40 दिन में 12 ट्रिलियन डॉलर स्‍वाहा! शांति वार्ता फेल होने के बाद कल निफ्टी, सेंसेक्स में आर या पार?

Iran Vs US-Israel War: युद्ध की शुरुआत से अब तक दुनिया भर के शेयर बाजारों ने भारी बिकवाली देखी है. कच्चे तेल की कीमतें $125 प्रति बैरल के करीब पहुंचने और सप्लाई चेन टूटने से हर बड़ा इंडेक्स धराशायी हुआ है.

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Global Share Market Crash amid Iran-US War: दुनियाभर के शेयर बाजारों में सोमवार को उथल-पुथल देखने केा मिल सकती है

Iran Vs US-Israel War 2026: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच गहराते युद्ध ने वैश्विक वित्तीय ढांचे को झकझोर कर रख दिया है. 28 फरवरी को शुरू हुई इस जंग को 40 दिन से ज्‍यादा हो गए हैं और इसने दुनियाभर के निवेशकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. अब, जबकि पाकिस्तान में आयोजित अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के विफल होने की खबर आ चुकी है, सोमवार 13 अप्रैल को भारतीय शेयर मार्केट समेत दुनियाभर के बाजारों पर एक और बड़े प्रहार की आशंका गहरा गई है.

इस भीषण युद्ध ने न केवल भौगोलिक सीमाओं को दहलाया है, बल्कि दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की नींव भी हिला दी है. 28 फरवरी से 10 अप्रैल तक के 40 दिनों में वैश्विक शेयर बाजारों ने बहुत बुरा दौर देखा है. विश्लेषक इसे 'ब्लैक स्प्रिंग' (Black Spring) कह रहे हैं. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई चेन टूटने के डर से भारत से लेकर न्यूयॉर्क और शंघाई तक के निवेशक सहमे हुए हैं.

बाजारों का 'डेथ स्पाइरल' 

युद्ध की शुरुआत से अब तक दुनिया भर के शेयर बाजारों ने भारी बिकवाली देखी है. कच्चे तेल की कीमतें $125 प्रति बैरल के करीब पहुंचने और सप्लाई चेन टूटने से हर बड़ा इंडेक्स धराशायी हुआ है. देखें चार्ट: 

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इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि यूरोप का यूरोनेक्स्ट (-14.3%) और ब्रिटेन का LSE (-12.1%) ऊर्जा संकट के कारण सबसे ज्यादा टूटे हैं, जबकि भारतीय शेयर बाजार की बात करें तो सेंसेक्स ने भी अपने रिकॉर्ड स्तर से करीब 9.5% की वैल्यू गंवाई है.

बाजारों का 'महापतन' 

फरवरी के अंत में जब युद्ध के पहले संकेत मिले थे, तब कुछ शेयर बाजार तो अपने उच्च स्तर के करीब थे, लेकिन 10 अप्रैल तक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि के दौरान वैश्विक स्तर पर बाजार पूंजीकरण (Market Cap) में लगभग 12 ट्रिलियन डॉलर की कमी आई है. 

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भारतीय बाजार की बात करें तो विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPIs) की भारी बिकवाली और कच्चे तेल के 120 डालर/बैरल पार करने के डर से सेंसेक्स (BSE) में भारी गिरावट आई. भारतीय निवेशकों ने इस अवधि में करीब 25 लाख करोड़ रुपये गंवा दिए हैं. चीन के  शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में भी वैश्विक व्यापार रुकने के डर से भारी उतार-चढ़ाव देखा गया.

अमेरिकी बाजार (NYSE) की बात करें तो युद्ध में सीधे तौर पर अमेरिका के शामिल होने की खबरों ने वॉल स्ट्रीट पर हड़कंप मचा दिया. कुछेक को छोड़कर बाकी सभी इंडेक्स लाल निशान में रहे. दूसरी ओर यूरोपीय और ब्रिटिश बाजार पर भी बड़ा असर देखा गया. ऊर्जा संकट के डर से लंदन स्टॉक एक्सचेंज और यूरोनेक्स्ट सबसे ज्यादा प्रभावित हुए क्योंकि यूरोप अपनी गैस और तेल जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है.

क्या सोमवार को फिर बड़ी गिरावट होगी? 

पाकिस्तान में हो रही शांति वार्ता का विफल होना बाजारों के लिए अंतिम उम्मीद टूटने जैसा है. जानकारों का मानना है कि सोमवार को बाजार खुलते ही 'पैनिक सेलिंग' (घबराहट में बिकवाली) देखी जा सकती है. आरपीएस ग्रुप (RPS Group) के डायरेक्टर अमन गुप्ता के अनुसार, वार्ता का विफल होना इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए अनिश्चितता की नई परत जोड़ता है.

गुप्ता कहते हैं, 'ईंधन, स्टील और लॉजिस्टिक्स जैसे इनपुट की कीमतें सीधे कच्चे तेल पर निर्भर हैं. ईपीसी (EPC) और सड़क परियोजनाओं के लिए खर्च बढ़ेगा, जिससे प्रॉफिट मार्जिन कम होगा. फिक्स्ड-प्राइस प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे ठेकेदारों के लिए यह दौर काफी मुश्किल होने वाला है, जिससे कार्यान्वयन में देरी होगी.' 

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बदलेगा निवेश का समीकरण

शांति वार्ता की विफलता के बाद अब लंबी खींचने वाली जंग की संभावना प्रबल हो गई है. गोयल गंगा डेवलपमेंट्स के डायरेक्टर अनुराग गोयल का मानना है कि अब मध्यम अवधि के जोखिम बढ़ गए हैं. गोयल कहते हैं, 'आने वाले समय में बोली लगाने वाले (Bidders) अपनी लागत में 'अस्थिरता जोखिम प्रीमियम' (Volatility Risk Premium) जोड़ेंगे, जिससे सभी प्रोजेक्ट्स महंगे हो जाएंगे. हालांकि, यह संकट भारत को नई सामग्रियों और स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की खरीद (Local Sourcing) के लिए प्रेरित करेगा.'

गोयल के अनुसार, रेल इंफ्रास्ट्रक्चर और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर भविष्य में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं क्योंकि ये तेल पर निर्भरता कम करते हैं. वे कहते हैं, 'नकारात्मक धारणा के बावजूद, भारत के बुनियादी ढांचा उद्योग की विकास यात्रा सरकार के मजबूत निवेश के दम पर बरकरार रहेगी.'

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निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सोमवार को सेंसेक्स में 2-3% की और गिरावट देखी जा सकती है. डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी भारतीय कॉर्पोरेट्स के विदेशी कर्ज को महंगा कर सकती है. इनपुट कॉस्ट वो फैक्‍टर है, जिसके चलते स्टील और सीमेंट कंपनियों के शेयर दबाव में रह सकते हैं. निवेशक सुरक्षित ठिकाने के तौर पर 'सोने' की ओर भाग सकते हैं. 27 फरवरी से शुरू हुआ यह गिरावट का सिलसिला 13 अप्रैल को एक नए निचले स्तर पर पहुंच सकता है. सोमवार को बाजार की चाल इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक शक्तियां अब किस दिशा में रुख करती हैं.

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