Rupee at Record Low: भारतीय रुपये में गिरावट का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. गुरुवार, 30 अप्रैल 2026 को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के स्तर को पार कर अब तक के सबसे निचले स्तर (Record-low) पर पहुंच गया है. ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के तनाव ने भारतीय करेंसी पर भारी दबाव बना दिया है.
शुरुआती कारोबार में ही रुपया गिरकर 95.07 के स्तर पर आ गया और यह 95.126 प्रति डॉलर के सर्वकालिक निचले स्तर (Intraday low) तक फिसल गया.
आखिर क्यों गिरा रुपया? डॉलर की मजबूती और फेड का असर
रुपये की इस कमजोरी के पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) का सख्त रुख भी एक बड़ी वजह है. जेरोम पॉवेल की अगुवाई में अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने हालिया पॉलिसी मीटिंग में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला किया, जिसके बाद डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में मजबूती देखी गई.
इस साल अब तक रुपया 5.8% तक लुढ़का
यह लगातार तीसरा हफ्ता है जब रुपये में गिरावट दर्ज की जा रही है. इस साल अब तक भारतीय रुपया 5.8% तक कमजोर हो चुका है, जिससे यह उभरते एशियाई देशों की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है. आलम यह है कि रुपया एक समय 95.20 के स्तर तक भी चला गया.
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष की वजह से इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है, ऐसे में कच्चा तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जो सीधे तौर पर रुपये की वैल्यू को कम करती है.
भारतीय करेंसी अंडरवैल्यूड,लॉन्ग टर्म के निवेशकों के लिए खरीदारी का मौका: CEA
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन का मानना है कि भारतीय रुपये में मौजूदा गिरावट केवल अस्थायी है.भारत की करेंसी फिलहाल दबाव में हो सकती है लेकिन लॉन्ग टर्म में यह काफी मजबूत रहने वाला है. हाल में ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा कि रुपया इस वक्त अपने असली मूल्य से काफी नीचे यानी 'अंडरवैल्यूड' है, जो निवेशकों के लिए खरीदारी का एक बेहतरीन मौका हो सकता है.
CEA के मुताबिक, जो निवेशक भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और भविष्य की ग्रोथ पर भरोसा करते हैं, उनके लिए निवेश शुरू करने का यह सबसे सही समय यानी अच्छा एंट्री पॉइंट है. हालांकि वैश्विक कारणों और बाहरी दबाव की वजह से रुपया फिलहाल कमजोर दिख रहा है, लेकिन देश के आर्थिक बुनियादी ढांचे को देखते हुए इसके फिर से मजबूत होने की पूरी उम्मीद है.














