- आम आदमी को बजट 2026 से महंगाई में राहत और रोजगार के ठोस मौके की उम्मीद.
- स्वास्थ्य, शिक्षा, गांवों और छोटे कारोबार पर ज्यादा निवेश की मांग तेज.
- ईंधन कीमतों और वैश्विक संकट से निपटने के लिए मजबूत आर्थिक रणनीति की दरकार.
केंद्रीय बजट 2026-27 ऐसे वक्त आने वाला है जब कागजों में देश की अर्थव्यवस्था मजबूत दिख रही है, लेकिन आम आदमी की जिंदगी अब भी महंगाई, नौकरी की अनिश्चितता और बढ़ते खर्च से जूझ रही है. सरकार कह रही है कि विकास दर करीब 7 फीसद बनी हुई है और महंगाई काबू में है, लेकिन आम परिवार के लिए असली सवाल ये है कि महीने के आखिर में जेब में कितना बच रहा है.
मध्यम और गरीब वर्ग के लिए सबसे बड़ी परेशानी ये है कि आमदनी और खर्च के बीच फासला लगातार बढ़ता जा रहा है. सब्जी, दाल, दूध, गैस सिलेंडर, बिजली बिल, मकान किराया, बच्चों की फीस और ट्रांसपोर्ट. सब कुछ महंगा होता जा रहा है. तनख्वाह उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही, खासकर प्राइवेट नौकरी और असंगठित सेक्टर में काम करने वालों की. नतीजा ये कि बचत करना मुश्किल होता जा रहा है और लोग रोजमर्रा की जरूरतों तक में कटौती करने को मजबूर हैं.
रोजगार की उम्मीद
रोजगार का मुद्दा भी इस बजट से जुड़ी सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक है. बेरोजगारी दर भले आंकड़ों में बहुत ज्यादा न दिखे, लेकिन स्थायी और अच्छी सैलरी वाली नौकरियां मिलना मुश्किल होता जा रहा है. युवा सरकारी नौकरियों की तैयारी में सालों बिता रहे हैं, वहीं प्राइवेट सेक्टर में कॉन्ट्रैक्ट और अस्थायी जॉब का चलन बढ़ रहा है. छोटे और मझोले उद्योग, जो सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं, बढ़ती लागत, टैक्स झंझट और कर्ज की मुश्किलों से परेशान हैं. आम लोग चाहते हैं कि बजट ऐसा हो जिससे फैक्ट्री, स्टार्टअप और लोकल बिजनेस मजबूत हों और असली नौकरियां पैदा हों.
गांव, देहात की उम्मीदें
ग्रामीण भारत की हालत भी अलग नहीं है. खेती की पैदावार बढ़ी है, लेकिन किसान की आमदनी स्थिर नहीं है. मौसम की मार, सिंचाई की कमी, स्टोरेज की दिक्कत और बाजार के उतार-चढ़ाव से किसान परेशान हैं. गांवों में सड़क, अस्पताल, स्कूल और इंटरनेट जैसी सुविधाओं की कमी अब भी रोजगार और विकास के रास्ते में रोड़ा बनी हुई है. इसलिए लोग उम्मीद कर रहे हैं कि बजट सिर्फ सब्सिडी तक सीमित न रहे, बल्कि गांवों में टिकाऊ निवेश करे.
स्वास्थ्य और शिक्षा भी आम परिवार के बजट पर भारी पड़ रहे हैं. सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में सुधार हुआ है, फिर भी ज्यादातर लोगों को इलाज और पढ़ाई के लिए प्राइवेट सेक्टर का सहारा लेना पड़ता है. इलाज महंगा है और कॉलेज की फीस आसमान छू रही है. इससे मध्यम वर्ग पर दबाव बढ़ रहा है. लोगों को उम्मीद है कि बजट में सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे.
वैश्विक अनिश्चितताएं
इन घरेलू चुनौतियों के साथ-साथ दुनिया की हालत भी भारत के लिए आसान नहीं है. पश्चिम एशिया में तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध के लंबे असर, वैश्विक व्यापार में सुस्ती और सप्लाई चेन की दिक्कतें भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रही हैं. खासकर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर पेट्रोल-डीजल से लेकर सब्जियों और रोजमर्रा के सामान तक की कीमतों पर पड़ता है. जब ईंधन महंगा होता है तो ट्रांसपोर्ट महंगा होता है और फिर हर चीज महंगी हो जाती है. इसका बोझ आखिरकार आम आदमी की जेब पर ही पड़ता है.
इसीलिए बजट 2026 से लोगों की बड़ी उम्मीद ये है कि सरकार पेट्रोल-डीजल पर टैक्स को लेकर राहत दे, रणनीतिक तेल भंडार का सही इस्तेमाल करे और सौर, पवन और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर दे. साथ ही बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट और घरेलू उत्पादन बढ़ाकर ईंधन कीमतों के झटकों से आम लोगों को बचाया जा सके.
सामाजिक सुरक्षा अहम
भारत की विदेश नीति और व्यापार रिश्तों का असर भी सीधे आम आदमी पर पड़ता है. निर्यात बढ़ेगा तो फैक्ट्रियों में काम मिलेगा, आयात महंगा होगा तो घरेलू बाजार पर असर पड़ेगा. आम लोग इन जटिल शब्दों में भले बात न करें, लेकिन नौकरी, महंगाई और रोजमर्रा की चीजों की कीमत में इसका असर साफ दिखता है. इसलिए बजट से उम्मीद है कि वह मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और ऊर्जा सुरक्षा पर मजबूत रोडमैप दे.
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी घाटा कम रखने और आम लोगों पर खर्च बढ़ाने के बीच संतुलन बनाना. कर्ज नियंत्रण जरूरी है, लेकिन अगर इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च कम हुआ तो लंबे समय में देश की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. आम नागरिक चाहता है कि टैक्स सिस्टम सरल हो, सरकारी खर्च पारदर्शी हो और सामाजिक सुरक्षा मजबूत बने.
आखिर में, बजट 2026 सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है. ये उस भरोसे की परीक्षा है जो आम लोग सरकार से रखते हैं. लोगों की उम्मीद बहुत बड़ी नहीं है. वे बस इतना चाहते हैं कि नौकरी मिले, महंगाई काबू में रहे, बच्चों की पढ़ाई और इलाज सस्ता हो, और भविष्य सुरक्षित लगे. अगर बजट घरेलू सच्चाइयों और वैश्विक अनिश्चितताओं दोनों को समझकर संतुलित फैसले करता है, तो ये देश को ज्यादा समावेशी और टिकाऊ विकास की राह पर ले जा सकता है.














