पर्सनल लोन के लिए कितनी सैलरी होना जरूरी है? समझिए क्रेडिट हिस्ट्री का असली खेल,आपको कोई भी नहीं बताएगा ये बात

लोन लेने से पहले बस यह सोचिए कि जितनी EMI बन रही है क्या आप उसे हर महीने बिना टेंशन लिए चुका पाएंगे. अगर जवाब ना है तो बैंक भी आखिरकार वही रास्ता अपनाएगा. फर्क बस इतना है कि बैंक यह काम कैलकुलेशन से करता है और आप अपने कमाई खर्च को देखते हुए .

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Personal Loan Online: बैंक लोन देने से पहले सबसे पहले यह देखते हैं कि आपकी कमाई में से कितना पैसा पहले से जा रहा है.
नई दिल्ली:

जब अचानक मेडिकल खर्च आ जाए या महीने के बजट संभालना मुश्किल हो जाए, तब लोगों के दिमाग में सबसे पहले यही सवाल आता है कि पर्सनल लोन कैसे लें और इसके लिए कितनी सैलरी चाहिए. गूगल पर ये सर्च करने पर आपको हर वेबसाइट अलग-अलग नंबर बता देती हैं. जैसे कोई आपको 15000 कहेगा तो कोई 20000 या 25000 रुपये. जिसके बाद एक पल के लिए भले लगता है कि बस इतनी कमाई है तो लोन आसानी से मिल जाएगा. लेकिन असल सच्चाई इससे थोड़ी अलग है. 

ज्यादातर बैंक पर्सनल लोन के लिए मिनिमम इनकम बताते हैं. बड़े शहरों में सैलरीड लोगों के लिए यह आमतौर पर 20000 से 25000 रुपये महीना होती है. छोटे शहरों में यह कम भी हो सकती है. खुद का काम करने वालों यानी सेल्फ एम्प्लॉयड के लिए बैंक अक्सर 30000 रुपये या उससे ज्यादा की बताते हैं. लेकिन इतनी कमाई होना सिर्फ ये बताता है कि आपकी फाइल सीधे रिजेक्ट नहीं होगी. असली खेल इसके बाद शुरू होता है.

आपकी सैलरी से कितना पैसा बचता है ये सबसे अहम

बैंक सबसे पहले यह देखते हैं कि आपकी कमाई में से कितना पैसा पहले से जा रहा है. होम लोन, कार लोन, क्रेडिट कार्ड की EMI और अभी चल रही दूसरी किस्तें सब जोड़ी जाती हैं. अगर आपकी सैलरी का 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा पहले ही EMI में जा रहा है तो बैंक सतर्क हो जाता है. 

जॉब स्टेबिलिटी का बहुत बड़ा रोल

बैंक को ऐसी सैलरी पसंद होती है जो हर महीने समय पर आए. 30000 रुपये की स्टेबल जॉब जो दो साल से एक ही कंपनी में चल रही हो वह 50000 की बदलती नौकरी से ज्यादा सिक्योर लगती है. बार-बार नौकरी बदलना या बीच में गैप होना बैंक को पसंद नहीं आता. बैंक को रिस्क नहीं बल्कि स्टेबिलिटी चाहिए.

सेल्फ एम्प्लॉयड के लिए नियम सख्त

जो लोग खुद का काम करते हैं उनके लिए लोन लेना थोड़ा मुश्किल होता है. बैंक आपके सबसे अच्छे कमाई वाले साल को नहीं मानते. वे पिछले दो या तीन साल की एवरेज इनकम देखते हैं और मानकर चलते हैं कि आगे कभी कमाई घट भी सकती है. ज्यादा कैश में डील करने से इनकम उतार चढ़ाव वाली दिख सकती है. वहीं, ज्यादा टैक्स छूट दिखाना भी लोन में रुकावट बन सकता है.

क्रेडिट हिस्ट्री बदल देती है सारा गेम

बहुत से पर्सनल लोन इसी स्टेज पर रुक जाते हैं. अगर आपने पहले EMI देर से भरी है, क्रेडिट कार्ड लिमिट पूरी इस्तेमाल की है या कोई लोन सेटल किया है तो आपकी सैलरी की अहमियत कम हो जाती है. 35000 कमाने वाला साफ रिकॉर्ड वाला व्यक्ति भी बैंक को 80000 कमाने वाले खराब रिकॉर्ड वाले इंसान के ज्यादा सिक्योर लग सकता है .

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उम्र और सही समय कितना मायने रखता है?

अगर आप रिटायरमेंट के करीब हैं तो बैंक लोन की अवधि कम कर देता है. अवधि कम होने से EMI बढ़ जाती है. EMI बढ़ते ही आपकी योग्यता घट जाती है जबकि सैलरी वही रहती है. इसलिए उम्र और लोन लेने का समय भी अहम होता है.

इसके अलावा बड़े शहर और छोटे शहर की सैलरी को बैंक अलग नजर से देखते हैं. एक ही कमाई किसी शहर में ठीक मानी जाती है और किसी दूसरे शहर में वह कम होती है. इस तरह आपके इनकम और खर्च का अंदाजा बैंक लोकेशन के हिसाब से लगाता है.

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इन बातों का रखें ध्यान

लोन लेने से पहले क्रेडिट कार्ड का बकाया चुका दें. छोटी छोटी EMI बंद कर दें जो आपकी एलिजिबिलिटी घटा रही हैं. जितनी जरूरत है उससे थोड़ा कम लोन के लिए आवेदन करें. NBFC से लोन जल्दी मिल सकता है लेकिन वहां ब्याज ज्यादा और नियम सख्त होते हैं.

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