धुरंधर द रिवेंज को आदित्य धर की अपनी कहानी के रूप में देखना बेहद आकर्षक है. उस कश्मीरी पंडित की कहानी, जिसने अपना सब कुछ खो दिया और उसके परिवार को अपने घर से ही निकाल दिया गया. वह अपना घर खो देता है, देश के प्रति अपना प्यार खो देता है, और यह विश्वास खो देता है कि सरकार उसके लिए खड़ी होगी. यही वो बात है जिसकी झलक जसकीरत सिंह रांगी की कहानी देती है, पिछले साल रिलीज हुई बेहद लोकप्रिय धुरंधर की प्रीक्वल/सीक्वल में. एक लड़का जिसके पिता और दादा सेना में थे. जो खुद भी उनके जैसा बनना चाहता था. लेकिन हालात उस समय बदल जाते हैं जब गांव में उसकी जमीन को लेकर प्रतिद्वंद्वी परिवार उसके पिता को यातना देते हैं, उसकी बहनों के साथ बलात्कार करते हैं और उसको वो करने के लिए उकसाते हैं जो वो नहीं करना चाहता. न्याय की खोज परिवार को देश की हर अदालत तक ले जाती है, लेकिन जसकीरत फैसला करता है कि अब मामला खुद अपने हाथ में लेना होगा. और यही उसे हमजा अली मजारी बना देता है. एक किलिंग मशीन जो भारतीय खुफिया तंत्र द्वारा पाकिस्तान पर छोड़ दी जाती है.
जमीन का विवाद शायद कश्मीर के लिए एक रूपक है, जो हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच झगड़े में फंसा रहता है.
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और अंत में, ज्यादा खुलासा किए बिना, यह ठीक वही हो सकता है जो कश्मीरी पंडितों के लिए अब अपना देश है, एक राज्य जिसका वह सपना देख सकता है लेकिन कभी लौट नहीं सकता. जमीन हमेशा के लिए बदल गई है और उस छोटे समुदाय के लिए भी, जो उससे निर्वासित कर दिया गया है. जितना जसकीरत अब पठानकोट में अपने घर के लिए अजनबी है, उतना ही पंडित उस घाटी के लिए अजनबी हैं जहां वह कभी फल-फूल रहे थे.

हां, धुरंधर: द रिवेंज नरेंद्र मोदी सरकार का गुणगान है और इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को हीरो बनाया गया है, जिसे आर माधवन अजय सान्याल के रूप में निभाते हैं, लेकिन यह पाकिस्तान द्वारा भारत को दिए गए हजारों घाव की एक निजी और गहरी महसूस की गई कहानी है, जिसमें कश्मीरी पंडितों का निर्वासन सबसे विनाशकारी परिणाम रहा है.
यह पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ लगातार चलाए जा रहे युद्ध की कहानी भी है, सारा पाकिस्तान नहीं, बल्कि जिन आतंकवादियों को यह पनाह देता है, और वह एजेंडा जो वह बनाए रखता है.
जहां धुरंधर, पहला भाग, हमजा अली मजारी के ल्यारी, कराची के बलोच गिरोह में घुसपैठ के बारे में था, वहीं दूसरा भाग बैकस्टोरी है. जिसमें जसकीरत सिंह रांगी को कैसे हमजा बनाया, दिखाया गया है. इसमें दिखाया जाता है कि कैसे एक अकेला आदमी तबाही लाता है और पाकिस्तान में आतंक के सारे नेटवर्क को ध्वस्त कर देता है. यह एक कल्पना है जिसकी भारत को इस समय बेहद जरूरत है. आदित्य धर से बेहतर कौन इसे लोगों और इससे भी ज्यादा देश और सरकार को दे सकता है, जो नई विश्व अराजकता के दौर में बुरी तरह जूझ रहा है, उन देशों के बीच अपना स्थान ढूंढ रहा है जो कभी उसके मित्र थे और अब नए मित्रों को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है जिन्हें वह सोचता था कि उसने बना लिया है.

