Middle East Crisis: कहां से कितना तेल मंगाता है भारत, होर्मुज ब्‍लॉक का कैसा असर और भारत के पास क्‍या है प्‍लान-B?

होर्मुज जलडमरूमध्य के संकट से तेल की कीमतें बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, लेकिन भारत के पास लगभग 9.5 दिन का तेल भंडार है और वैकल्पिक पाइपलाइन विकल्प मौजूद हैं.

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Hormuz Crisis के बीच भारत के पास तेल आयात के कौन-से विकल्‍प हैं?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है. ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद अब सबकी नजरें 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) पर टिकी हैं. यह छोटा सा समुद्री रास्ता भारत की रसोई से लेकर आपकी गाड़ी की रफ्तार तक को प्रभावित कर सकता है. हालांकि शीर्ष अधिकारियों ने आश्‍वस्‍त किया है कि भारतीयों के लिए टेंशन की बात नहीं है, कारण कि भारत के पास अभी कई दिनों का कच्‍चा तेल रिजर्व है. उम्‍मीद की जा रही है कि होर्मुज स्‍ट्रेट पर लगाया गया ब्‍लॉक अगले कुछ दिनों में हटा लिया जाएगा.

होर्मुज स्ट्रेट क्यों जरूरी है?

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच एक संकरा समुद्री मार्ग है. दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% इसी रास्ते से गुजरता है. भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे क्रूड ऑयल इंपोर्ट का लगभग 50% (जनवरी-फरवरी 2026 डेटा) इसी रास्ते से होकर आता है.

भारत कहां से कितना तेल मंगवाता है? 

भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई देशों पर निर्भर है, लेकिन हाल के महीनों में समीकरण बदले है. केप्‍लर डेटा के मुताबिक, भारत ने फरवरी में 11.5 लाख bpd रूसी तेल इंपोर्ट किया. यह जनवरी में 10.9 लाख bpd से ज्‍यादा है. इराक से इंपोर्ट 10.2 लाख bpd से घटकर 9,42,000 bpd हो गया. वहीं, सऊदी अरब का भारत को एक्सपोर्ट 7,74,000 bpd से बढ़कर 11.1 लाख bpd हो गया. जनवरी के 51.4 लाख bpd से बढ़कर फरवरी में कुल क्रूड इंपोर्ट 54.7 लाख bpd रहा, जो कि पिछले साल यानी फरवरी 2025 में 47.8 लाख bpd था.  

सप्लाई चेन पर संकट: क्या होंगे परिणाम?

अगर होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण आवाजाही रुकती है, तो भारत पर इसका चौतरफा असर पड़ सकता है.

  • 50% आयात पर खतरा: भारत का लगभग 26 लाख bpd तेल इसी रास्ते से आता है. रुकावट का मतलब है कि भारत आने वाले कुल तेल का आधा हिस्सा अधर में लटक सकता है.
  • लागत में वृद्धि: माल ढुलाई (Freight) और इंश्योरेंस का खर्च बढ़ेगा, जिससे भारत का 'इंपोर्ट बिल' बढ़ेगा और रुपये की वैल्यू पर दबाव आएगा.
  • महंगाई की मार: तेल की फिजिकल कमी होने से पहले ही 'जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम' के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें आसमान छूने लगेंगी.
  • रूस की बढ़ेगी भूमिका: मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने पर भारत को फिर से रूस की ओर रुख करना होगा, भले ही पश्चिमी देश इसके लिए भारत पर दबाव बनाएं.

भारत के पास 'प्लान-B' क्या है?

पूरी तरह से सप्लाई ठप न हो, इसके लिए भारत और उसके साझेदार कुछ वैकल्पिक रास्तों का उपयोग कर सकते हैं. जैसे कि सऊदी अरब की 'ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन' और यूएई की 'अबू धाबी क्रूड पाइपलाइन' होर्मुज को बायपास कर सीधे लाल सागर या फुजैरा तक तेल पहुंचा सकती हैं. हालांकि दूरी का जोखिम भी है. यदि भारत अमेरिका, अफ्रीका (नाइजीरिया) या लैटिन अमेरिका (ब्राजील) से तेल मंगाता है, तो लंबी दूरी के कारण तेल की लैंडेड कॉस्ट (पहुंच की लागत) बढ़ जाएगी.

समाचार एजेंसी PTI ने अधिकारियों के हवाले से बताया है कि भारत को निकट भविष्य में तेल आपूर्ति में किसी प्रकार की रुकावट का सामना करने की संभावना नहीं है. देश के आपातकालीन तेल भंडार लगभग 9.5 दिनों तक चल सकते हैं. इसके अलावा, तेल कंपनियों के पास जो कच्चा तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का स्टॉक है, वह लगभग 67 दिनों तक चल सकता है. NDTV को दिए एक इंटरव्यू में तेल विशेषज्ञ और योजना आयोग के पूर्व सदस्य किरित पारिख ने कहा कि अगर अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध लंबे समय तक चलता है तो तेल की कीमतें बढ़ेंगी. ऐसी स्थिति में भारत को रूस से ज्यादा तेल खरीदना चाहिए, जिससे कीमतों का दबाव कम किया जा सके.

उन्होंने आगे कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में 1 डॉलर प्रति बैरल का इजाफा होता है तो इससे भारत के तेल आयात की लागत 1.4 बिलियन डॉलर बढ़ सकती है. साथ में गैस की कीमतें भी बढ़ेंगी क्योंकि भारत अपनी गैस जरूरतों का लगभग 50% हिस्सा विदेशों से खरीदता है.

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फरवरी की शुरुआत में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्यसभा को बताया था कि भारत का पेट्रोलियम भंडार किसी भी वैश्विक उथल-पुथल से पैदा हुई मांग को पूरा करने के लिए 74 दिनों तक चल सकता है. यानी भारत इस तरह की किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है.

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