₹10-₹20 वाले साबुन-शैंपू और बिस्किट के पैकेट क्यों हो रहे छोटे? Dabur CEO का खुलासा, चुपके से कंपनियां कर रही हैं ये बड़ा खेल!

FMCG कंपनियों का मानना है कि छोटे कस्बों और गली-मोहल्लों की दुकानों पर ग्राहक ₹10 या ₹20 के मैजिक प्राइस पॉइंट को छोड़कर महंगा सामान नहीं खरीदना चाहते. इसीलिए, ग्राहकों को नाराज किए बिना मुनाफे को बचाए रखने के लिए पैकेट का साइज छोटा किया जा रहा है.

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Shrinkflation का असर, ₹10 और ₹20 पैक में अब पहले जितना सामान नहीं, जानिए कंपनियां ऐसा क्यों कर रहीं.

अगर आपको भी लग रहा है कि पहले मिलने वाला ₹10 या ₹20 का बिस्किट, नमकीन, साबुन या शैंपू का पैकेट अब छोटा हो गया है, तो आपका अंदाजा बिल्कुल सही है. देश की बड़ी एफएमसीजी कंपनियां अब महंगाई से निपटने के लिए एक खास तरीका अपना रही हैं, जिसे ‘श्रिंकफ्लेशन' कहा जाता है.

कीमत वही, सामान कम! चुपके से छोटे हो रहे बिस्किट-नमकीन के पैकेट

FMCG कंपनियां सीधे तौर पर प्रोडक्ट की कीमत नहीं बढ़ा रहीं. इसके बजाय उतने ही पैसों में मिलने वाले सामान का वजन यानी ग्राम कम किया जा रहा है. यानी ग्राहक ₹10 तो पहले जितना ही दे रहा है, लेकिन अब उसे सामान कम मिल रहा है.

डाबर CEO ने ने खुद बताई वजह

डाबर इंडिया (Dabur India) के सीईओ मोहित मल्होत्रा ने कंपनी की तिमाही बैठक में कहा कि ₹10 और ₹20 वाले पैकेट में कंपनियां वजन कम कर रही हैं क्योंकि वे इन मैजिक प्राइस पॉइंट्स को पार नहीं करना चाहतीं. उनके मुताबिक छोटे शहरों, कस्बों और मोहल्लों की दुकानों पर ग्राहक ₹10 या ₹20 से ज्यादा कीमत वाले छोटे पैकेट खरीदने से बचते हैं. ऐसे में कंपनियां ग्राहकों को नाराज किए बिना मुनाफा बचाने के लिए पैकेट का साइज छोटा कर रही हैं.

आखिर कंपनियों पर दबाव क्यों बढ़ा? 

कंपनियों का कहना है कि कच्चे तेल से जुड़े पैकेजिंग खर्च और कच्चे माल की लागत तेजी से बढ़ी है. पश्चिम एशिया तनाव और महंगे कच्चे तेल का असर अब रोजमर्रा के सामान पर भी दिखने लगा है. डाबर के मुताबिक, कंपनी के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा पैकेजिंग पर जाता है और अब इन लागतों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. कंपनी ने कई प्रोडक्ट्स में करीब 4% तक कीमतें भी बढ़ाई हैं.

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क्या है ‘श्रिंकफ्लेशन'?

‘श्रिंकफ्लेशन' का मतलब है कीमत वही रखना लेकिन प्रोडक्ट की मात्रा कम कर देना. उदाहरण के तौर पर पहले जो बिस्किट पैकेट 100 ग्राम का मिलता था, अब वही 90 या 85 ग्राम का हो सकता है, जबकि कीमत ₹10 ही रहती है.यह तरीका कंपनियों के लिए इसलिए आसान माना जाता है क्योंकि ग्राहक कीमत बढ़ने पर जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन मात्रा में छोटे बदलाव अक्सर तुरंत नोटिस नहीं कर पाते.

₹10 और ₹20 का ‘साइकोलॉजी गेम'

एफएमसीजी कंपनियों के लिए ₹10 और ₹20 के पैक बेहद अहम माने जाते हैं. यही छोटे पैकेट गांवों और छोटे शहरों में सबसे ज्यादा बिकते हैं. कंपनियों का मानना है कि अगर इनकी कीमत बढ़ाई गई तो बिक्री पर बड़ा असर पड़ सकता है.इसी वजह से कंपनियां ‘कीमत वही, सामान कम' वाला फॉर्मूला अपना रही हैं.

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आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है असर

डाबर के मुताबिक, कई प्रोडक्ट कैटेगरी में महंगाई करीब 10% तक पहुंच चुकी है. अगर कच्चे तेल और पैकेजिंग लागत में तेजी बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में और ज्यादा प्रोडक्ट्स के पैकेट छोटे हो सकते हैं या कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

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