Middle East War: तेल-गैस ही नहीं, ईरान-इजरायल-अमेरिका जंग की आंच हमारी-आपकी थाली तक भी पहुंच सकती है!

ईरान-इजरायल युद्ध के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाला 33% उर्वरक व्यापार ठप हो गया है.खाद और उर्वरक की कमी के चलते अगर उत्पादन कम हुआ तो इसका सीधा मतलब है बाजार में अनाज की कमी और कीमतों में भारी उछाल. मकई की कमी से पोल्ट्री और डेयरी उद्योग पर भी असर पड़ेगा.

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Middle East War Impact on Food: मिडिल ईस्‍ट की जंग, आपकी और हमारी थाली पर सबसे बड़ा खतरा

मध्य पूर्व (Middle East) में धधकती जंग की आग अब केवल पेट्रोल पंपों या शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहने वाली है. दुनिया भर के कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान-इजरायल युद्ध लंबा खिंचा, तो इसका सबसे भयावह असर हमारी 'थाली' पर पड़ेगा. यह खतरा कच्चे तेल की कीमतों से भी बड़ा है क्योंकि यह सीधे तौर पर वैश्विक खाद्य सुरक्षा (Food Security) से जुड़ा है. और इस संकट का केंद्र है 'खाद' (Fertilizer). अगर दुनिया के किसानों को समय पर खाद नहीं मिली, तो साल 2026 की सर्दियों तक वैश्विक अनाज भंडार खाली हो सकते हैं.

दुनिया की 'फूड लाइफलाइन' पर ताला

दुनिया के कुल उर्वरक व्यापार का लगभग एक-तिहाई (33%) हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है. युद्ध के कारण इस समुद्री रास्ते की नाकेबंदी ने वैश्विक सप्लाई चैन को पूरी तरह तोड़ दिया है.

खाड़ी देश (कतर, सऊदी अरब, ईरान और UAE) दुनिया के 34% यूरिया और 23% अमोनिया के निर्यात के लिए जिम्मेदार हैं. जंग के चलते इन देशों के प्‍लांट्स से शिपिंग लगभग बंद हो गई है. नाइट्रोजन आधारित उर्वरक बनाने के लिए नैचुरल गैस (LNG) मुख्य कच्चा माल है. युद्ध के कारण गैस की कीमतें 30% से ज्‍यादा तक उछल गई हैं, जिससे खाद बनाना न केवल मुश्किल बल्कि बेहद महंगा हो गया है.

गेहूं और मक्‍के पर मंडराया बड़ा संकट

गेहूं और मकई (Wheat and Corn) दुनिया की दो ऐसी प्रमुख फसलें हैं, जो खाद पर ज्यादा निर्भर हैं. अमेरिका के न्यू ऑरलियन्स जैसे बड़े हब में खाद की कीमतें कुछ ही दिनों में 516 डॉलर से बढ़कर 800 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गई हैं. आयोवा (Iowa) के किसान अब मकई की खेती कम कर सोयाबीन की ओर रुख कर रहे हैं क्योंकि मकई में नाइट्रोजन खाद की खपत बहुत ज्यादा होती है. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गेहूं की कीमतें पिछले दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं. पाम ऑयल की कीमतों में भी 10% तक का उछाल देखा गया है.

भारत और पड़ोसी देशों पर असर

भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है. हालांकि सरकार के पास बफर स्टॉक होता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 35-40% की वृद्धि भारत के सब्सिडी बिल को बेतहाशा बढ़ा देगी. कतर से एलएनजी की सप्लाई रुकने के कारण कई उर्वरक संयंत्रों ने उत्पादन कम कर दिया है. पाकिस्तान में तो हाल और बुरा है, जहां एग्रिटेक जैसी कंपनियों ने गैस सप्लाई बंद होने की सूचना दी है.

भंडारण की भी समस्‍या 

महाराष्ट्र जैसे राज्यों में फलों के भंडारण की समस्या शुरू हो गई है. गैस की कमी और बिजली की महंगी दरों के कारण कोल्ड स्टोरेज चलाना मुश्किल हो रहा है, जिससे अंगूर, अनार और आम जैसे फलों के खराब होने का डर बढ़ गया है.

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दूसरे देशों में महंगी हुई खाद 

पिछले कुछ दिनों में ही मिस्र और उत्तरी अफ्रीका में यूरिया की कीमतें 60-80 डॉलर प्रति टन बढ़ गई हैं. पोलैंड की सरकारी कंपनी 'ग्रुपा अज़ोती' (Grupa Azoty) ने खाद के ऑर्डर लेना अस्थायी रूप से बंद कर दिया है क्योंकि गैस की बढ़ी कीमतों ने उत्पादन लागत को आसमान पर पहुंचा दिया है. भारत में फिलहाल कीमतों पर उस तरह का प्रभाव नहीं पड़ा है, लेकिन युद्ध जारी रहे तो दिक्‍कतें बढ़ सकती हैं. 

थाली पर कैसे पड़ेगा असर?

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जब खाद महंगी होती है या उपलब्ध नहीं होती, तो किसान उसकी मात्रा कम कर देते हैं. इससे फसल की पैदावार (Yield) गिर जाती है. अगर यूरिया और डीएपी (DAP) की सप्लाई बाधित हुई, तो गेहूं और मकई का उत्पादन 20-30% तक गिर सकता है. 

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उत्पादन कम होने का सीधा मतलब है बाजार में अनाज की कमी और कीमतों में भारी उछाल. मकई की कमी से पोल्ट्री और डेयरी उद्योग पर भी असर पड़ेगा, जिससे दूध, अंडे और चिकन की कीमतें बढ़ेंगी.

लीड्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टिम बेंटन कहते हैं, 'दुनिया में पहले से ही कई समस्याएं हैं, और यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है तो यह एक मानवीय संकट (Humanitarian Crisis) पैदा कर देगा.' फिलहाल अनाज के वैश्विक भंडार भरे हुए हैं, इसलिए तुरंत ब्रेड या आटे की कमी नहीं होगी, लेकिन अगर बुवाई का सीजन बिना खाद के निकल गया, तो आगे के लिए दिक्‍कत हो सकती है. 

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Sources: NDTV Research, PTI, Bloomberg, Reuters

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