अगर आप कोल्हापुर की गलियों से गुजरे हैं, तो एक खास तरह की कड़क-कड़क आवाज आपने जरूर सुनी होगी. ये आवाज किसी मशीन की नहीं, बल्कि उन हाथों की है जो दशकों से लेदर से एक ऐसी विरासत बना रहे हैं जिसे दुनिया कोल्हापुरी चप्पल के नाम से जानती है. इसकी लोकप्रियता और डिमांड को देखते हुए बीते साल इटली की फेमस फैशन कंपनी प्राडा के मॉडल्स स्प्रिंग/समर शो 2026 में कोल्हापुरी चप्पल पहने रैंप पर वॉक करते नजर आए थे. कंपनी ने इसका क्रेडिट भारत को नहीं दिया था. सोशल मीडिया पर इसे लेकर खूब हंगामा हुआ. लेकिन अब प्राडा ने भारतीय कारीगरों के कौशल को मानते हुए उनके साथ मिलकर काम करने का फैसला किया है.
प्राडा का ये नया कलेक्शन पूरी तरह से मेड इन इंडिया होगा. इसे महाराष्ट्र और कर्नाटक के उन आठ जिलों के कुशल कारीगर तैयार करेंगे, जिन्हें पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पल बनाने में महारत हासिल है. ये पहली बार है कि कोई इतना बड़ा अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भारत की फुटवियर कला को अपना रहा है.
बीते साल लगे थे सांस्कृतिक चोरी के आरोप
पिछले साल प्राडा पर आरोप लगे थे कि उसने भारतीय संस्कृति की नकल की है, जिसे सांस्कृतिक चोरी (Cultural Appropriation) कहा गया. विवाद के बाद कंपनी प्राडा को झूकना पड़ा. अब इस नई पहल के जरिए कंपनी ने कहा है कि वो भारतीय पारंपरिक कला और कारीगरों का सम्मान करती है. साथ ही कंपनी कारीगरों के कौशल को बेहतर बनाने और उनके काम को आगे बढ़ाने के लिए निवेश करेगी.
डिजाइन के साथ ट्रेनिंग भी
प्राडा ग्रुप ने इस कलेक्शन के साथ‑साथ एक तीन साल का ट्रेनिंग प्रोग्राम भी शुरू करने का ऐलान किया है. यह ट्रेनिंग आठ जिलों के कारीगरों के लिए होगी. इसमें करीब 180 कारीगरों को शामिल किया जाएगा. इसके लिए उम्र सीमा 18 से 45 साल रखी गई है. इस प्रोग्राम में कारीगर आधुनिक डिजाइन, बदलते फैशन ट्रेंड, नई तकनीक और बेहतर फिनिश, अंतरराष्ट्रीय बाजार की जरूरतों को समझेंगे.
हालांकि ये प्रोग्राम अकेले प्राडा नहीं चलाएगा. इसमें महाराष्ट्र लेदर इंडस्ट्री डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, कर्नाटक लेदर इंडस्ट्री डेवलपमेंट कॉरपोरेशन, राष्ट्रीय फैशन तकनीक संस्थान (NIFT) के साथ कर्नाटक इंस्टिट्यूट ऑफ लेदर एंड फैशन टेक्नोलॉजी (KIFT) की साझेदारी शामिल है.
सेल का पैसा कारीगरों की ट्रेनिंग में होगा इस्तेमाल
प्राडा ने कहा है कि इस लिमिटेड‑एडिशन सैंडल की बिक्री से मिलने वाला हिस्सा कारीगरों की ट्रेनिंग में लगाया जाएगा. कंपनी इसे अपनी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) की अहम पहल मान रही है.
कोल्हापुरी चप्पल को मिला हुआ GI टैग
2019 में कोल्हापुरी चप्पल को GI टैग मिला है. ये टैग महाराष्ट्र के 4 जिलों कोल्हापुर, सांगली, सोलापुर, सतारा और कर्नाटक के 4 जिलों बेलगाम, धारवाड़, बागलकोट, बीजापुर को दिया है. इसका मतलब कि इन 8 जिलों के बाहर कोई भी व्यक्ति अपनी चप्पल को कोल्हापुरी ब्रांड के नाम से नहीं बेच सकता.
कोल्हापुरी चप्पल इको-फ्रेंडली हैं, सस्टेनेबल हैं और स्टाइलिश भी. अगर हम चाहते हैं कि मिलान के रैंप पर भारत का नाम शान से लिया जाए, तो हमें लोकल के लिए वोकल होना होगा.














