आखिर क्यों दिल्ली में गाना पसंद करते थे मोहम्मद रफी? 1964 की उस शाम में छिपा है जवाब, जब तालियों से गूंज उठा था मैदान

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विवेक शुक्ला

यकीन मानिए कि 31 जुलाई की ये शाम जब भी आती है, तो यादें अपने-आप लौट आती हैं. यादें उस दिन की, जब दिल्ली की हवा में बैसाखी का उत्सव और संगीत का जादू एक साथ घुल मिल गए थे. वो साल था 1964 का. दिन था बैसाखी का. राजधानी के चेम्सफोर्ड क्लब के विशाल मैदान में उस रात सिर्फ एक संगीत कार्यक्रम नहीं हो रहा था-वहां इतिहास रचा जा रहा था. ‘पंजाब कोकिला' सुरिंदर कौर की मौजूदगी तो पहले से ही कार्यक्रम को खास बना रही थी, लेकिन असली हलचल इस खबर से मची हुई थी कि आज राजधानी में मोहम्मद रफी साहब खुद मंच पर आने वाले हैं. उनके करियर का शायद पहला दिल्ली कंसर्ट. लोग दूर-दूर से जुटे थे. आँखों में इंतजार था, दिलों में धड़कनें तेज थीं. और फिर वो पल आया, जब रफी साहब मंच पर खड़े हुए…

आखिरकार, रात करीब नौ बजे जब रफी साहब मंच पर आए तो पूरा ग्राउंड तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. लोग खड़े होकर उनका स्वागत कर रहे थे. कुछ लोग उनके नाम के नारे लगा रहे थे. रफी साहब, अपनी सादगी भरी मुस्कान और साधारण पोशाक में, मंच पर खड़े होकर भीड़ को नमस्ते कर रहे थे. कुछ देर के बाद उन्हें मंच पर अमरजीत कोहली ने आमंत्रित कर लिया. कोहली जी दिल्ली में संगीत कार्यक्रम आयोजित करने वाली ‘सखा' नाम की संस्था के संस्थापक थे. उन्होंने रफी साहब का परिचय देते हुए कहा कि आज दिल्ली की जनता को एक अनमोल तोहफा मिलने जा रहा है. रफी साहब ने माइक संभाला और पहला गीत “चौदहवीं का चांद हो” (फिल्म चौदहवीं का चांद, 1960) सुनाया. उनकी मधुर, भावपूर्ण और बिल्कुल स्पष्ट आवाज ने पूरे माहौल को मंत्रमुग्ध कर दिया. लोग सांस रोककर सुन रहे थे. गीत खत्म होते ही फिर तालियों की बौछार हो गई.

इसके बाद रफी साहब ने दूसरा गीत “आज मौसम बड़ा बेईमान है” (फिल्म प्यासा, 1957) सुनाना शुरू ही किया था कि अचानक वे रुक गए. माइक उनके हाथ में था, लेकिन आवाज थम गई. फिर वे मंच से एक खास दिशा में देखकर मुस्कुराए और गाने लगे-“हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं, हम तेरे तेरे तेरे चाहनेवाले हैं.” यह पंक्ति उन्होंने जानबूझकर गाई थी. सबकी नजरें उस तरफ चली गईं जिस तरफ इशारा करके रफी गा रहे थे. उधर भीड़ को चीरती हुई सुरिंदर कौर मंच की तरफ आ रही थीं.

उनकी चाल में आत्मविश्वास था, चेहरे पर मुस्कान. रफी साहब ने उन्हें मंच पर गर्मजोशी से स्वागत किया. दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया. अब रफी साहब और सुरिंदर कौर ने एक साथ गाना शुरू किया-“हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं, हम तेरे तेरे तेरे चाहनेवाले हैं.” दोनों एक ही पंक्ति को बार-बार दोहरा रहे थे. उनकी आवाजें एक-दूसरे में घुलमिल गई थीं. भीड़ का उत्साह दोगुना हो गया. लोग ताली बजा-बजाकर और ताल दे-देकर साथ गाने लगे. वह पल सिर्फ संगीत का नहीं, दो महान कलाकारों के आपसी सम्मान और प्रेम का भी था.

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मोहम्मद रफी ने 1960 और 1970 के दशकों में चेम्सफोर्ड क्लब में ‘बैसाखी दी रात' के आयोजन में बार-बार शिरकत की. पंजाबी समाज का क्लब समझे जाने वाले चेम्सफोर्ड क्लब में वे आकर अपने चाहने वालों को कुछ पसंदीदा पंजाबी लोकगीत अवश्य सुनाया करते थे. वे जब भी इधर आए तो सुरिंदर कौर भी आईं. दोनों मिलकर ‘काला डोरिया कुंडे नाल...', ‘लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया...', ‘साड्डा चिड़िया दा चंबा रे असी उड़ जाणा रे...' जैसे पंजाबी लोकगीतों को मिलकर सुनाते तो दर्शक झूम उठते. ये सब पंजाब की धरती के अमर लोकगीत हैं. इन्हें पंजाबी परिवारों की कई पीढ़ियां अपने घर के बुजुर्गों से सुनती रही हैं. रफी साहब की आवाज में ये गीत और भी जीवंत हो उठते थे.

सुरिंदर कौर की मधुर और भावपूर्ण आवाज के साथ रफी की गहरी, भावपूर्ण टोन का मेल ऐसा था कि सुनने वाले भावुक हो जाते थे. कई बार तो लोग आंसू पोंछते नजर आते थे. रफी साहब दिल्ली में प्राइवेट महफिलों में भाग लेने से आमतौर पर बचते थे. उनकी व्यस्तता और सादगी भरी प्रकृति के कारण वे चुनिंदा कार्यक्रमों में ही जाते थे. पर उन्हें चेम्सफोर्ड क्लब में आना विशेष रूप से पसंद था. शायद इसलिए क्योंकि यहां का माहौल पारिवारिक और सांस्कृतिक था. यहां कोई दिखावा नहीं था, सिर्फ संगीत और भावनाओं का आदान-प्रदान था. क्लब के सदस्यों में कई ऐसे लोग थे जो रफी साहब के पुराने प्रशंसक थे. वे उनकी हर पेशकश का इंतजार करते थे.

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आज (31 जुलाई) रफी साहब की पुण्यतिथि पर चेम्सफोर्ड क्लब के उम्रदराज सदस्यों को उनके यहां गाए गीतों की याद अवश्य आएगी. कई बुजुर्ग आज भी उस शाम का जिक्र करते हैं जब रफी और सुरिंदर कौर ने साथ गाना गाया था. वे बताते हैं कि वह सिर्फ एक कंसर्ट नहीं था, बल्कि दो संस्कृतियों-हिंदी सिनेमा और पंजाबी लोकसंगीत-का सुंदर संगम था. रफी साहब की आवाज आज भी लाखों दिलों में जीवित है. उनकी पुण्यतिथि पर जब हम उनके गीत सुनते हैं तो वह 1964 की बैसाखी वाली शाम फिर से जीवंत हो उठती है. चेम्सफोर्ड क्लब की वह रात सिर्फ याद नहीं, इतिहास का एक अनमोल पन्ना बन गई है.

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