- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल-डीजल बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम की अपील की है
- होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण भारत को कच्चे तेल की सप्लाई में बाधा आ रही है
- भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत विदेशों से आयात करता है
कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया ने दफ्तरों की बजाय घर से ही काम यानी 'वर्क फ्रॉम होम' शुरू किया था, तब ये उस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत थी. कोविड खत्म होने के बाद फिर से दफ्तरों से ही काम होने लगा. लेकिन अब एक बार फिर से वर्क फ्रॉम होम की जरूरत आ गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्क फ्रॉम होम की अपील की है. इसके बाद ज्यादातर बीजेपी शासित राज्यों में सरकारी दफ्तरों में हफ्ते में कम से कम दो दिन वर्क फ्रॉम होम लागू कर दिया गया है. सरकारों ने निजी कंपनियों से भी वर्क फ्रॉम होम करवाने की अपील की है.
वर्क फ्रॉम करवाने के पीछे एक गणित है पेट्रोल-डीजल को बचाना. लोग घर से काम करेंगे तो दफ्तर आने-जाने में खर्च होने वाला पेट्रोल-डीजल बचेगा. ये सारी कवायद इसलिए की जा रही है, क्योंकि पश्चिम एशिया का संकट गहराता जा रहा है. अमेरिका और ईरान की जंग खत्म होने के आसार दिख नहीं रहे हैं. होर्मुज स्ट्रेट भी तीन महीने से लगभग बंद पड़ा है और कच्चे तेल की सप्लाई पर असर पड़ा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दिन देशवासियों से वर्क फ्रॉम होम करने और पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील की थी, उस दिन उन्होंने कहा भी था कि 'हमारे पास तेल के कुएं नहीं हैं...' पेट्रोल-डीजल बचाने के लिए पीएम मोदी ने भी अपना काफिला छोटा कर दिया है. उनके अलावा कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों और विधायकों ने भी काफिला छोटा कर दिया है. दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश तक में दो दिन वर्क फ्रॉम होम के आदेश जारी कर दिए गए हैं.
लेकिन इसकी जरूरत क्यों? क्योंकि
- होर्मुज बंद पड़ा है: इतिहास में पहली बार होर्मुज स्ट्रेट बंद है. अब तक कुछ ही जहाज वहां से निकल पाए हैं. 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद से ईरान ने इसे बंद कर दिया है. यहीं से दुनिया के 20% कच्चे तेल की सप्लाई होती है.
- भारत आयात पर निर्भर: भारत कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर है. भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. पश्चिम एशिया का संकट शुरू होने से पहले भारत की जरूरत का 55% कच्चा तेल होर्मुज स्ट्रेट से ही आता था.
- सप्लाई पर पड़ रहा असर: केंद्र सरकार के मुताबिक, अब 70% कच्चा तेल दूसरे रास्तों से आता है. लेकिन इससे सप्लाई पर असर पड़ा है. जनवरी में भारत ने 2.10 करोड़ मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात किया था. मार्च में यह लगभग 10% घटकर 1.90 करोड़ मीट्रिक टन हो गया.
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वर्क फ्रॉम होम से बचेगा पेट्रोल-डीजल?
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के मुताबिक, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच भारत में 425.86 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल और 947.04 लाख मीट्रिक टन डीजल की खपत हुई. अगर इसे लीटर में कन्वर्ट किया जाए तो सालभर में 124 अरब लीटर डीजल और 62 अरब लीटर पेट्रोल की खपत हुई.
यानी, भारत में रोजाना औसतन 34 करोड़ लीटर डीजल और 17 करोड़ लीटर पेट्रोल की खपत होती है.
कोविड के दौरान जब वर्क फ्रॉम होम शुरू हुआ था तो लाखों लोगों ने दफ्तर जाना बंद कर दिया था. इसका असर पेट्रोल-डीजल की खपत पर पड़ा था. कोविड के कारण मार्च 2020 से ही कई कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम कर दिया था. इसके बाद अप्रैल में तो सख्त लॉकडाउन रहा था और मई में कमर्शियल एक्टिविटी शुरू हो गई थी. इस लॉकडाउन का असर पेट्रोल-डीजल की खपत पर दिखा था.
PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी 2020 में 25.11 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल और 71.62 लाख मीट्रिक टन डीजल की खपत हुई थी. मार्च 2020 में पेट्रोल की 21.56 मीट्रिक टन और डीजल की 56.60 लाख मीट्रिक टन खपत हुई थी. फरवरी की तुलना में मार्च के महीने में पेट्रोल की खपत 14% और डीजल की 20% तक कम हो गई थी.
इसके बाद अप्रैल में तो कम्प्लीट लॉकडाउन रहा था. इससे खपत आधी हो गई थी. अप्रैल 2020 में पेट्रोल की 9.73 लाख मीट्रिक टन और डीजल की 32.52 लाख मीट्रिक टन खपत ही हुई थी. इस हिसाब से फरवरी की तुलना में अप्रैल में पेट्रोल की 61% और डीजल की खपत में 54% से ज्यादा की कमी आई थी.
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पैसा बचा था या नहीं?
अभी पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल कम करने के लिए इसलिए कहा जा रहा है, ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके. 2025-26 में भारत ने 10.89 लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल खरीदा था.
कोविड के समय जब वर्क फ्रॉम होम था तो कच्चे तेल का आयात भी काफी गिर गया था. PPAC के मुताबिक, फरवरी 2020 में भारत ने 55,633 करोड़ रुपये का कच्चा तेल खरीदा था. मार्च में यह घटकर 42,917 करोड़ रुपये पर आ गया. अप्रैल में 23,098 करोड़ रुपये का कच्चा तेल खरीदा था. मई में तो सिर्फ 17,134 करोड़ रुपये का ही कच्चा तेल आयात किया था.
इस हिसाब से फरवरी की तुलना में मार्च में 23%, अप्रैल में 59% और मई में 69% से ज्यादा की गिरावट आई थी.
अगर डॉलर की बचत की बात करें तो फरवरी 2020 में 7.72 अरब डॉलर कच्चे तेल के आयात पर खर्च हुए थे. मार्च में 5.79 अरब डॉलर, अप्रैल में 3.04 अरब डॉलर और मई में सिर्फ 2.26 अरब डॉलर ही खर्च हुए थे. इस हिसाब से अगर फरवरी जितना ही आयात मार्च, अप्रैल और मई में भी हुआ होता तो 12 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च होता. यानी, आयात में गिरावट से तीन महीनों में 12 अरब डॉलर की बचत हुई थी.
लेकिन अब हालात कोविड जैसे नहीं हैं. उस वक्त वर्क फ्रॉम होम अनिवार्य था. कोविड के कारण आर्थिक गतिविधियां सीमित थीं. अब ऐसा नहीं है. फिर भी, अगर बहुत से लोग वर्क फ्रॉम होम करना शुरू कर दें तो रोजाना की यात्रा में कमी आने से पेट्रोल-डीजल की मांग में काफी गिरावट आ सकती है.
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