बॉलीवुड में लंबे समय तक एक अनकहा नियम चलता रहा कि हीरो वही बन सकता है जो दिखने में परफेक्ट हो. लंबा कद, चमकदार चेहरा और कसरती बॉडी. लेकिन एक ऐसा कलाकार भी आया, जिसने इस सोच को ही पूरी तरह बदल दिया. दिल्ली में चौकीदारी कर गुजारा करने वाला यह शख्स अपने टैलेंट के दम पर उस जगह तक पहुंचा, जहां आज एक्टिंग ही उसकी पहचान बन चुकी है. यह कहानी है नवाजुद्दीन सिद्दीकी की, जिन्होंने बिना पारंपरिक स्टारडम के भी इंडस्ट्री में अपनी अलग जगह बनाई.
मुंबई के शुरुआती दिनों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का समय बेहद कठिन रहा. उन्हें फिल्मों में ऐसे छोटे रोल मिलते थे, जिन्हें कई बार दर्शक नोटिस भी नहीं कर पाते थे. ‘सरफरोश' और ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस' जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित थी. उस दौर में बॉलीवुड का फोकस लुक्स और ग्लैमर पर ज्यादा था, जिसमें उनका साधारण चेहरा फिट नहीं बैठता था.
साधारण लुक्स के बावजूद बनाई अपनी जगह
हालांकि, नवाजुद्दीन ने कभी खुद को पारंपरिक हीरो की तरह ढालने की कोशिश नहीं की. उन्होंने किरदारों को समझने और उन्हें पूरी सच्चाई के साथ निभाने पर ध्यान दिया. यही वजह रही कि धीरे-धीरे उनकी पहचान एक ऐसे एक्टर के रूप में बनने लगी, जो हर रोल में वास्तविकता लेकर आता है.
साल 2012 में आई ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर' उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. फैजल खान के किरदार ने उन्हें एक नई पहचान दी और इंडस्ट्री का नजरिया बदल दिया. इस फिल्म के बाद निर्देशकों ने ऐसे कलाकारों की तलाश शुरू की, जो किरदार को विश्वसनीय बना सकें, न कि सिर्फ स्क्रीन पर आकर्षक दिखें.
इसके बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने ‘रमन राघव 2.0', ‘फोटोग्राफ' और वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स' जैसे प्रोजेक्ट्स में अपनी एक्टिंग का अलग लेवल दिखाया. खासकर ‘गणेश गायतोंडे' का किरदार उनकी पहचान का अहम हिस्सा बन गया.
क्यों ‘मेथड एक्टिंग' के पर्याय माने जाते हैं नवाजुद्दीन
नवाजुद्दीन सिद्दीकी को आज के दौर में ‘मेथड एक्टिंग' का मजबूत चेहरा माना जाता है. उनकी खासियत यह है कि वे किसी किरदार को सिर्फ निभाते नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह जीने की कोशिश करते हैं. उनके अभिनय में चेहरे के भाव, आंखों की हरकत और संवादों की टाइमिंग तक कहानी का हिस्सा बन जाती है, जिससे किरदार ज्यादा वास्तविक लगता है.
यही वजह है कि उनके रोल में बनावट कम और सच्चाई ज्यादा नजर आती है. नवाजुद्दीन दिखने से ज्यादा ‘दिखाने' पर भरोसा करते हैं, यानी किरदार को बाहरी स्टाइल से नहीं, बल्कि भीतर की समझ से मजबूत बनाते हैं. इसी कारण उनके कई किरदार लंबे समय तक दर्शकों के दिमाग में बने रहते हैं.
आज उनकी तुलना पारंपरिक स्टारडम के बजाय उनके अभिनय से की जाती है. उन्होंने यह साबित किया है कि एक्टर की असली पहचान उसकी स्क्रीन प्रेजेंस या लुक्स से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने किरदार को कितनी गहराई से दर्शकों तक पहुंचा पाता है. उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि बॉलीवुड में अब सिर्फ लुक्स नहीं, बल्कि टैलेंट और परफॉर्मेंस भी स्टारडम तय कर सकते हैं.
संघर्ष के दिनों में लोग करते थे सवाल
नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने एक बार बताया था कि शुरुआती संघर्ष के दिनों में अक्सर उनके लुक्स की आलोचना की जाती थी और लोग,जिनमें उनके परिवार के जान-पहचान वाले भी शामिल थे. यह सवाल उठाते थे कि वह एक्टर क्यों बनना चाहते हैं. एक बार उनकी मां की दोस्त ने कहा था कि तुम्हारा बेटा क्यों एक्टर बनना चाहता है. ना शक्ल है ना सूरत है. मां से बात करते हुए उन्होंने यह बात सुन ली थी. तब बाद में उनकी मां ने कहा था, कचरों के भी दिन बदलते हैं. तुम तो फिर भी इंसान हो. इस बात ने उनकी जिंदगी बदल दी.