Budget 2026 Key Questions for Finance Minister: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी, रविवार को देश का बजट पेश कर रही होंगी तो उनके बजट भाषण के दौरान देश के करोड़ों लोगों की आंखें उन पर होंगी. हर वर्ग की अलग-अलग उम्मीदें हैं, लोगों के मन में कई सवाल हैं, जिनके जवाब वे बजट भाषण में ढूंढने की उम्मीद करेंगे. कारण कि बजट सिर्फ 'आंकड़ों की पोथी' नहीं होता, बल्कि आने वाले वर्ष के लिए देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का मैनिफेस्टो भी होता है. इस बार जब वित्त मंत्री संसद में बजट ब्रीफकेस लेकर खड़ी होंगी, तो सवाल सिर्फ ये नहीं होगा कि टैक्स में कितनी राहत मिली, क्या सस्ता और क्या महंगा हुआ... बल्कि ये भी होगा कि टैरिफ टेरर, जहरीली हवा, AI की मार, कमोडिटी कीमतों और कमजोर पड़ते रुपये जैसे मोर्चों पर सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती है. आम आदमी से लेकर कारोबारी, युवा से लेकर पेंशनभोगी तक, सबके दिमाग में कुछ बुनियादी सवाल तैर रहे हैं, जिनके जवाब की उम्मीद वित्त मंत्री के बजट भाषण से होगी.
1. टैरिफ टेरर के साये में फंसे निर्यातकों को क्या राहत?
पिछले कुछ सालों में कस्टम ड्यूटी और टैरिफ स्ट्रक्चर में बार-बार बदलाव ने कई सेक्टर्स के निर्यातकों के लिए अनिश्चितता बढ़ा दी है. व्यापारी संगठनों की शिकायत है कि ऊंचे या जटिल टैरिफ से 'मेक इन इंडिया' की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कभी-कभी खुद ही कट जाती है और ग्लोबल वैल्यू चेन में भारतीय प्रोडक्ट महंगे पड़ जाते हैं. बजट से सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या सरकार कुछ चुनिंदा सेक्टर्स-जैसे टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स या केमिकल्स-के लिए टैरिफ को स्थिर और सरल बनाने का रोडमैप देगी, ताकि निर्यातकों को लंबी अवधि की स्पष्टता और राहत दोनों मिल सके.
2. प्रदूषण और 'क्लीन सिटीज': क्या EVs को नई राहत मिलेगी?
दिल्ली-NCR से लेकर कई बड़े शहरों में स्मॉग और AQI इस साल सबसे बड़ा पब्लिक हेल्थ इश्यू बनकर सामने आया. अदालतों से लेकर आम लोगों तक एक ही मांग रही कि सिर्फ एड-हॉक बंदिशों से नहीं, स्ट्रक्चरल फंडिंग और पॉलिसी से समाधान निकले. बजट भाषण में नजरें इस पर होंगी कि क्या सरकार क्लीन एयर प्रोग्राम, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, EV चार्जिंग, ग्रीन बिल्डिंग और वेस्ट मैनेजमेंट के लिए अलग से बड़ा फंड या 'क्लीन सिटीज मिशन 2.0' जैसी किसी पहल की घोषणा करती है या नहीं. अगर म्युनिसिपल बॉन्ड, ग्रीन बॉन्ड या सिटी-लेवल इंसेंटिव्स का जिक्र आता है, तो ये संकेत होगा कि सरकार प्रदूषण को सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि फिस्कल प्रायोरिटी मान रही है.
कई शहरों में पुराने डीजल-पेट्रोल वाहनों पर पाबंदियां बढ़ रही हैं और ऑटो इंडस्ट्री ट्रांजिशन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. EV निर्माताओं की मांग है कि GST, बैटरी कॉस्ट, चार्जिंग इन्फ्रा और फाइनेंसिंग पर और सपोर्ट दिया जाए, ताकि EV मास-मार्केट में सस्ती और सुलभ हो सके. बजट से बड़ा सवाल यह होगा कि क्या EV इकोसिस्टम के लिए नई PLI स्कीम, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव, या और लंबी समयसीमा वाले टैक्स बेनिफिट्स घोषित किए जाते हैं, और क्या ट्रांजिशन के बीच फ्यूल-आधारित ऑटो सेक्टर के लिए भी कोई 'जस्ट ट्रांजिशन' पैकेज या री-स्किलिंग सपोर्ट दिखता है.
