जाति छिपाने के लिए नाम के आगे लगाता था कुमार, पुलिस में भर्ती से पहले ही चंदन की हो गई मौत- होमबाउंड

होमबाउंड की कहानी समाज की एक अलग ही सच्चाई दिखाती है. ये फिल्म इस वक्त ऑस्कर में भारत की रीप्रेजेंट कर रही है. आपने देखी क्या ?

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ऑस्कर में भारत को रीप्रेजेंट कर रही है होमबाउंड
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नई दिल्ली:

क्या जाति आपकी पहचान के लिए बहुत मायने रखती है? आप SC/ST/OBC हैं? अगर हैं तो आपके साथ समाज में किस तरह व्यवहार किया जाएगा. ये बातें हर किसी के लिए मायने नहीं रखती हों, लेकिन फिर भी समाज में जातिगत पहचान को लेकर कई तरह की समस्याएं अकसर देखने को मिल जाती है. कई ऐसे भी युवा हैं जिन्हें जातिगत पहचान असहज बना देती है और इसी मुद्दे को बहुत ही गंभीरता और मार्मिकता के साथ नीरज घेवन ने अपनी फिल्म होमबाउंड में दिखाया है. ये फिल्म आज इंटरनेशनल मंच ऑस्कर पर भारत को रीप्रेजेंट कर रही है. इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी की ऑस्कर की दौड़ में शामिल ये फिल्म टॉप 15 फिल्मों की लिस्ट में जगह बना चुकी है. इस बीच खयाल आया कि आपको इस फिल्म की कहानी और इसके किरदारों के बारे में बताया जाए. क्योंकि ये कहानी और किरदार आपको सोचने पर मजबूर करते हैं और कई जगह समाज को आईना भी दिखाते हैं.

क्या है होमबाउंड की कहानी ?

होमबाउंड दो दोस्तों की कहानी लेकर आती है. एक शोएब और दूसरा चंदन कुमार वाल्मिकी (विशाल जेठवा और ईशान खट्टर). दोनों ही गरीब परिवार से हैं और अपने परिवार को इस तंगहाली और मजबूरी से ऊपर उठाने के लिए एक सरकारी नौकरी पाने का सपना देखते हैं. इसी सपने की दौड़ में वह फॉर्म भरते हैं, धक्के खाते हुए एग्जाम सेंटर तक पहुंचते हैं और फिर हिस्से आता है इंतजार रिजल्ट का. इस फिल्म में सरकारी नौकरी की रेस के बीच एक और चीज पर नजर जाती है और वह है चंदन की जाति. चंदन वाल्मिकी समाज से था लेकिन वह अपनी जाति बताने में असहज था. यही वजह है जब वह एक बार रिजल्ट का पता करने सरकारी दफ्तर जाता है तो नाम पूछने पर अपना नाम चंदन कुमार बताता है. जब पूछा जाता है कि कैटेगरी से आते हो तो वह मना कर देता है. 

वहीं इससे पहले एक सीन में रेलवे स्टेशन पर उनकी मुलाकात जाह्नवी कपूर से होती है और जान्हवी अपना पूरा नाम सुधा भारती बताती हैं तो वह सुधा का कॉन्फिडेंस देखकर कुछ वक्त देखता ही रह जाता है. खैर कहानी आगे बढ़ती है रिजल्ट डिले होता है तो पैसा कमाने के लिए घर छोड़ना पड़ता है. चंदन गुजरात चला जाता है. कहानी कुछ इस तरह के मोड़ लेती है कि उसके बचपन का दोस्त शोएब भी नौकरी के लिए वहीं पहुंच जाता है. धीरे-धीरे समय बीतता है और फिर आता है कोविड-19. पूरे देश में लॉकडाउन लग जाता है और शोएब और चंदन दूसरे शहर में फंस जाते हैं. ना खाने को राशन ना कोई अपना पास इस सब से परेशान होकर दोनों घर लौटने का फैसला करते हैं लेकिन सफर इतना लंबा था कि लौटते-लौटते इतनी देर हो जाती है कि चंदन रास्ते में ही दम तोड़ देता है. कुछ समय बाद उस नौकरी की परीक्षा का रिजल्ट आता है और चंदन को वो पुलिस की नौकरी मिल गई होती है लेकिन जॉइन करने के लिए अब चंदन नहीं था.

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