देश नया-नया आजाद हुआ था और हिंदी सिनेमा में ऐसे एक्टर ने जन्म लिया, जो आम आदमी के दर्द, उसकी परेशानियों को ना सिर्फ स्क्रीन पर निभाए बल्कि अपने संवाद से लोगों को रोने पर मजबूर कर दें. यहां हम बात कर रहे हैं बलराज साहनी की, जिन्होंने एक तरफ समाज की ऊंच-नीच की व्यवस्था पर फिल्में बनाई तो दूसरी तरफ कर्मिशल अभिनेता बनकर उभरे. बलराज साहनी का जन्म 1 मई 1913 को हुआ था और हिंदी सिनेमा के प्रमुख कलाकारों में उनकी गिनती होती है. उनका निधन 13 अप्रैल 1973 को 59 साल की उम्र में हो गया था.
सिनेमा के माहिर खिलाड़ी थे बलराज साहनी
बलराज साहनी के लिए फिल्मों के साथ-साथ असल जिंदगी में भी नैतिकता और सामाजिक सरोकार उनके सार्वजनिक जीवन का अहम हिस्सा थे. उन्होंने पर्दे पर 'धरती के लाल', 'दो बीघा जमीन', 'काबुलीवाला' और 'गर्म हवा' जैसी सामाजिक फिल्में की लेकिन दूसरी तरफ 'अनुराधा', 'वक्त', 'संघर्ष' और 'एक फूल दो माली' जैसी कर्मिशल फिल्में भी की. बलराज साहनी की गिनती ऐसे अभिनेताओं में होती थी, जो अपने किरदार को महसूस करने और समझने के लिए हर हद पार कर देते थे लेकिन एक समय ऐसा आया, जब सूट-बूट की वजह से उनके हाथ से फिल्म निकलने की नौबत आ गई.

दो बीघा जमीन का वो किस्सा
‘दो बीघा जमीन (1953)' में बलराज ने शंभू महतो नाम के शख्स का किरदार निभाया था, जो एक गरीब रिक्शावाला है. फिल्म की कास्टिंग के दौरान इस किरदार के लिए निर्देशक बिमल रॉय अच्छे अभिनेता की तलाश में थे, जो एक गरीब की व्यथा और मजबूरी को पर्दे पर उतार सके. पहले रोल अशोक कुमार, त्रिलोक कपूर और नाजिर हुसैन को ऑफर हुए लेकिन फिर बिमल रॉय ने बलराज साहनी की फिल्म ‘हम लोग' में उनके द्वारा निभाए गए रोल को देखा और वे उनसे काफी हद तक प्रभावित हुए. उन्हें किरदार इतना अच्छा लगा कि उन्होंने अभिनेता को मिलने का बुलावा भिजवा दिया. फिर क्या बलराज साहनी काले सूट-बूट में निर्देशक से मिलने के लिए पहुंच गए.
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सूट बूट में पहुंचे बलराज साहनी
सूट-बूट में बलराज को देखकर निर्देशक ने सिर पकड़ लिया क्योंकि वे बहुत ज्यादा हैंडसम लग रहे थे और उन्हें देखकर नहीं लग रहा था कि वह गरीब रिक्शेवाला का किरदार निभा सकते हैं. उन्होंने अभिनेता से कहा कि जिस किरदार के लिए आपको चुना गया है, उसमें आप फिट नहीं बैठते. अभिनेता ने निर्देशक से फिल्म ‘धरती के लाल' देखने के लिए कहा, जिसमें उन्होंने 'निरंजन' नामक एक दुखी और बेबस बड़े बेटे का रोल प्ले किया था. फिर क्या, फिल्म देखते ही ‘दो बीघा जमीन' अभिनेता की झोली में आ गिरी.

फिल्म का बदलना पड़ा अंत
बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन' (1953) का मूल क्लाइमेक्स बेहद दर्दनाक था. इसमें निरूपा रॉय (मां) की मौत हो जाती है और उनके पति बालराज साहनी जीवन की इस त्रासदी के बावजूद अपना जमीन का टुकड़ा हासिल कर लेते है. जब बिमल रॉय की पत्नी ने फिल्म देखी तो वे हैरा रह गईं. उन्हें यह अंत बेहद पिछड़ा और अमानवीय लगा. उन्होंने पति से तुरंत क्लाइमैक्स बदलने की मांग की. बिमल रॉय ने पूरी शूटिंग दोबारा की. नए अंत में निरूपा रॉय बच जाती हैं, लेकिन बालराज साहनी अपनी दो बीघा जमीन हमेशा के लिए खो देते हैं. इस बदलाव ने फिल्म को और गहरी सामाजिक प्रासंगिकता दी.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं