लिए राहत नहीं होगी, बल्कि समाज में जेंडर रोल्स को लेकर सोच बदलने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित हो सकता है.

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