विश्व रंगमंच दिवस: कैसे होली के रंग को थियेटर ने बचाया, नैनीताल में कैसे लोकप्रिय हुए नाटक

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हिमांशु जोशी

हर साल 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस मनाया जाता है. यह दिन उस कला का है जो बिना किसी स्क्रीन के दर्शकों से आमने सामने बात करती है. उत्तराखंड के नैनीताल की पहचान यहां की समृद्ध नाट्य परंपरा से रही है. इस परंपरा से जुड़े वरिष्ठ रंगकर्मी जहूर आलम को 2023 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

एक शुरुआत, जो धीरे धीरे आंदोलन बना

नैनीताल में रंगमंच की शुरुआत 19वीं सदी के उत्तरार्ध में बंगाली और पारसी थिएटर से मानी जाती है. इससे पहले भी कुमाऊं में लोकगाथाओं और संस्कृत नाट्य परंपरा के रूप में रंगमंच के तत्व मौजूद थे. इसके बाद यह यात्रा 1939 में स्थापित शारदा संघ के साथ आगे बढ़ी. शारदा संघ ने पारसी थिएटर की भव्यता को सहेजते हुए बैठकी होली जैसी शास्त्रीय विधाओं को एक अनुशासित मंच दिया.2014 में अपनी प्लेटिनम जुबली मना चुका यह संघ इस बात का प्रमाण है कि नैनीताल का रंगमंच सामूहिक प्रयासों का नतीजा है.

इसी कड़ी में 1976 के आसपास युगमंच की शुरुआत हुई,जिसका मकसद यह था कि पहाड़ की लोक परंपराएं, गीत संगीत और कहानियां भी आधुनिक मंच तक पहुंचें. मोहन उप्रेती, गिरीश तिवारी गिर्दा, शेखर पाठक और जहूर आलम जैसे लोगों की पहल से बने इस मंच ने 'अंधा युग'  जैसे नाटकों के जरिए अपनी पहचान बनाई. इसमें कुमाऊं की लोक शैली और परंपराओं को जोड़कर नाटकों को लोगों के करीब लाया गया. युगमंच से जुड़े कई कलाकार आगे चलकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक भी पहुंचे.

नैलीताल में नाट्य संस्था युगमंच की ओर से आयोजित बैठकी होली में शामिल लोग.

जब मंच पर दिखने लगी अपनी ही दुनिया

नैनीताल के रंगमंच में स्थानीय भाषा और बोलियों के प्रयोग से दर्शकों को मंच पर अपनी ही जिंदगी दिखाई देती है. हालांकि कुमाऊंनी में लिखित नाटकों की संख्या सीमित रही है और इस दिशा में काम की जरूरत लगातार महसूस की जाती रही है.

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होली के बदलते स्वरूप को देखते हुए रंगमंच समूह 'युगमंच' ने पहल की. बैठ और खड़ी होली को सलीकेदार सांस्कृतिक उत्सव के रूप में पेश किया गया. उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से कलाकार बुलाए गए, महिलाओं को मंच पर आने के लिए प्रोत्साहित किया गया और नई पीढ़ी को सिखाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की गईं. इसका असर यह हुआ कि नैनीताल की होली आज भी परंपरा और अनुशासन के साथ जीवित है.

'जागर' की सामाजिक क्रांति

साल 1980 के आसपास गिरीश चंद्र तिवारी गिर्दा ने अपने साथियों के साथ नैनीताल में 'जागर' मंच के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना जगाने का महत्वपूर्ण प्रयास किया. यह वही दौर था जब उत्तराखंड में 'नशा नहीं रोजगार दो' आंदोलन उभर रहा था.इस सामाजिक उथल पुथल के बीच 'जागर' जनसंवाद का सशक्त माध्यम बन गया. लोकभाषा, गीतों और नुक्कड़ नाटकों के जरिए गिर्दा और उनके साथियों ने बेरोजगारी, पलायन और नशे जैसे मुद्दों को सीधे लोगों के सामने रखा.

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गिर्दा के नाम से मशहूर रहे गिरीश चंद्र तिवारी की याद में आयोजित 'गिर्दा को सलाम' कार्यक्रम में नाटक करते कलाकार.
Photo Credit: Yugmanch Nainital

वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह कहते हैं कि नैनीताल में रंगमंच की इस साझा विरासत को समय-समय पर एकायन,तराना, प्रयोगांक जैसी संस्थाओं ने आगे बढ़ाया है. प्रयोगांक ने नए दौर के कलाकारों को मंच दिया, थिएटर में नए प्रयोग हो रहे हैं और युवा कलाकार लगातार जुड़ रहे हैं.

