भारत के रसोईघर एक दशक में दूसरी बार क्रांतिकारी बदलाव की ओर बढ़ रहे हैं. हम सबने करोड़ों घरों को एक दशक के अंदर कोयला, लकड़ी और उपले के चूल्हों को छोड़ कर एलपीजी गैस अपनाते देखा. संभव है कि एलपीजी गैस कुछ ही सालों में अतीत की चीज बन जाए और लोग उतनी ही बड़ी संख्य़ा में इंडक्शन स्टोव को अपना लें. इंडक्शन चूल्हे मॉडर्न जीवन शैली के ज्यादा अनुकूल हैं और इन पर खाना बनाना सस्ता है. खाना बनाने वालों के लिए ही नहीं, देश के स्वास्थ्य के लिए भी ये बेहतर है.
भारत ने पिछले दस साल में हर रसोई घर को धुआं मुक्त करने की क्रांति की है. इसका वाहक बने एलपीजी स्टोव. 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के बलिया से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) की शुरुआत की थी. इसका लक्ष्य था आठ करोड़ घरों को सहजता से एलपीजी कनेक्शन देना. अब योजना का दूसरा चरण चल रहा है. अब तक 10.5 करोड़ कनेक्शन इस योजना में दिए गए हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि 'इतनी मुश्किल से' तो लोगों ने अपनी आदत बदली है, एक बदलाव हुआ है, तो अब एक और बदलाव क्यों?
क्या दस करोड़ परिवार अपनी आदत बदलेंगे?
इस प्रश्न में एक समस्या है. हम मानकर चल रहे हैं कि वो आदत 'मुश्किल' से बदली है. ये भी तो संभव है कि लोग धुएं वाले चूल्हे को छोड़कर एलपीजी अपनाने के लिए तैयार थे. जैसे ही सरकार ने इसे आसान बनाया, सब्सिडी दी, उन्होंने पुराना चूल्हा किनारे रख दिया या फेंक दिया. क्या ऐसा ही बदलाव एलपीजी से इंडक्शन में नहीं हो सकता? मेरा अनुमान है कि ये न सिर्फ संभव है बल्कि ये और भी तेजी से होगा. पिछला बदलाव दस साल में हुआ था. ये बदलाव दो या तीन साल में ही हो जाए तो अचरज नहीं करना चाहिए.
ये सिर्फ इसलिए नहीं होगा कि लोगों को पता चल गया है कि एलपीजी विदेश से आती है और संकट कभी भी आ सकता है. आदत इसलिए बदलेगी क्योंकि बिजली से खाना बनाना सस्ता है और मॉडर्न किचन के अनुकूल भी.लोगों की आदत बदलने से भारत में एलपीजी की खपत घट जाएगी. अभी भारत के कुल पेट्रोलियम प्रोडक्ट इंपोर्ट का 50 प्रतिशत एलपीजी है और इसका सालाना बिल एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है. विदेश से एलपीजी का आना कब अटक जाए या लंबे समय के लिए बंद हो जाए, कोई नहीं जानता. एलपीजी की कीमत भी ऐसे कारणों से बढ़ सकती है, जो भारत के नियंत्रण में नहीं है.
बिजली से खाना बनाना देश के लिए क्यों बेहतर
एलपीजी के उलट, भारत में बिजली का अपना उत्पादन है. भारत अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली का उत्पादन करता है. इसे बढ़ाने की असीम संभावना है. बिजली उत्पादन के सभी स्रोत भारत में बेशुमार हैं या पर्याप्त हैं या फिर उनका इंपोर्ट आसान है. चाहे वह कोयला हो, सोलर हो, हवा हो, नदियां हों या परमाणु बिजली. अभी भारत में जमीन के नीचे जितने कोयले का पता चला है, वह दो सौ साल से भी ज्यादा की जरूरतों के लिए काफी है.
इस बात को समझकर सरकार पिछले कुछ सालों से नेशनल एफिशियंट कुकिंग प्रोग्राम एनईसीपी के तहत बिजली से खाना बनाने को प्रोत्साहित कर रही है. सरकार समर्थित संस्था इनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज लिमिटेड ईईएसएल लाखों घरों में बिजली से खाना बने, ऐसी योजना पर काम कर रही है. साधारण ज्यादा बिजली खपत करने वाले, बल्व की जगह एलईडी बल्व की क्रांति को इसी संस्था के जरिए अंजाम दिया गया था. इस तरह का कार्य करने का ईईएसएल का अनुभव है. उस बदलाव को सिर्फ लोगों को समझाकर या उपदेश देकर हासिल नहीं किया गया. एलईडी का उत्पादन बढ़ा, जिससे कीमत कम हो गई. लोगों को एलईडी उपलब्ध भी कराए गए. एक बार आदत बदल गई तो लोग एलईडी खरीदने लगे क्योंकि उनको पता चल गया कि ये बेहतर विकल्प है.
