LPG और PNG गैस की सप्लाई के दो अलग तरीके हैं. LPG सिलेंडर के जरिए घरों तक पहुंचती है, जबकि PNG पाइपलाइन के जरिए सीधे घरों में आती है. हाल ही में भारत में गैस की सप्लाई में आई परेशानी ने इन दोनों सिस्टम के बीच का फर्क साफ कर दिया. ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास तनाव बढ़ गया है. ईरान ने होर्मुज से जहाजों की आवाजाही रोक दी है. इसका असर LPG लेकर आने वाले जहाजों की आवाजाही पर पड़ा है. इससे भारत की सिलेंडर वाली LPG व्यवस्था और पाइपलाइन वाली PNG व्यवस्था का अंतर साफ दिखाई देने लगा.
LPG की किल्लत, PNG की नहीं
कई शहरों में LPG एजेंसियों के बाहर लंबी लाइनें लग गईं. यह सिर्फ कुछ दिनों की दिक्कत नहीं थी. इससे यह पता चला कि भारत की गैस सप्लाई व्यवस्था में कुछ बड़ी कमजोरियां हैं. इनमें आयात पर ज्यादा निर्भरता, सीमित भंडारण और लंबी वितरण प्रक्रिया शामिल हैं. दूसरी तरफ जिन घरों में PNG पाइपलाइन है, वहां ज्यादा समस्या नहीं हुई. इसका मतलब यह नहीं है कि PNG ने LPG की जगह ले ली है. लेकिन इस संकट से यह जरूर पता चला कि मुश्किल समय में PNG का सिस्टम ज्यादा मजबूत साबित होता है.
90% LPG का आयात होर्मुज से
भारत की ज्यादातर LPG एक ही रास्ते से आती है. लगभग 90% LPG का आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है. यह दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है. अगर यहां कोई समस्या होती है तो भारत की गैस सप्लाई पर सीधा असर पड़ता है. LPG सप्लाई का सिस्टम तेजी से माल लाने और बांटने के लिए बना है. इसलिए अगर कुछ समय के लिए भी जहाजों की आवाजाही रुक जाए तो कई जगह गैस की कमी हो सकती है. इस वक्त यही स्थिति देखने को मिल रही है.
पाइपलाइन गैस की सप्लाई क्यों नहीं रुकी?
जब LPG की सप्लाई प्रभावित हो रही, तब भी कई बड़े शहरों में PNG गैस सामान्य तरीके से मिल रही है. इसकी वजह दोनों सिस्टम का अलग ढांचा है. LPG सप्लाई में कई चरण होते हैं. पहले गैस का आयात या उत्पादन होता है. फिर उसे टर्मिनल में रखा जाता है. उसके बाद बॉटलिंग प्लांट में सिलेंडर भरे जाते हैं. फिर ट्रकों से डीलरों तक भेजे जाते हैं और आखिर में घरों तक पहुंचते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में कई जगह रुकावट आ सकती है.
PNG का सिस्टम अलग है. गैस पाइपलाइन के जरिए सीधे शहरों और घरों तक पहुंचती है. एक बार कनेक्शन लगने के बाद गैस लगातार मिलती रहती है. न सिलेंडर बुक करने की जरूरत होती है और न डिलीवरी का इंतजार करना पड़ता है. मौजूदा संकट में सरकार ने भी PNG को प्राथमिकता दी है.
लेकिन PNG की भी सीमा है
PNG की वैसे तो मजबूत व्यवस्था है, लेकिन अभी यह बहुत कम घरों तक पहुंची है. सरकार PNG नेटवर्क को तेजी से बढ़ाने की योजना बना रही है. देश में गैस पाइपलाइन नेटवर्क लगातार बढ़ाया जा रहा है. लक्ष्य है कि 2034 तक करीब 12.63 करोड़ PNG कनेक्शन दिए जाएं. लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां हैं.
कई शहरों में अभी तक PNG नेटवर्क पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है. लागत भी एक बड़ी समस्या है. PNG कनेक्शन लगवाने में आमतौर पर 6000 से 9000 रुपये तक खर्च आता है. कम आय वाले परिवारों के लिए यह खर्च मुश्किल हो सकता है. इसके विपरीत LPG पर सरकार सब्सिडी देती है. उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को हर सिलेंडर पर लगभग 300 रुपये की सब्सिडी मिलती है. इसलिए LPG अभी भी सस्ती और सुलभ है.
इस संकट से क्या सीख मिली
मार्च 2026 की इस स्थिति ने दो बातें साफ कर दी हैं-
- पहली बात, भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा के लिए पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार जरूरी है. जितने ज्यादा घर PNG से जुड़ेंगे, उतनी ही सिलेंडर पर निर्भरता कम होगी.
- दूसरी बात, LPG अभी कई साल तक जरूरी बनी रहेगी. खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों में. इसलिए भारत में गैस का भविष्य दोनों सिस्टम के साथ चलने वाला होगा. शहरों में PNG ज्यादा मजबूत विकल्प बन सकता है, जबकि गांवों और छोटे कस्बों में LPG ही मुख्य ईंधन रहेगा.
आज PNG की सबसे बड़ी ताकत उसका ढांचा है. पाइपलाइन से गैस लगातार मिलती रहती है, इसलिए संकट के समय यह सिस्टम ज्यादा स्थिर साबित होता है. आने वाले समय में देखना होगा कि क्या PNG नेटवर्क शहरों से आगे भी तेजी से फैल सकता है. भारत की ऊर्जा नीति का लक्ष्य यही होगा कि शहरों में PNG मजबूत हो और ग्रामीण इलाकों में LPG व्यवस्था बेहतर बनाई जाए.
(लेखक दीपांशु मोहन अर्थशास्त्र के प्रोफेसर, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के डीन और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में विजिटिंग प्रोफेसर हैं. सक्षम राज सीएनईएस, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के लिए एक शोध विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त लेखकों के निजी विचार हैं, इससे NDTV का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














