डॉ. भीमराव आंबेडकर की कहानी हम सब जानते हैं, लेकिन उसे देखने और महसूस करने का असर बिल्कुल अलग होता है. उनके जीवन पर बनी कुछ फिल्में और सीरीज ऐसी हैं, जो सिर्फ घटनाएं नहीं दिखातीं, बल्कि उस दौर की कड़वी सच्चाई, टकराव और संघर्ष को स्क्रीन पर जिंदा कर देती हैं. खास बात यह है कि इनमें कई ऐसे पहलू भी सामने आते हैं, जो आम तौर पर चर्चाओं में कम ही जगह पाते हैं. यही वजह है कि इन कहानियों को पर्दे पर देखना एक अलग अनुभव बन जाता है. आंबेडकर जयंती के मौके पर अगर आप उनकी जिंदगी को थोड़ा और करीब से समझना चाहते हैं, तो ये फिल्में और सीरीज आपको उस दौर की जमीनी हकीकत से रूबरू कराते हैं.
जब्बार पटेल की फिल्म ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर'
सबसे पहले बात जब्बार पटेल के निर्देशन में बनी फिल्म “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर” की. यह फिल्म आज भी आंबेडकर पर बनी सबसे ऑथेंटिक फिल्मों में गिनी जाती है. इस फिल्म में मलयालम फिल्मों के जाने-माने एक्टर मम्मूटी ने बाबासाहेब का किरदार निभाया है. फिल्म की खास बात यह है कि यह सिर्फ उनके पब्लिक लाइफ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके पर्सनल संघर्षों को भी सामने लाती है.
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इसमें उनकी पहली पत्नी रमाबाई आंबेडकर के साथ उनका शुरुआती संघर्ष भरा जीवन दिखाया गया है, जहां गरीबी और सामाजिक चुनौतियां लगातार उनके साथ थीं. वहीं फिल्म उनके जीवन के बाद के दौर को भी छूती है, जहां सविता आंबेडकर उनके साथ नजर आती हैं और उनकी बिगड़ती सेहत के दौरान उनका सहारा बनती हैं. यही वजह है कि यह फिल्म आंबेडकर के व्यक्तित्व को सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के तौर पर भी समझने का मौका देती है. फिल्म में सोनाली कुलकर्णी ने रमाबाई, मोहन गोखले ने महात्मा गांधी और मृणाल कुलकर्णी ने सविता आंबेडकर की अहम भूमिका निभाई है.
इस फिल्म की खासियत सिर्फ इसकी स्टारकास्ट नहीं, बल्कि इसकी गहरी रिसर्च है. इसे बनाने में कई साल लगे और भारत सरकार के सहयोग से इसे बड़े पैमाने पर तैयार किया गया. फिल्म आंबेडकर के बचपन से लेकर संविधान तैयार करने तक के सफर को विस्तार से दिखाती है. खास बात यह है कि इसमें बाबासाहेब की भूमिका निभाने वाले मम्मूटी को नेशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था.
श्याम बेनेगल का डॉक्युड्रामा
अगर आप यह जानना चाहते हैं कि संविधान सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि बहसों, टकराव और विचारों का नतीजा है, तो श्याम बेनेगल की सीरीज संविधान: द मेकिंग ऑफ द कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया देखनी चाहिए. यह सीरीज 10 एपिसोड में संविधान सभा की बहसों को रीक्रिएट करती है. इसकी खास बात यह है कि इसमें सिर्फ घटनाएं नहीं दिखाई जातीं, बल्कि यह भी बताया जाता है कि अलग-अलग नेताओं के बीच किस तरह के वैचारिक मतभेद थे और आंबेडकर ने कैसे अपने तर्कों से उन्हें जवाब दिया.
इस सीरीज में डॉ आंबेडकर की भूमिका सचिन खेडेकर ने निभाई है, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू का रोल दिलीप ताहिल ने किया है. नीरज कबी महात्मा गांधी और टॉम अल्टर मौलाना आजाद बने हैं.
मराठी व अन्य भाषाओं में बाबासाहेब पर बनी फिल्में
मराठी सिनेमा में आंबेडकर पर काम काफी पहले शुरू हो चुका था. 1990 में आई फिल्म ‘भीम गर्जना' इस मामले में अहम मानी जाती है. इसे विजय पवार ने डायरेक्ट किया था और इसमें कृष्णानंद ने आंबेडकर का किरदार निभाया, जबकि प्रतिमा देवी रमाबाई के रोल में थीं. यह फिल्म उन शुरुआती कोशिशों में से एक थी, जिसने आंबेडकर के सामाजिक आंदोलन और उनके विचारों को बड़े पर्दे पर लाने का प्रयास किया. खास बात यह है कि इसमें सिर्फ बायोपिक नहीं, बल्कि उस दौर का सामाजिक माहौल और संघर्ष भी दिखाया गया है.
इसके अलावा युगपुरुषः डॉ भीमराव आंबेडकर के शीर्षक से नाटक और फिल्म भी बनाई गई. मराठी में न सिर्फ डॉ आंबेडकर, बल्कि उनकी पहली पत्नी रमाबाई आंबेडकर के संघर्ष को लेकर भी फिल्म ‘रमाबाई भीमराव आंबेडकर' बनाई गई. मराठी के अलावा भी कई क्षेत्रीय भाषाओं में डॉ आंबेडकर पर आधारित फिल्में बनाई गई है, जिसमें साल 2005 में कन्नड़ भाषा में बनी फिल्म ‘डॉ बी आर आंबेडकर' प्रमुख है.
बच्चों के लिए एनिमेटेड फिल्में भी है.
यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर आंबेडकर से जुड़ी कई डॉक्यूमेंट्री और रीजनल फिल्में भी उपलब्ध हैं, जो अलग-अलग भाषाओं में उनके जीवन को दिखाती हैं. इनमें कुछ एनिमेटेड और एजुकेशनल फॉर्मेट भी शामिल हैं, जिन्हें खासकर बच्चों और नए दर्शकों के लिए बनाया गया है, ताकि उनकी सोच और विचारों को आसान तरीके से समझाया जा सके.
आंबेडकर की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है, बल्कि आज के समाज का आईना भी है. ऐसे में अगर आप उन्हें सच में समझना चाहते हैं, तो इन फिल्मों और सीरीज के जरिए उनकी जिंदगी को देखना, महसूस करना और समझना शायद सबसे जरूरी कदम है.
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