- अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेजी आई है.
- अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते के लिए पंद्रह दिनों का अल्टीमेटम दिया है.
- ईरान और रूस की समुद्री युद्ध अभ्यास योजना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल की सप्लाई बाधित कर सकती है.
दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों (Crude prices jump) में अचानक तेजी देखने को मिल रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है. शुक्रवार को तेल के दामों में बढ़त दर्ज की गई क्योंकि दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति बनती दिख रही है. अमेरिका ने साफ कर दिया है कि अगर ईरान अगले कुछ दिनों में परमाणु समझौते पर राजी नहीं हुआ, तो उसे इसका भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
इससे बाजार को डर है कि अगर इन दोनों देशों में टकराव बढ़ा, तो दुनिया भर में तेल की सप्लाई रुक सकती है, जिससे कीमतें और ज्यादा भागेंगी.
ट्रंप की चेतावनी से मची खलबली,दुनिया भर में क्यों बढ़ रहे हैं तेल के दाम?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने क्रूड ऑयल मार्केट में हलचल पैदा कर दी है. ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान न्यूक्लियर एक्टिविटी को लेकर किसी समझौते पर नहीं पहुंचता है, तो बहुत बुरा हो सकता है. ट्रंप ने ईरान को फैसले के लिए सिर्फ 10 से 15 दिनों का समय दिया है.
इस कड़े रुख के बाद मार्केट में घबराहट बढ़ गई है. जहां ब्रेंट क्रूड (Brent Crude Rate) 21 सेंट बढ़कर 71.87 डॉलर पर पहुंच गया, वहीं अमेरिकी क्रूड भी 23 सेंट की बढ़त के साथ 66.66 डॉलर पर ट्रेड कर रहा है.
समुद्र के रास्ते सप्लाई रुकने का खतरा, तेल के दाम 6 महीने के हाई पर
ईरान ने रूस के साथ मिलकर समुद्र में युद्ध अभ्यास (Naval Exercise) करने की योजना बनाई है, जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं. जिस समुद्री रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है, वहां ईरान का दबदबा है. अगर वहां कोई संघर्ष होता है या ईरान उस रास्ते को बंद करता है, तो दुनिया भर के देशों के लिए तेल मिलना मुश्किल हो जाएगा.
बाजार के जानकारों का कहना है कि सप्लाई कम होने के डर से ही कच्चे तेल के दाम 6 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं.
तेल के स्टॉक में कमी और सऊदी अरब का फैसला
एक तरफ युद्ध का खतरा है, तो दूसरी तरफ दुनिया के बड़े देशों में तेल का स्टॉक भी कम हो रहा है. अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार में 90 लाख बैरल की बड़ी कमी आई है क्योंकि वहां रिफाइनिंग का काम तेज हो गया है. इसके अलावा, दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देश सऊदी अरब ने भी अपने एक्सपोर्ट में कटौती की है. सऊदी अरब से होने वाली तेल की सप्लाई दिसंबर में गिरकर काफी निचले स्तर पर आ गई थी. जब बाजार में माल कम होता है और मांग बनी रहती है, तो कीमतें बढ़ना लाजिमी है.
क्या बढ़ेंगे पेट्रोल और डीजल के दाम ?
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ता है जो बाहर से तेल खरीदते हैं. अगर इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड महंगा होता रहा, तो आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं. वहीं दूसरी तरफ जापान जैसे देशों में महंगाई की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ी है, जिससे वहां ब्याज दरें कम रह सकती हैं. कम ब्याज दरें आमतौर पर तेल की कीमतों को और सहारा देती हैं क्योंकि इससे मार्केट में कैश बढ़ता है. अभी पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी हैं.