4. AI से नौकरी संकट: क्या कोई साफ पॉलिसी फ्रेमवर्क आएगा?
इस संबंध में हमने Intelligenz IT के को-फाउंडर और ऑथर प्रभात सिन्हा से बात की. उनके मुताबिक, जनरेटिव AI और ऑटोमेशन ने IT, सर्विसेज और यहां तक कि मीडिया-फाइनेंस जैसी व्हाइट-कॉलर जॉब्स पर दबाव की बहस तेज कर दी है. जैसे कभी क्रिप्टो पर पॉलिसी क्लैरिटी की मांग थी, वैसे ही अब AI पर रेगुलेशन, डाटा प्रोटेक्शन, रिस्क मैनेजमेंट और रिस्किलिंग के लिए राष्ट्रीय ढांचे की जरूरत महसूस की जा रही है. बजट के दौरान हर युवा और नॉलेज-वर्कर यह सुनना चाहेगा कि क्या सरकार AI-स्पेसिफिक स्किल मिशन, स्टार्टअप इंसेंटिव, और वर्कफोर्स प्रोटेक्शन (जैसे ट्रांजिशन फंड या स्किल टैक्स क्रेडिट) की दिशा में कोई ठोस घोषणा करेगी, या फिर इसे अभी सिर्फ 'भविष्य की बहस' पर छोड़ दिया जाएगा.
5. सोना-चांदी की उथल-पुथल के बीच क्या सरकार बदलेगी रणनीति?
सोना-चांदी की रिकॉर्ड रैली और फिर रिकॉर्ड गिरावट ने घरेलू निवेशकों के पोर्टफोलियो और ट्रेडिंग सेंटिमेंट दोनों को बुरी तरह झुलसा दिया है. बावजूद इसके कीमतें ज्यादा बनी हुई है. केडिया एडवायजरी के मुताबिक, गोल्ड बॉन्ड स्कीम का मकसद फिजिकल गोल्ड की मांग कम करना था, लेकिन हाल की कीमतों और लिक्विडिटी की परेशानियों के बीच आम निवेशक का भरोसा डगमगाया है. बड़ा सवाल यह है कि क्या बजट गोल्ड पर इम्पोर्ट ड्यूटी, कैपिटल गेन टैक्स ट्रीटमेंट या गोल्ड बॉन्ड्स के स्ट्रक्चर में कोई बदलाव सुझाएगा ताकि सोना-चांदी के बाजार में सट्टा कम हो और छोटी बचत वालों की सुरक्षा बढ़े. अगर सरकार चांदी या प्लेटिनम जैसे मेटल्स के लिए भी कोई नई बचत उत्पाद लाती है, तो यह गेमचेंजर कदम माना जाएगा.
6. डॉलर, 100 रुपये के करीब : क्या बजट दे पाएगा ताकत?
डॉलर के मुकाबले रुपये की लगातार कमजोरी ने इम्पोर्ट बिल, महंगाई और विदेशी निवेशकों की धारणा पर सीधा असर डाला है. 100 रुपये के स्तर के आस-पास घूमते रुपये को संभालने की जिम्मेदारी सिर्फ RBI की नहीं, फिस्कल पॉलिसी की भी बनती है. पॉलिसी एक्सपर्ट अविनाश चंद्र ने कहा, 'बजट में बाजार इस बात के संकेत ढूंढेगा कि क्या सरकार करंट अकाउंट बैलेंस, FDI-FPI फ्लो, और बुनियादी ग्रोथ ड्राइवरों को मजबूत करने के लिए कोई ऐसी घोषणाएं करती है जो रुपये को स्ट्रक्चरल सपोर्ट दें.' उन्होंने कहा कि बड़े इंफ्रा, एक्सपोर्ट प्रमोशन और मैन्युफैक्चरिंग निवेश का विश्वसनीय रोडमैप अगर दिखा, तो यह रुपये के लिए 'डायरेक्ट रिलीफ पैकेज' न सही, पर मजबूत भरोसे का इंजेक्शन जरूर साबित हो सकता है.














