पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और इजरायल-ईरान के बीच जारी संघर्ष ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को चिंता में डाल दिया है. इस भू-राजनीतिक संकट (Geopolitical Shock) के बीच वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने भारत सरकार से एक बड़ी मांग की है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किए गए एक पोस्ट में कहा कि भारत को अब प्राकृतिक संसाधनों के खनन (Mining) को 'राष्ट्रीय प्राथमिकता' घोषित कर देना चाहिए, ताकि आयात पर निर्भरता खत्म हो और देश सही मायनों में आत्मनिर्भर बन सके.
आयात का गणित: आम आदमी की जेब पर बोझ
अनिल अग्रवाल ने आंकड़ों के जरिए समझाया कि भारत फिलहाल अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशों पर कितना निर्भर है. उन्होंने कहा कि भारत अपनी जरूरत का 90% कच्चा तेल और 66% एलपीजी (LPG) आयात करता है. इसके अलावा, 50% एलएनजी (LNG) भी विदेशों से आती है. तेल और गैस का कुल आयात बिल सालाना लगभग 176 बिलियन डॉलर है, जबकि सोने का आयात 65 बिलियन डॉलर के करीब है.
अग्रवाल के अनुसार, 'तेल, गैस और सोना हमारे कुल आयात का लगभग 30% हिस्सा हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी कीमतों में मामूली बढ़त भी रुपये की वैल्यू, राजकोषीय घाटे और महंगाई पर बुरा असर डालती है, जिसका अंतिम भुगतान आम आदमी को करना पड़ता है.'
माइनिंग सेक्टर के लिए नियमों में ढील की मांग
वेदांता चेयरमैन ने सरकार से मांग की है कि खनन क्षेत्र को जटिल सरकारी प्रक्रियाओं से मुक्त किया जाए. इसके लिए उन्होंने कुछ मुद्दों पर सुझाव भी दिए हैं.
- जनसुनवाई से छूट: सरकार ने जिस तरह 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिजों) के लिए जनसुनवाई जैसी समय लेने वाली प्रक्रियाओं में राहत दी है, वैसी ही छूट सभी प्रकार के खनिजों और प्रक्रियाओं के लिए दी जानी चाहिए.
- सेल्फ-सर्टिफिकेशन: पर्यावरण संबंधी मंजूरियों (Environment Clearances) को 'सेल्फ-सर्टिफिकेशन' के आधार पर दिया जाए. कंपनी नियम पुस्तिका का पालन करने की प्रतिबद्धता जताए और काम शुरू करे, सरकार बाद में ऑडिट कर सकती है.
- सरकारी संपत्तियों का विनिवेश: मौजूदा सरकारी खनन संपत्तियों में कम से कम 50% हिस्सेदारी अनुभवी निजी हाथों में सौंपी जानी चाहिए. इससे कर्मचारियों को शेयर मिलेंगे और काम में तेजी आएगी.
सरकार का प्लान और भविष्य की राह
सरकार भी पहले से ही कच्चे तेल और खनिजों के लिए नए रास्तों और नई खानों की तलाश में जुटी है. अनिल अग्रवाल का मानना है कि इस सेक्टर को बढ़ावा देने से न केवल देश की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा होंगे. उन्होंने कहा कि आज इस क्षेत्र में महिलाएं बड़ी संख्या में आगे आ रही हैं और विदेशों में बैठे भारतीय विशेषज्ञ भी 'घर वापसी' के लिए तैयार हैं.
अनिश्चित वैश्विक माहौल का जिक्र करते हुए अग्रवाल ने अंत में कहा, 'आज की जियोपॉलिटिक्स में कोई स्थायी दोस्त या साझेदार नहीं है. आत्मनिर्भरता अब केवल एक इच्छा नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और रणनीतिक मजबूरी है.'














