युद्धविराम का चौथा दिन, कच्‍चा तेल कितना सस्‍ता हुआ, भारत को अब भी महंगा क्‍यों पड़ रहा क्रूड ऑयल? 

Crude Oil Prices: युद्ध शुरू होने से पहले कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत 69.01 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी. वहीं मौजूदा कीमत फरवरी, 2026 की औसत कीमत के मुकाबले 9 अप्रैल, 2026 को 51.27 डॉलर प्रति बैरल महंगा हुआ, यानि 74.29% की बड़ी बढ़ोतरी.

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Crude Oil Price Drop: युद्धविराम के बाद कितना सस्‍ता हुआ कच्‍चा तेल?

Crude Oil Prices Fall: ईरान और अमेरिका के बीच हुए युद्धविराम हुए आज चौथा दिन है और इस दौरान कच्‍चे तेल की कीमतों काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है. पहले दिन जहां अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर कच्‍चे तेल की कीमतें 14 फीसदी से ज्‍यादा गिर गई थीं, वहीं सीजफायर के बावजूद कई इलाकों में हमले जारी रहने और होर्मूज स्‍ट्रेट पूरी तरह नहीं खुलने के चलते कीमतें थोड़ी बढ़ी हुई हैं. अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में शुक्रवार को मई डिलीवरी वाला WTI क्रूड ऑयल 96.57 डॉलर/बैरल के भाव चल रहा था. दिन के कारोबार के दौरान इसने 100.40 का हाई छुआ, जबकि एक समय 95.53 के भाव पर भी ट्रेड करता दिखा था. 

वहीं जून डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 95.20 डॉलर/बैरल के भाव पर चल रहा है. इसने दिन के कारोबार के दौरान 98.26 डॉलर/बैरल का हाई छुआ था, जबकि एक समय ये 94.20 डॉलर/बैरल के निचले स्‍तर पर पहुंच गया था. सीजफायर के ऐलान से देखा जाए तो कच्‍चे तेल की कीमतें 14 से 15 फीसदी तक गिर चुकी हैं. हालांकि पहले ही दिन करीब 13 फीसदी से ज्‍यादा गिरावट देखी गई थीं. सीजफायर के बावजूद छिटपुट हमले जारी रहने के चलते बीच में तेल की कीमतों में फिर से उछाल देखा गया था. 

भारत को अब भी महंगा क्‍यों पड़ रहा कच्‍चा तेल?

पेट्रोलियम मंत्रालय की PPAC की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक मध्यपूर्व एशिया में जारी अनिश्चितता की वजह से 9 अप्रैल, 2026 को कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत 120.28 डॉलर/बैरल के ऊंचे स्तर पर बनी रही. वहीं 10 अप्रैल को ये आंकड़ा 124.64 डॉलर/बैरल के करीब रहा. 

दरअसल कच्‍चे तेल की खरीद वायदा बाजार में होती है. यानी अभी जो कच्‍चा तेल भारत पहुंच रहा है, उसकी खरीद काफी पहले हो चुकी है. तब कच्‍चे तेल की कीमतें ज्‍यादा थीं, जबकि आज जो कीमतें दिख रही हैं, वे मई और जून डिलीवरी वाले कच्‍चे तेल की है. इसलिए फिलहाल जो कच्‍चा तेल भारत पहुंच रहा है, वो महंगा साबित हो रहा है.  

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सरकारी आकड़ों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से पहले फरवरी, 2026 में कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत 69.01 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी. यानी, मध्यपूर्व युद्ध एशिया में जारी अनिश्चितता की वजह से कच्चा तेल फरवरी, 2026 की औसत कीमत के मुकाबले 9 अप्रैल, 2026 को 51.27 डॉलर प्रति बैरल महंगा हुआ, यानि 74.29% की बड़ी बढ़ोतरी. मार्च, 2026 महीने के दौरान भी कच्चे तेल की औसत कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रही थी. भारत अपनी जरुरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल के और महंगा होने से तेल आयात का खर्च बढ़ता जा रहा है.

होर्मुज में अभी भी फंसे हैं जहाज 

दो हफ्ते के युद्धविराम के ऐलान और पाकिस्तान में ईरान-अमेरिका प्रस्तावित वार्ता के बावजूद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर 800 से ज्यादा कार्गो जहाज अब भी फंसे हुए हैं. सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण इस समुद्री मार्गे से ऑयल कार्गो जहाजों की आवाजाही बाधित होने से अंतराष्ट्रीय एनर्जी मार्किट में करीब 20% कच्चे तेल की सप्लाई बाधित हो रही है, जिस वजह से उनकी कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. शिपिंग मंत्रालय के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फंसे भारतीय-ध्वज वाले 16 जहाजों में 5 बड़े क्रूड ऑयल टैंकर्स और एक LPG टैंकर शामिल हैं.

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सरकार का हस्‍तक्षेप 

सरकारी तेल कंपनियों पर तेल आयात के बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने के लिए भारत सरकार ने 27 मार्च, 2026 को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटाने का फैसला किया था. सरकार ने इस आसमान छूती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के समय तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को कम करने के लिए टैक्‍सेशन रेवेन्‍यू छोड़ने का फैसला किया था. लेकिन कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की औसत कीमत में इस बड़ी बढ़ोतरी से भारत सरकार को फिर हस्तक्षेप करना पड़ सकता है. 

केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को घटा दिया है, हालांकि राज्यों ने VAT/Sales Tax में कोई कमी नहीं की है. ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने इस महीने की शुरुआत में राज्य सरकारों से एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) पर VAT कम करने की अपील की थी, हालांकि इस दिशा में भी अब तक कोई पहल नहीं की गई. PPAC की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों की पेट्रोलियम, ऑयल और लुब्रिकेंट्स प्रोडक्ट्स पर Sales Tax/VAT से कुल कलेक्शन 3.02 लाख करोड़ रुपये था, जबकि 2025-26 के पहले 6 महीने (FY2026, H1) में ये आंकड़ा 1.47 लाख करोड़ रुपये था.

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