NCERT की एक और किताब पर बढ़ा विवाद, अब सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका, जानें क्या है पूरा मामला

NCERT की कक्षा 8 की किताब पर अब एक और याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल. जानिए क्यों झुग्गीवासियों और न्यायपालिका से जुड़े एक पैराग्राफ पर मचा है बवाल.

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याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2007 से लगातार इस पुस्तक का प्रसार होना अब संवैधानिक जांच की मांग करता है. 

NCERT Book Controversy : बच्चों के बस्ते में रखी किताबों को लेकर अब कानूनी लड़ाई तेज होती जा रही है. अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की एक किताब में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाले हिस्से पर नाराजगी जताई थी, और अब इसी क्लास की एक और पुरानी किताब पर सवाल उठ खड़े हुए हैं. यह याचिका डॉ. पंकज पुष्कर ने दाखिल की है, जो खुद NCERT की किताबों को लिखने की प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं.

क्या है मामला

मामला कक्षा 8 की किताब 'सोशल एंड पॉलिटिकल लाइफ – III' से जुड़ा है. यह किताब साल 2007 से ही स्कूलों में पढ़ाई जा रही है. याचिकाकर्ता का कहना है कि इस किताब के पेज नंबर 62 पर न्यायपालिका (Judiciary) की छवि को गलत तरीके से पेश किया गया है. किताब में एक जगह लिखा है कि "हालिया फैसले झुग्गीवासियों को शहर में अतिक्रमणकर्ता के रूप में देखते हैं."

क्यों उठ रहे हैं सवाल?

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कथन निष्कासन संबंधी न्यायिक दृष्टिकोण को एकतरफा और संदर्भ से हटकर प्रस्तुत करता है. इसमें यह नहीं बताया गया कि अदालतों को प्रतिस्पर्धी संवैधानिक अधिकारों, वैधानिक प्रावधानों और जनहित के बीच संतुलन बनाना होता है.

याचिका के अनुसार, कक्षा 8 जैसे संवेदनशील स्तर के छात्रों के लिए ऐसी प्रस्तुति न्यायपालिका को असंवेदनशील या प्रतिगामी दिखा सकती है और संस्थान में जन-विश्वास को प्रभावित कर सकती है. उस मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” संबंधी अध्याय पर कड़ी आपत्ति जताई थी. 

पीठ ने स्कूल शिक्षा विभाग और एनसीईआरटी निदेशक को अवमानना नोटिस जारी करते हुए चेतावनी दी थी कि अगर सामग्री को न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप का जानबूझकर प्रयास पाया गया, तो यह आपराधिक अवमानना का मामला बन सकता है. याचिकाकर्ता ने बताया है कि वे स्वयं NCERT की पाठ्यपुस्तक विकास प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं और पूर्व में सह-लेखन व अनुवाद का कार्य कर चुके हैं.

उन्होंने कहा है कि वे प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि “प्रतिभागी-गवाह” के तौर पर अदालत की सहायता करना चाहते हैं, ताकि शैक्षणिक सामग्री में संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो सके.

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याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2007 से लगातार इस पुस्तक का प्रसार होना अब संवैधानिक जांच की मांग करता है. आपको बता दें कि मामले की सुनवाई जारी स्वतः संज्ञान कार्यवाही के साथ या उसके क्रम में होने की संभावना है. 

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