सांस्कृतिक अड्डे और ऐतिहासिक मंच 

नैनीताल के रंगमंच को समझने के लिए उन अड्डों को समझना जरूरी है, जहां नाटकों की रूपरेखा तैयार होती रही. नैनीताल समाचार का दफ्तर, 'इंतखाब' नाम की कपड़ों की दुकान और शहर के कई कोने ऐसे रहे, जहां रंगमंच की बुनियाद मजबूत हुई. इसके साथ ही शैले हॉल जैसे ऐतिहासिक मंचों का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा, जिसे कभी शहर का नाचघर भी कहा जाता था. शारदा संघ और रामसेवक सभा जैसी संस्थाओं की स्मारिकाओं में पुराने नाटकों और प्रस्तुतियों के प्रमाण भी मिलते हैं.

इन ठिकानों पर ग्राहकों से ज्यादा कवियों, लेखकों और कलाकारों का जमावड़ा लगता. चाय और कॉफी के दौर के साथ गंभीर बातचीत चलती और यही जगहें धीरे-धीरे सांस्कृतिक केंद्र बन गईं, जहां से निर्मल पांडे, ललित तिवारी, सुदर्शन जुयाल और इदरीस मलिक जैसे कई बड़े नाम निकले.

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जब लोग मिलते हैं तो मिट जाते हैं भेद 

नैनीताल का रंगमंच दिखाता है कि कला लोगों को जोड़ने का काम करती है. एक मुस्लिम परिवार का सदस्य जब होली जैसे आयोजन को पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ाता है, तो वह साझा संस्कृति का सशक्त उदाहरण बन जाता है. रंगमंच में धर्म, जाति या पहचान से ज्यादा काम और प्रतिबद्धता मायने रखती है. इतिहासकार शेखर पाठक कहते हैं कि नैनीताल के रंगमंच की यही साझा विरासत है, इसमें अलग-अलग समुदाय के लोग मिलकर अपनी संस्कृति को जीते हैं. यह वह परंपरा है, जो आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है.

पंचायत फेम अभिनेत्री सुनीता रजवार नैनीताल में रंगमंच की साझा विरासत को इस तरह ही देखती हैं. उन्होंने कहा कि नैनीताल के रंगमंच 'युगमंच' ने उन्हें न केवल अभिनय की बारीकियां सिखाईं, बल्कि जीवन को देखने का एक नया नजरिया दिया. सुनीता कहती हैं कि जहूर आलम युगमंच में नाटकों के स्तंभ हैं, उन्होंने नैनीताल में नाटक की प्रथा को संजोकर रखा है. सुनीता कहती हैं जहूर दा के लिए नैनीताल का रंगमंच उनका अपना परिवार है और उन्होंने हमेशा दूसरों के लिए रास्ता बनाया है, मैं भी उनमें से एक हूं.

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नैनीताल में युगमंच की ओर से प्रस्तुत नाटक 'जिने लाहौर नी वेख्या ओ जम्याई नी' का एक दृश्य.
Photo Credit: Yugmanch Nainital

वहीं, नवीन बेगाना अपने सफर को याद करते हुए बताते हैं कि रंगमंच से जुड़ना उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ था. किशोरावस्था के भटकाव के समय रंगमंच ने ही उन्हें अनुशासन और कला का ज्ञान दिया. नवीन का मानना है कि रंगमंच ने उन्हें न सिर्फ एक कलाकार के रूप में गढ़ा, बल्कि एक शिक्षक और एक बेहतर इंसान के रूप में पहचान दिलाई. उनके लिए थिएटर एक ऐसी पाठशाला रही है, जहां उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी सीख हासिल की.

क्रंकीट के जंगल में कहां है थियेटर

आज रंगमंच एक अहम दोराहे पर खड़ा है. जैसे-जैसे यह अधिक अकादमिक हुआ, ठेठ स्थानीय बोली से कुछ दूर होता चला गया. दर्शकों की दूरी का एक कारण यह भी है कि मंच पर अब उन्हें अपने सरोकार कम दिखाई देते हैं.विकास की दौड़ में थिएटर के लिए जगह का अभाव एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है. नैनीताल जैसे शहर में कंक्रीट का विस्तार तो हुआ, लेकिन कलाकारों के लिए रियाज और मंचन की जगहें कम होती गईं. शैले हॉल जैसी जगहों की जर्जर स्थिति और बढ़ता खर्च भी समस्या को और गहरा करता है.

नैनीताल में नाटक करते कलाकार.
Photo Credit: Yugmanch Nainital

जहूर आलम कहते हैं कि यहां रंगमंच आज भी अधिकतर चंदे के सहारे चलता है और सरकारी सहयोग सीमित है. रंगमंच को पेशे के रूप में मजबूत करने के लिए आर्थिक और सामाजिक समर्थन जरूरी है, तभी नई पीढ़ी इसे अपनाने के लिए आगे आएगी.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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