इंडक्शन, इलेक्ट्रिक कुकर आदि को लोकप्रिय बनाने का रास्ता भी संभवत: इससे मिलता जुलता होगा. ये योजना पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना से भी जुड़ जाएगी. इसके तहत जो लोग अपने घरों पर सोलर पैनल का सेटअप लगा रहे हैं, उनको सरकार सब्सिडी देती है. अगले एक साल में इस योजना में एक करोड़ घरों में सोलर बिजली तंत्र लगाने का लक्ष्य है. इस तरह घर की बनी मुफ्त बिजली से ही खाना बन जाएगा. भारत में ज्यादातर खाना बनाने का काम दिन में होता है, जब सूर्य की रोशनी होती है.
इंडक्शन स्टोव के फायदे क्या क्या हैं
हाल के वर्षों में कई कंपनियां इंडक्शन बनाने और बेचने के काम में आई हैं. उत्पादन बढ़ने के साथ इनकी कीमत और कम होगी. अभी इंडक्शन स्टोव की कीमत सस्ते स्मार्टफोन से आधी है. ईकॉमर्स कंपनियां कम से कम समय में इन्हें ग्राहकों तक पहुंचा रही है. बाजार बढ़ने से और भी कंपनियां इसमें आएंगी. कुल मिलाकर ग्राहकों के लिए फायदा ही है.
इंडक्शन चूल्हों में आंच बर्बाद नहीं होती. जबकि कोयले या लकड़ी के चूल्हों या एलपीजी स्टोव में 40 से 50 प्रतिशत आंच ही खाना बनाने में काम आती है. इंडक्शन स्टोव में गर्मी सीधे बर्तन में जाती है. साथ ही इसमें कोई ईंधन नहीं जलता यानी कार्बन डायऑक्साइड जैसी गैस भी कम बनती है. यानी खाना बनाने वाले की सेहत के लिए भी ये बेहतर है. इसमें बर्तन काला नहीं होता और खाना जलने की आशंका भी कम होती है. सस्ते इंडक्शन चूल्हों में भी टाइमर होता है, यानी बिना जरूरत चूल्हा जलता रहे, ऐसा कम ही होगा. आंच का कंट्रोल भी होता है, यानी कम तापमान पर खाना बनाने की सुविधा आसानी से मिल जाती है. गैस लीक या सिलेंडर फटने जैसी दुर्घटना भी इसमें नहीं होती.
महिला सशक्तिकरण का माध्यम
भारतीय समाज व्यवस्था में खाना बनाने का दायित्व आज भी ज्यादातर महिलाएं संभालती हैं. इसलिए अगर खाना बनाना आसान और सेहतमंद हुआ तो इसकी सबसे बड़ी लाभार्थी महिलाएं होंगी. वे ही इस क्रांति का नेतृत्व करेंगी. हालांकि आदत वाली एक बात है जो बाधा बन सकती है. इसमें रोटी सीधे आंच पर नहीं फुलाई जा सकती और आग में सीधा पकाने या जलाने की व्यवस्था भी नहीं होती. पर ये ऐसी बातें हैं जो बदली जा सकती हैं. ऐसा ही कुछ मिक्सर ग्राइंडर के आने पर भी कहा गया था की सिलबट्टे पर पीस कर बनाई गई चटनी में ज्यादा स्वाद होता है! पर इससे मिक्सर ग्राइंडर की लोकप्रियता नहीं रुकी. यही बात वाशिंग मशीन के बारे में भी कही गई. पर वाशिंग मशीन आज बेहद लोकप्रिय है.
ये भी संभव है कि घरों में इंडक्शन और एलपीजी के चूल्हे साथ साथ रहें. इसकी संभावना ज्यादा है. आदमी ही नहीं, समाज की भी आदत बदलती है. यही प्रकृति का नियम है. सबसे बड़ी बात कि ये हुआ तो देश के लिए भी अच्छा होगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में वरिष्ठ सलाहकार हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )













