World Cup Trophy Controversy: 2 अप्रैल 2011… मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम, 28 साल का इंतज़ार खत्म, और एमएस धोनी के छक्के के साथ भारत बना वर्ल्ड चैंपियन. पूरा देश जश्न में डूबा था, लेकिन इसी जश्न के बीच कुछ ही दिनों बाद एक ऐसी खबर आई, जिसने क्रिकेट जगत में भूचाल ला दिया. खबर ये थी कि टीम इंडिया को जो वर्ल्ड कप ट्रॉफी दी गई थी, वो असली नहीं बल्कि नकली (रिप्लिका) थी.
कैसे शुरू हुआ विवाद?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत को दी गई ट्रॉफी असली वर्ल्ड कप ट्रॉफी नहीं थी. दावा किया गया कि असली ट्रॉफी मुंबई कस्टम्स के पास फंसी हुई थी. तब बताया गया कि यह ट्रॉफी 29 मार्च 2011 को श्रीलंका-न्यूजीलैंड सेमीफाइनल के बाद कोलंबो से मुंबई लाई गई थी. इसकी कीमत करीब 1.3 लाख डॉलर (लगभग 60 लाख रुपये) आंकी गई थी. कस्टम्स ने इस पर करीब 35% ड्यूटी (लगभग 15 लाख रुपये) मांगी, जिस वजह से ट्रॉफी रिलीज नहीं हो पाई.
असली और नकली में फर्क?
रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि जो ट्रॉफी धोनी को दी गई थी, उसके नीचे का बेस काला और खाली था, जबकि असली ट्रॉफी के बेस पर अब तक के सभी वर्ल्ड कप विजेताओं के नाम लिखे होते हैं. इसी बात ने शक को और गहरा कर दिया.
ICC और BCCI आमने-सामने
इस पूरे मामले में BCCI और ICC के बयान एक-दूसरे से टकराते नजर आए थे. BCCI सूत्रों ने माना कि असली ट्रॉफी कस्टम्स के पास थी, जबकि ICC के तत्कालीन CEO हरून लोरगट ने साफ कहा कि भारत को वही ट्रॉफी दी गई थी, जो देने के लिए तय थी. ICC ने सफाई देते हुए बताया कि 2003 के बाद से उनके पास दो ट्रॉफी होती हैं, एक असली ट्रॉफी और दूसरी प्रमोशनल (रिप्लिका) ट्रॉफी. ICC के मुताबिक, जो ट्रॉफी कस्टम्स के पास थी, वह प्रमोशनल ट्रॉफी थी, न कि असली.
हालांकि यह विवाद ज्यादा दिनों तक नहीं चला, लेकिन इसने भारत की ऐतिहासिक जीत पर कुछ वक्त के लिए सवालिया निशान जरूर लगा दिया था. बाद में ICC की सफाई के साथ मामला ठंडा पड़ा, मगर आज भी 2011 वर्ल्ड कप से जुड़ा ये किस्सा क्रिकेट इतिहास के सबसे अजीब और चर्चित विवादों में गिना जाता है.
एक तरफ धोनी की कप्तानी में मिली ऐतिहासिक जीत, तो दूसरी तरफ “फेक ट्रॉफी” का वो शोर, साल 2011 वर्ल्ड कप सिर्फ जीत के लिए नहीं, बल्कि इस विवाद के लिए भी याद किया जाता है.