हौसला. ईंधन. बदला. यही टैगलाइन है जो फिल्म में बार-बार लौटती है, और यही वह है जो पहले भाग में सान्याल हमजा को देता है: नजर और सब्र. आदित्य धर मोदी सरकार के हर कदम के लिए एक तार्किक व्याख्या देते हैं, 2016 के नोटबंदी से लेकर 2023 के एनकाउंटर में गैंगस्टर अतीक अहमद की हत्या तक. दुश्मन यहां साफ तौर पर पाकिस्तान है, और उसके भारत में पाले गए एसेट्स हैं, जिनकी रणनीति का मुख्य वास्तुकार बड़े साहब के रूप में सामने आता है, जो ईमानदारी से कोई सरप्राइज नहीं था. यह एक ऐसा व्यक्ति है जिसने 1992 से भारत को लगभग अकेले नुकसान पहुंचाया है. यहां पाकिस्तानी भारत पर हिंसा थोपने पर तुले हुए हैं, और मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल द्वारा निभाया गया एक बेहद घृणित किरदार) के उत्तेजक शब्दों में इससे भी ज्यादा: काफिरों को दूसरे धर्म की अनिवार्यता स्वीकार करवाना, और उनकी महिलाओं को सेक्स गुलाम बनाना.
1971 का युद्ध मेजर इकबाल की बातचीत में बार-बार आता है, उसके नफरत भरे पिता के साथ, जिसे सुविंदर विक्की ने बेहतरीन तरीके से निभाया है, जो पूर्वी पाकिस्तान पर पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए अत्याचारों का प्रतिनिधित्व करता है, खासकर उसके लोगों पर. इसमें घाटी से पंडितों के पलायन के नारों की भी प्रतिध्वनि हैं: रालिव, गालिव, या चालिव (धर्म बदलो, मरो या चले जाओ).
आदित्य धर की फिल्ममेकिंग सयानेपन से लबरेज है. कोई नहीं जानता कि क्या वह वाकई डोभाल के नजर और सब्र सिद्धांत में विश्वास करते हैं, लेकिन वे इसे व्याख्या करने में अच्छा काम करते हैं, भारत को कभी नुकसान पहुंचाने वाले हर दुश्मन को नष्ट करते हुए, आईसी-814 हाईजैक से लेकर 26/11 हमले, 2012 पुणे बम विस्फोट और 2013 हैदराबाद ब्लास्ट तक. हमजा पाकिस्तान के आतंक नेटवर्क में एक तूफान ला देता है जिससे हम सोचते रह रह जाते हैं कि पहलगाम नरसंहार के लिए कौन जिम्मेदार था.
आदित्य धर हमारे लिए एक मजबूत देश और सरकार की कल्पना बुन रहे हैं, जो कहती है कि 'घर में घुसेगा और मारेगा भी', बलोचियों की थोड़ी मदद के साथ. हमजा के एक खुलासे में वह स्पष्ट करता है कि उसका युद्ध पाकिस्तान के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन राक्षसों के खिलाफ है जो उसे भारत और अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध में धकेलते हैं जो उनके लिए असुविधाजनक हैं.

फिल्म लंबी है, और कभी-कभी धैर्य की परीक्षा लेती है, खासकर हिंसा के अत्यधिक इस्तेमाल में. मैंने अभी तक ऐसी कोई फिल्म नहीं देखी जहां इतने सिर और अंग इतने विविध वस्तुओं से काटे गए हों, कुल्हाड़ियों से लेकर दुकान के शटर, हुक, तेल के बैरल तक. साउंडट्रैक हमेशा की तरह चतुराई से गढ़ा गया है, बोनी एम के रास्पुतिन से बॉम्बे रॉकर्स के आरी आरी तक, जो पंजाबी लोक गीत बारी बरसी से अपनी जड़ें लेता है, तिरछी टोपीवाला (1989 की फिल्म त्रिदेव से) से लेकर तम्मा तम्मा लोगे (1989 की फिल्म थानेदार से), जिसके स्टार संजय दत्त एसपी असलम का किरदार निभाते हैं और जिन्हें विडंबना से असल जिंदगी में 1992 मुंबई ब्लास्ट में अपनी भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था.
क्या आदित्य धर की दुनिया में इस हिंसा और नफरत का मुकाबला करने के लिए प्यार काफी है? दुर्भाग्यवश नहीं, हालांकि हमजा और उसकी पत्नी के बीच कुछ रोमांटिक पल हैं, बहुत युवा लेकिन बहुत प्रतिभाशाली सारा अर्जुन, जो इस प्रीक्वल/सीक्वल में अपनी जगह बना लेती है.
साउंडट्रैक के लिए रीमिक्स किए गए कई गानों में से यह नुसरत फतेह अली खान क्लासिक हैं जो भारत और पाकिस्तान के डांस फ्लोर पर बिना संदर्भ के इस्तेमाल होने वाला है: दिल पे जख्म खाते हैं/जान से गुजरते हैं/जुर्म सिर्फ इतना, उनसे प्यार करते हैं. यह धुरंधर: द रिवेंज के पीछे के शोकपूर्ण दर्शनशास्त्र को संक्षेप में बताता है. पड़ोसी जो कभी एक थे और अब घातक रूप से आमने सामने हैं. यह एक अंतहीन दुख है, इस शोक का कोई अंत नहीं, एक दर्द जिसकी सीमा कोई नहीं जानता.
और यह कश्मीर में दोनों समुदायों को अलग करने वाली बात के लिए जितना सच है, उतना ही यह विभाजन के उन भूतों की व्याख्या भी करता है जो आज भी भारत और पाकिस्तान को लगातार तंग करते रहते हैं.
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